महाराष्ट्र की महायुति सरकार ने ऐसे नए नियम बनाए हैं, जिनके तहत मुख्यमंत्री देवेंद्र फड़नवीस किसी भी मंत्री के लिए गए फैसले को पलट सकते हैं, बशर्ते मुख्यमंत्री यह कदम जनहित में उठाएं और ऐसा करने के कारणों को लिखित रूप में दर्ज करें।
यह प्रावधान महाराष्ट्र सरकार के कार्य-संचालन नियम, 2026 (Maharashtra Government Rules of Business, 2026) का हिस्सा है। सामान्य प्रशासन विभाग ने इन नियमों को 14 अगस्त को अधिसूचित किया है। नए नियमों ने सरकार के कामकाज से जुड़े 1975 के नियमों की जगह ली है।
फड़नवीस सरकार का यह कदम बॉम्बे हाई कोर्ट के उस फैसले के करीब तीन साल बाद आया है, जिसमें अदालत ने कहा था कि उस समय लागू सरकार के कार्य-संचालन नियमों के तहत मुख्यमंत्री के पास किसी विभाग के प्रभारी मंत्री द्वारा लिए गए फैसले की समीक्षा या उसमें बदलाव करने का अधिकार नहीं था।
3 मार्च, 2023 को दिए अपने फैसले में बॉम्बे हाई कोर्ट की नागपुर पीठ ने तत्कालीन मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे के उस फैसले को रद्द कर दिया था, जिसमें उन्होंने भाजपा के सहयोग मंत्री के उस आदेश पर रोक लगा दी थी, जिसमें चंद्रपुर जिला केंद्रीय सहकारी बैंक में भर्ती की अनुमति दी गई थी। अदालत ने कहा था कि मुख्यमंत्री के पास संबंधित मंत्री के फैसले पर निगरानी का अधिकार नहीं था, क्योंकि 1975 के सरकारी कार्य-संचालन नियमों के तहत उन्हें किसी मंत्री के फैसले की समीक्षा या उसमें बदलाव करने का अधिकार नहीं दिया गया था।
अब संशोधित कार्य-संचालन नियम मुख्यमंत्री को किसी भी मंत्री के फैसले में इस तरह के हस्तक्षेप का स्पष्ट अधिकार देते हैं। नियम 13(5) के तहत मुख्यमंत्री न्यायिक मामलों को छोड़कर किसी भी मंत्री द्वारा लिए गए फैसले को जनहित में पलट सकते हैं, लेकिन इसके लिए उन्हें ऐसा करने के कारण लिखित रूप में दर्ज करने होंगे।
चंद्रपुर सहकारी बैंक मामले में क्या हुआ था?
चंद्रपुर जिला केंद्रीय सहकारी बैंक में रिक्त पद थे और बैंक को भर्ती प्रक्रिया शुरू करने के लिए सहकारिता विभाग से अनुमति मिल गई थी। इसके बाद तत्कालीन सहकारिता मंत्री अतुल सावे ने 23 नवंबर, 2022 को भर्ती पर लगी रोक हटा दी थी।
हालांकि, तत्कालीन मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे, जो शिवसेना के प्रमुख और भाजपा के प्रमुख सहयोगी थे, ने 29 नवंबर, 2022 को एक आदेश जारी कर इस भर्ती पर फिर से रोक लगा दी। बैंक ने मुख्यमंत्री के इस आदेश को हाई कोर्ट में चुनौती दी। अदालत ने मुख्यमंत्री के आदेश को रद्द कर दिया था।
नए कार्य-संचालन नियमों में विभाग के प्रभारी मंत्री को अब भी संबंधित विभाग को सौंपे गए काम के निपटारे के लिए प्राथमिक प्राधिकारी माना गया है। हालांकि, इन नियमों में मुख्यमंत्री को जनहित के आधार पर मंत्री के ऐसे फैसले को पलटने का अधिकार भी दिया गया है।
फड़नवीस खेमे ने 1975 के नियमों में बदलाव के पीछे किसी राजनीतिक मकसद से इनकार किया है। हालांकि, राज्य के राजनीतिक हलकों में इसे महायुति के सहयोगी दलों के बीच चल रही ‘खींचतान’ से जोड़कर देखा जा रहा है। खास तौर पर मुख्यमंत्री फड़नवीस और अब उपमुख्यमंत्री रहे एकनाथ शिंदे के बीच मतभेदों को लेकर राजनीतिक हलकों में चर्चा है।
मुख्यमंत्री के अधिकार कितने बढ़े?
