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Maharashtra Crisis: सत्ता खोने के बाद अब क्या है MVA का भविष्य, पवार के सामने कहां खड़ी है शिवसेना और कांग्रेस?

तीनों दलों ने अलग-अलग विचारधारा के बावजूद गठबंधन कर सरकार बनाई। हालांकि, एकनाथ शिंदे की बगावत के कारण यह सरकार 31 महीनों तक ही चल सकी।

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शरद पवार और उद्धव ठाकरे (दाएं) – (फोटो- पीटीआई)

महाराष्ट्र में उद्धव ठाकरे के नेतृत्व वाली महा विकास अघाड़ी सरकार के गिरने के बाद एमवीए के भविष्य पर अनिश्चितता के बादल मंडरा रहे हैं। एमवीए तीन दलों-उद्धव के नेतृत्व वाली शिवसेना, शरद पवार के नेतृत्व वाली एनसीपी और कांग्रेस का गठबंधन है।

एमवीए के भाग्य को लेकर महत्वपूर्ण सवाल यह है कि क्या यह गठबंधन चुनावी राजनीति में कारगर साबित हो सकता है। एमवीए सरकार 31 महीने चलने के बाद गिर गई, जब शिवसेना के विधायकों ने एकनाथ शिंदे के नेतृत्व में बगावत कर दी। चुनाव बाद गठबंधन कर सरकार बनाने वाले तीनों दलों के लिए यहां से चुनावी राजनीति का सफर आसान नजर नहीं आ रहा है, खासकर, तब जब विचारधारा के मामले में शिवसेना अन्य दोनों दलों से अलग रास्ते पर रही है।

सत्ता में न रहने के बाद इन दलों के सामने साथ मिलकर काम करने की चुनौती होगी। इसके साथ ही इन्हें भाजपा के अलावा शिवसेना के शिंदे गुट का भी सामना करना होगा। उद्धव ठाकरे के मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देने के एक दिन बाद, कांग्रेस और एनसीपी ने उनसे सहानुभूति और एकजुटता व्यक्त करते हुए उनके प्रति समर्थन दिखाया। लेकिन इस तरह के संकेतों और एकजुटता की असल परीक्षा जमीनी स्तर पर परखी जाएगी जब तीनों दल अपने अलग, परस्पर विरोधी एजेंडे के साथ किसी भी चुनाव में उतरेंगे।

फिलहाल एनसीपी कांग्रेस और शिवसेना से बेहतर स्थिति में नजर आ रही है। शरद पवार के नेतृत्व में पार्टी ने पूरे महाराष्ट्र में अपने चुनावी आधार के विस्तार के लिए एक रोड मैप तैयार किया है। पार्टी के पूर्व डिप्टी सीएम अजित पवार (जिनके पास उद्धव कैबिनेट में वित्त विभाग था) ने सुनिश्चित किया कि उनके नेताओं और विधायकों के निर्वाचन क्षेत्रों में विभिन्न विकास परियोजनाओं को ठीक से उतारने करने के लिए पर्याप्त फंड पहुंचे।

एमवीए के अस्तित्व में आने के बाद उद्धव ठाकरे सीएम बने थे और एनसीपी-कांग्रेस इस सरकार का हिस्सा रहे। कांग्रेस और एनसीपी की शिवसेना को सीएम पद देने के ‘सरेंडर’ को तब उनकी राजनीतिक मजबूरी के रूप में देखा गया था क्योंकि इनके नेतृत्व को लगता था कि भाजपा को सत्ता से बाहर रखने के लिए शिवसेना के नेतृत्व वाली एमवीए ही एकमात्र विकल्प है।

अपने वैचारिक मतभेदों को अलग रखते हुए तीनों दलों ने फैसला किया कि एमवीए सरकार एक कॉमन मिनिमन प्रोग्राम के तहत आगे बढ़ेगी, जिसमें शिवसेना अपने हिंदुत्व के एजेंडे को इससे बाहर करने पर सहमत हो गई थी। एमवीए की एक अन्य घटक पार्टी कांग्रेस की स्थिति एनसीपी से अलग नजर आ रही है। एक प्रभावी नेतृत्व और रोड मैप के अभाव में पार्टी अव्यवस्थित नजर आती है।

इस तरह के समझौतों के बावजूद, एमवीए के अंदर अंतर्विरोधों के कारण तीनों दलों पर दबाव बरकरार रहा। उनके नेता एक-दूसरे के साथ थे, लेकिन जमीनी स्तर पर उनके कार्यकर्ताओं में असंतोष था। आखिरकार, यह एकनाथ शिंदे के नेतृत्व में बगावत के रूप में सामने आया, जिसने शिवसेना में दो धड़े कर दिए। इस बगावत का बड़ा फायदा शिंदे को मिला जब भाजपा ने उन्हें महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री की कुर्सी सौंप दी।

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