अयोध्या के राम मंदिर में चढ़ावा चोरी विवादों के बीच स्थित श्री राम जन्मभूमि ट्रस्ट में पहली बार सीईओ का पोस्ट गठित किया गया है। इस पद के लिए योग्य व्यक्ति में ‘भगवान राम के प्रति श्रद्धा का भाव’ होना चाहिए। इसी बीच, भाजपा के नेतृत्व वाली महाराष्ट्र सरकार ने शुक्रवार को रामटेक स्थित ऐतिहासिक राम मंदिर का प्रबंधन करने वाले ट्रस्ट के पुनर्गठन के लिए एक विधेयक पारित किया, जिसमें भावी ट्रस्टियों को यह घोषित करना अनिवार्य है कि वे रामटेक के श्री राम के भक्त हैं।
इस विधेयक के अनुसार, ट्रस्ट की प्रबंधन समिति में नियुक्त होने वाले किसी भी व्यक्ति को निर्धारित प्रपत्र में एक घोषणा प्रस्तुत करनी होगी, जिसमें यह बताना होगा कि वह रामटेक के श्री राम का भक्त है। नागपुर से लगभग 50 किलोमीटर दूर स्थित रामटेक, महाराष्ट्र के सबसे प्रसिद्ध राम मंदिरों में से एक है। स्थानीय परंपरा के अनुसार, ऐसा माना जाता है कि भगवान राम ने अपने 14 वर्ष के वनवास के दौरान यहीं निवास किया था। इस मंदिर में हर साल लाखों श्रद्धालु आते हैं, खासतौर पर राम नवमी और कार्तिक पूर्णिमा के दौरान।
पद के लिए प्राथमिक आवश्यकता ‘राम के प्रति श्रद्धा का भाव’
यह प्रावधान अयोध्या ट्रस्ट द्वारा अपने पहले सीईओ की नियुक्ति के लिए तीन सदस्यीय चयन समिति गठित करने के कुछ दिनों बाद आया है। इस सप्ताह की शुरुआत में इंडियन एक्सप्रेस से बात करते हुए समिति के सदस्य और श्री साईबाबा संस्थान ट्रस्ट के पूर्व प्रमुख सुरेश हावरे ने कहा था कि पेशेवर योग्यता आवश्यक है लेकिन इस पद के लिए प्राथमिक आवश्यकता “राम के प्रति श्रद्धा का भाव” है। महाराष्ट्र सरकार ने रामटेक मंदिर के ट्रस्टियों के लिए इस तरह की घोषणा को वैधानिक आवश्यकता बनाने की मांग की है।
राम मंदिर देवस्थान के प्रबंधन के लिए गठित ट्रस्ट का पुनर्गठन
इस विधेयक का उद्देश्य नागपुर जिले के रामटेक स्थित प्राचीन राम मंदिर देवस्थान के प्रबंधन के लिए गठित ट्रस्ट का पुनर्गठन करना है। वर्तमान में न्यायालय के आदेशों के अनुसार देवस्थान का प्रबंधन ट्रस्ट द्वारा किया जा रहा है। विधेयक में सरकारी पदाधिकारियों की अध्यक्षता में एक प्रबंधन समिति का प्रावधान है जिसमें स्थानीय विधायक और रामटेक नगर परिषद के अध्यक्ष होंगे। ट्रस्टी प्रबंधन निधि से मानदेय, यात्रा भत्ता और दैनिक भत्ता प्राप्त करने के पात्र होंगे।
रामटेक विधानसभा क्षेत्र के प्रतिनिधि और विधेयक पेश करने वाले राज्य मंत्री आशीष जायसवाल ने कहा कि इस विधेयक का उद्देश्य मंदिर के बढ़ते कामकाज, वित्तीय लेन-देन में वृद्धि और पर्याप्त संपत्ति का हवाला देते हुए मंदिर के पारदर्शी और कुशल प्रशासन को सुनिश्चित करना है।
विपक्ष ने उठाया सवाल
वहीं, दूसरी ओर विपक्ष ने इस प्रावधान का कड़ा विरोध करते हुए इसे असंवैधानिक करार दिया। एनसीपी (एसपी) विधायक जयंत पाटिल ने कहा, “कोई व्यक्ति किसी विशेष क्षेत्र से भगवान राम का भक्त कैसे हो सकता है? क्या आप भगवान के भक्तों को बांट रहे हैं?” शिवसेना (यूबीटी) विधायक वरुण सरदेसाई ने सवाल उठाया कि सरकार इस तरह के बयान की पुष्टि कैसे करेगी। उन्होंने पूछा, “इस हलफनामे का क्या मतलब है? क्या सरकार के पास हलफनामे की प्रामाणिकता की जांच करने का कोई तंत्र है?”
कांग्रेस विधायक दल के नेता विजय वडेट्टीवार ने भी अयोध्या ट्रस्ट से जुड़े विवाद का जिक्र किया। उन्होंने कहा, “अयोध्या से कुल 1400 करोड़ रुपये की चोरी की खबर है और यहां महाराष्ट्र में राम मंदिर का प्रबंधन करने वाले ट्रस्ट में राजनीतिक नेताओं को शामिल किया जा रहा है। इन नेताओं को शामिल करने की क्या जरूरत है और भगवान राम की सेवा करने के लिए ट्रस्टियों को भत्ते क्यों दिए जाने चाहिए?”
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अयोध्या में स्थित राम मंदिर में चढ़ावे में हेरफेर के आरोपों के बाद श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट के द्वारा तीन सदस्यों वाली सर्च कमेटी बनाई गई थी। इस कमेटी में सुरेश हावरे के अलावा रिटायर्ड जज प्रदीप कोहली और लेफ्टिनेंट जनरल (रिटायर्ड) विष्णुकांत चतुर्वेदी शामिल हैं। खबर पढ़ने के लिए क्लिक करें
