Maharashtra News: महाराष्ट्र के अल्पसंख्यक मामलों के विभाग ने 73 शैक्षणिक संस्थानों को अल्पसंख्यक दर्जा दिए जाने के विवाद के बाद संस्थानों को अल्पसंख्यक दर्जा देने की प्रक्रिया पर रोक लगा दी है। यह विवाद पूर्व उपमुख्यमंत्री अजीत पवार की मृत्यु के तीन दिनों के भीतर इन संस्थानों को दर्जा दिए जाने के बाद खड़ा हुआ था, जो अल्पसंख्यक विकास विभाग का कार्यभार संभाल रहे थे।

वरिष्ठ आईएएस अधिकारी बी. वेणुगोपाल रेड्डी के नेतृत्व में इस घटना की जांच लंबित होने तक प्रक्रिया को रोक दिया गया है। बी.वेणुगोपाल रेड्डी द्वारा रिपोर्ट सौंपे जाने के बाद प्रक्रिया को फिर से शुरू करने पर निर्णय लिया जाएगा। रिपोर्ट दो सप्ताह के भीतर सौंपे जाने की संभावना है।

सुनेत्रा पवार के दफ्तर के अधिकारी ने दिया बयान

उपमुख्यमंत्री सुनेत्रा पवार के कार्यालय के एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा कि प्रक्रिया फिलहाल रोक दी गई है लेकिन उन 73 संस्थानों को दिए गए अल्पसंख्यक दर्जे पर रोक जारी है। इसे हटाया नहीं गया है। सुनेत्रा पवार वर्तमान में अल्पसंख्यक विकास विभाग संभाल रही हैं। अधिकारी ने आगे कहा कि जहां चल रही जांच इन संस्थानों को दर्जा देने से संबंधित है, वहीं उस नीतिगत ढांचे पर भी फिर से विचार करने की आवश्यकता हो सकती है जिसके तहत शैक्षणिक संस्थान इन लाभों का लाभ उठा रहे हैं।

रेड्डी ने कहा कि नीति संस्थान चलाने वाले ट्रस्ट के लिए फायदेमंद नहीं होनी चाहिए, बल्कि उस अल्पसंख्यक समुदाय के छात्रों के लिए होनी चाहिए जिनके लिए इसे बनाया गया है। महाराष्ट्र सरकार ने 27 मई 2013 को एक शासन निर्णय जारी किया था जिसने शैक्षणिक संस्थानों को अल्पसंख्यक दर्जा देने की प्रक्रिया का ढांचा तैयार किया था।

कैसे शुरू हुआ पूरा विवाद?

यह विवाद तब शुरू हुआ, जब यह दावा किया गया कि अजीत पवार की मृत्यु के तीन दिनों के भीतर ही शैक्षणिक संस्थानों को अल्पसंख्यक प्रमाण पत्र जारी कर दिए गए। विवाद के बाद ‘द इंडियन एक्सप्रेस’ ने अल्पसंख्यक विकास विभाग के स्पष्टीकरण का खुलासा किया था। विभाग के अनुसार, उन 20 समितियों और ट्रस्टों में से कम से कम 19 ने 24 दिसंबर 2025 से 27 जनवरी 2026 के बीच सुनवाई पूरी कर ली थी और मंजूरी प्राप्त कर ली थी। उस समय अजीत पवार जीवित थे और अल्पसंख्यक विकास विभाग का प्रभार संभाल रहे थे। ये 20 समितियां और ट्रस्ट कुल 73 शैक्षणिक संस्थान चलाते हैं।

अधिकारियों ने कहा कि 28 से 30 जनवरी के बीच प्रमाणपत्रों का थोक अपलोड उन आईटी त्रुटियों के सुधार के बाद किया गया था, जिनके कारण डिजिटल रूप से हस्ताक्षरित प्रमाणपत्रों के बनने में देरी हुई थी। मुख्य सचिव को भेजे अपने संदेश में विभाग ने उन खबरों को ‘निराधार’ और ‘तथ्यों को तोड़-मरोड़ कर पेश करने वाला’ बताया, जिनमें मंजूरी प्रक्रिया को मनमाना कहा गया था।

विवाद छिड़ने के बाद, मुख्यमंत्री देवेंद्र फड़नवीस ने आदेश दिया है कि समीक्षा लंबित होने तक इन मंजूरियों को स्थगित रखा जाए, और उपमुख्यमंत्री सुनेत्रा पवार ने प्रक्रिया की विस्तृत जांच के निर्देश दिए हैं। इसके अलावा, अल्पसंख्यक विकास विभाग के उप सचिव मिलिंद शेनॉय का इस विवाद के बाद प्रशासनिक आधार पर तबादला कर दिया गया है।

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