नए कार्य-संचालन नियम मुख्यमंत्री को विभिन्न विभागों के कामकाज में हस्तक्षेप के कई दूसरे रास्ते भी देते हैं। मुख्यमंत्री किसी भी विभाग से किसी भी मामले से संबंधित दस्तावेज मांग सकते हैं। संबंधित विभाग के प्रभारी मंत्री और विभाग के सचिव के लिए ऐसे अनुरोध का पालन करना जरूरी होगा। मुख्य सचिव भी किसी विभाग से दस्तावेज मांग सकते हैं।
नियमों के मुताबिक, मुख्यमंत्री किसी मामले को मंत्रिमंडल के सामने रखने का निर्देश दे सकते हैं। दूसरी अनुसूची में शामिल मामलों को मंत्रिमंडल के सामने लाना अनिवार्य है, जबकि तीसरी अनुसूची में शामिल मामलों को आदेश जारी होने से पहले मुख्यमंत्री के समक्ष प्रस्तुत करना होगा।
दूसरी अनुसूची में ऐसे मामलों के लिए भी व्यापक प्रावधान है, जिनके बारे में अलग से कोई प्रावधान नहीं है, लेकिन मुख्यमंत्री उन्हें मंत्रिमंडल के सामने रखने का निर्देश देते हैं। इसमें ऐसे मामले भी शामिल हैं, जो परिस्थितियों के कारण विशेष महत्व हासिल कर लेते हैं, या जिनमें मुख्यमंत्री की विशेष रुचि हो।
नए नियम मंत्रिमंडल को कुछ मामलों में सर्कुलेशन के जरिए फैसला लेने की अनुमति भी देते हैं। यानी किसी बैठक में चर्चा करने के बजाय मामले को मंत्रियों के पास उनकी राय के लिए भेजा जा सकता है। यदि मंत्री किसी मामले पर एकमत हैं और मुख्यमंत्री मानते हैं कि बैठक बुलाने की जरूरत नहीं है, तो मंत्रिमंडल की बैठक के बिना भी उस मामले पर फैसला लिया जा सकता है।
जिन मामलों को मुख्यमंत्री तत्काल जरूरी मानते हैं, उनमें यदि कोई मंत्री तय समयसीमा के भीतर अपनी राय नहीं देता है, तो इसे सिफारिशों की स्वीकृति माना जा सकता है।
मुख्य सचिव की भूमिका मजबूत
नए नियम निर्णय लेने की प्रक्रिया में मुख्य सचिव की भूमिका को भी मजबूत करते हैं। यदि प्रस्तावित कार्रवाई कानून या सरकारी नियमों के खिलाफ है, सरकारी नीति के अनुरूप नहीं है या उसमें कोई महत्वपूर्ण पहलू विचार में नहीं लिया गया है, तो अंतिम फैसला लिए जाने से पहले मुख्य सचिव मुख्यमंत्री या किसी मंत्री को सलाह दे सकते हैं। मंत्रिमंडल के सामने रखे जाने वाले सभी मामलों को मुख्य सचिव के माध्यम से भेजना भी अनिवार्य किया गया है।
यदि कोई मामला एक से अधिक विभागों से संबंधित है, तो नियमों के तहत फैसला लेने से पहले संबंधित विभागों से परामर्श करना जरूरी होगा। जब तक संबंधित विभागों में सहमति नहीं बन जाती या मामले का फैसला मंत्रिमंडल की प्रक्रिया के जरिए नहीं हो जाता, तब तक कोई आदेश जारी नहीं किया जा सकेगा।
जिन फैसलों का वित्तीय प्रभाव पड़ता है, उनमें वित्त विभाग की भी इसी तरह की निगरानी भूमिका होगी। राजस्व में रियायत, खर्च, जमीन का अनुदान या पट्टा, पदों का सृजन, वेतन और भत्ते या अन्य वित्तीय प्रभाव वाले मामलों में सामान्य तौर पर वित्त विभाग की पूर्व सहमति के बिना कोई आदेश जारी नहीं किया जा सकेगा।
राज्यपाल की भूमिका
नए कार्य-संचालन नियमों में ऐसे 22 श्रेणियों के मामलों को भी निर्धारित किया गया है, जिन्हें आदेश जारी करने से पहले मुख्यमंत्री को राज्यपाल के समक्ष प्रस्तुत करना होगा।
इनमें राज्य की शांति और सौहार्द को प्रभावित करने वाले मामले, केंद्र-राज्य संबंध, अध्यादेश, विधानमंडल के लिए नामांकन, विधानसभा को बुलाना या भंग करना, महाराष्ट्र लोक सेवा आयोग में नियुक्तियां, अनुसूचित क्षेत्रों से जुड़े मामले और अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, अन्य पिछड़ा वर्ग तथा अल्पसंख्यकों से जुड़े कुछ मामले शामिल हैं।
नए नियम संविधान के अनुच्छेद 166(2) और 166(3) के तहत बनाए गए हैं। ये प्रावधान सरकारी आदेशों के प्रमाणीकरण और राज्य सरकार के कामकाज के संचालन के लिए नियम बनाने से संबंधित हैं।
