महाराष्ट्र सरकार ने पसमांदा मुसलमानों तक पहुंच बढ़ाने के लिए एक कमेटी गठित की है। इसके साथ ही यह समिति अन्य छोटे मुस्लिम समुदायों की सामाजिक-आर्थिक और शैक्षिक स्थिति का अध्ययन करने, कल्याणकारी योजनाओं के वितरण में कमियों की पहचान करने और सरकारी योजनाओं तक पहुंच में सुधार के लिए उपायों की सिफारिश करेगी। इसे भाजपा द्वारा राष्ट्रीय स्तर पर पसमांदा मुसलमानों तक अपनी पहुंच बढ़ाने के प्रयासों के रूप में देखा जा रहा है।
बीजेपी नेता इदरीस मुल्तानी की अध्यक्षता वाली समिति को अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत करने के लिए एक साल का समय दिया गया है। 29 जून को जारी एक सरकारी संकल्प (GR) के अनुसार, समिति शिक्षा, रोजगार, गरीबी, संस्थागत ऋण तक पहुंच और मौजूदा कल्याणकारी योजनाओं के पात्र लाभार्थियों तक पर्याप्त रूप से न पहुंच पाने के कारणों की जांच करेगी और फिर वितरण में सुधार के लिए उपायों की सिफारिश करेगी।
भाजपा की पसमांदा मुसलमानों तक पहुंचने की कोशिश
इस कदम को भाजपा की पसमांदा मुसलमानों तक राष्ट्रीय स्तर पर पहुंचने की कोशिशों के रूप में माना जा रहा है जो मुसलमानों को एक ही राजनीतिक समूह मानने की सोच से हटकर सामाजिक और आर्थिक रूप से पिछड़े मुस्लिम समुदायों से अलग से जुड़ने की दिशा में एक बदलाव का संकेत है। इस पहल को जुलाई 2022 में तब प्रमुखता मिली जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भाजपा कार्यकर्ताओं से मुसलमानों के वंचित और पिछड़े वर्गों, विशेष रूप से पसमांदा मुसलमानों तक पहुंचने का आग्रह किया। तब से, पार्टी लगातार पसमांदा कल्याण को अपने “सबका साथ, सबका विकास” के नारे के हिस्से के रूप में पेश कर रही है।
कौन हैं पसमांदा मुसलमान?
पसमांदा मुस्लिम व्यापक रूप से सामाजिक और शैक्षिक रूप से पिछड़े मुस्लिम समुदायों में माने जाते हैं जिनमें से कई पारंपरिक कारीगर और व्यावसायिक समूहों से संबंधित हैं। यह महाराष्ट्र में अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) में आते हैं। इनमें अंसारी, कुरैशी, पिंजारी, मंसूरी, नदाफ और अत्तार जैसे समुदाय शामिल हैं।
महाराष्ट्र की कुल जनसंख्या में मुसलमानों की संख्या लगभग 11.5 प्रतिशत है लेकिन पसमांदा समुदाय की जनसंख्या का कोई आधिकारिक अनुमान नहीं है क्योंकि न तो जनगणना विभाग और न ही राज्य सरकार मुसलमानों के लिए जातिवार आंकड़े रखती है। मुस्लिम ओबीसी संगठनों का अनुमान है कि राज्य की 70-80 प्रतिशत मुस्लिम आबादी पिछड़े समुदायों से संबंधित है और उनका कहना है कि लगभग 80 मुस्लिम जातियों को ओबीसी, अनुसूचित जनजाति और खानाबदोश जनजाति श्रेणियों के तहत आरक्षण का लाभ मिलता है।
अखिल भारतीय मुस्लिम ओबीसी संगठन के राष्ट्रीय अध्यक्ष इकबाल अंसारी ने कहा, “लगभग 80 मुस्लिम जातियां आरक्षण का लाभ उठा रही हैं। सरकार का यह कदम स्वागत योग्य है। हमने समिति से उसकी कार्यप्रणाली को समझने के लिए समय मांगा है। चूंकि अभी तक कोई जाति जनगणना नहीं हुई है इसलिए हम यह जानना चाहते हैं कि समिति इन समुदायों की पहचान कैसे करेगी और यह आकलन कैसे करेगी कि सरकारी कल्याणकारी योजनाएं वास्तव में उन तक पहुंच रही हैं या नहीं।”
हालांकि, सरकार के इस फैसले की कुछ मुस्लिम संगठनों ने आलोचना की है, उनका तर्क है कि यह समिति समुदाय के भीतर विभाजन को और गहरा कर सकती है।
पिछड़े मुसलमानों के लिए आरक्षण की मांग
यह महाराष्ट्र में मुसलमानों की स्थिति का अध्ययन करने का पहला प्रयास नहीं है। 2008 में, कांग्रेस-एनसीपी सरकार ने महमूद-उर-रहमान समिति का गठन किया था जिसने 2013 में अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत करते हुए सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े मुसलमानों के लिए शिक्षा और सार्वजनिक रोजगार में आरक्षण की सिफारिश की थी।
इस मुद्दे का राजनीतिक महत्व भी है। 2024 के लोकसभा चुनावों के बाद, जहां इंडिया गठबंधन ने महाराष्ट्र की 48 सीटों में से 30 सीटें जीतीं। भाजपा नेताओं ने मुस्लिम वोटों के एकीकरण का आरोप लगाते हुए इसे “वोट जिहाद” बताया और विधानसभा चुनाव प्रचार के दौरान हिंदू एकजुटता के आह्वान को तेज कर दिया।
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महाराष्ट्र की ‘मुख्यमंत्री माझी लाडकी बहिन योजना’ से 92 लाख से ज्यादा महिलाओं के नाम कट गए हैं। एक महीना पहले ई-केवाईसी प्रक्रिया के बाद करीब 80 लाख महिलाओं के नाम काटे जाने की जानकारी सरकार ने सार्वजनिक की थी। सरकारी के आंकड़ों के मुताबिक, यह संख्या अब 92 लाख से ज्यादा हो गई है। खबर पढ़ने के लिए क्लिक करें
