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कोरोना की मार, गरीबी बना रही लाचार! हो रहे कुपोषण का शिकार, पालघरवासी बोले- खुद रहते हैं भूखे, ताकि बच्चों का भर सकें पेट

ऐसा ही हाल रूपेश और रूपाली का है, जो 13 महीने के जुड़वां बच्चे हैं। इन दोनों का वजन 40 से 42 फीसदी औसत से कम है, जबकि लंबाई भी कम है। इन्हें महज सूखा चावल खाना मिलता है। इनके परिवार की जई तरल ने बताया, "हमारे पैसा होगा, तब खिलाएंगे न। पैसे ही नहीं हैं। हम सब्जी नहीं खरीद कर खा सकते हैं।"

COVID-19, Poverty, Malnutrition, Childrenमहाराष्ट्र के पालघर में कुपोषण के अधिकतर मामले धहानू से आते हैं, जहां मॉनसून के बाद आदिवासी काम की तलाश में शहरों की ओर पलायन करते हैं। (एक्सप्रेस आर्काइव फोटोः प्रशांत नादकर)

Coronavirus की मार के बीच गरीबी और भुखमरी महाराष्ट्र के पालघर में लोगों को और भी बेबस और लाचार बना चुकी है। आलम यह है कि वहां पर नन्हें नन्हें बच्चे कुपोषण का शिकार हो रहे हैं। जो कुछ भी घर में आता है वह बच्चों को खाने को मिल जाए, इसके लिए परिवार वाले खुद खाने का त्याग कर देते हैं।

अंग्रेजी समाचार चैनल NDTV की रिपोर्ट के मुताबिक, पालघर के कई इलाकों में बच्चों में कुपोषण बड़ी चिंता का विषय बन गया है। बताया गया कि वहां का निवासी उमेश तीन साल का है, पर उसका वजन एक साल के बच्चे के बराबर का है। फिलहाल वह आठ किलो का है, जबकि उसके वजन चार किलो या फिर 33 फीसदी कम (मौजूदा उम्र के हिसाब से) है। उसकी लंबाई 84 सेंटीमीटर है, जो 6.6 फीसदी आदर्श स्थिति से कम है।

गांव में सरकारी स्कूल भी नहीं है, जिससे उसके नौ साल के बड़े भाई को वहां पर मिड डे मील में पर्याप्त भोजन मिल सके। तरलपाड़ा के इस परिवार की प्रमिला भांबरे ने अंग्रेजी चैनल को बताया- चार लोगों का पेट भरना काफी मुश्किल भरा हो जाता है। छोटे बच्चे का वजन कम है, इसलिए उसकी अधिक देखभाल करनी पड़ती है।

ऐसा ही हाल रूपेश और रूपाली का है, जो 13 महीने के जुड़वां बच्चे हैं। इन दोनों का वजन 40 से 42 फीसदी औसत से कम है, जबकि लंबाई भी कम है। इन्हें महज सूखा चावल खाना मिलता है। इनके परिवार की जई तरल ने बताया, “हमारे पैसा होगा, तब खिलाएंगे न। पैसे ही नहीं हैं। हम सब्जी नहीं खरीद कर खा सकते हैं। बड़े लोगों को भूखा रहना पड़ता है, ताकि छोटे बच्चों को दो वक्त का निवाला मिल सके। बच्चों को तो भूखा नहीं रख सकते हैं न।” जई के परिवार में आठ लोग हैं। उनका बेटा कंस्ट्रक्शन साइट्स पर काम करता था, पर अब काम ही नहीं है, इसलिए परिवार को संघर्ष करना पड़ रहा है।

पालघर जिले के जवाहर तालुका में आने वाला तारलपाड़ा में आदिवासी आबादी रहती है, जिनमें से अधिकतर आसपास के इलाकों में प्रवासियों के तौर पर काम करते हैं। मसलन थाणे और भिवंडी। बता दें कि महाराष्ट्र के सबसे पिछड़े जिलों में से एक पालघर जिले में कुपोषण की समस्या नई बात नहीं है। महिला और बाल विकास मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार, पालघर जिले में अप्रैल 2020 में कुल 2,399 बच्चे कुपोषण की जद में आए। जून 2020 में यह संख्या बढ़ी और 2459 हो गई। यानी करीब 2.5 फीसदी की इसमें बढ़ोतरी आई।

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