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सीएम उद्धव ठाकरे की विधायकी पर जारी है संशय, गवर्नर भगत सिंह कोश्यारी के पाले में गेंद

उद्धव ठाकरे ने 28 नवंबर 2019 को महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री पद की शपथ ली थी, लेकिन उनका अभी विधानसभा के सदस्य के तौर पर चुना जाना बाकी है।

Author Edited By कीर्तिवर्धन मिश्र मुंबई | Updated: April 10, 2020 2:29 PM
महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे, राज्यपाल भगत सिंह कोश्यारी (बीच में) और उद्धव की पत्नी रश्मि।

कोरोनावायरस लॉकडाउन से महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे की कुर्सी पर खतरा पैदा हो गया है। शिवसेना अध्यक्ष ने राज्य में तीन पार्टियों के साथ गठबंधन की सरकार बनाने के बाद 28 नवंबर 2019 को सीएम पद की शपथ ली थी। हालांकि, उद्धव ने चुनाव नहीं लड़ा था और वे अभी तक महाराष्ट्र विधानसभा के सदस्य नहीं हैं। अगर कोरोनावायरस महामारी की वजह से लॉकडाउन जारी रहता है और उद्धव को विधानसभा या विधानपरिषद में चुनाव का मौका नहीं मिलता है, तो उन्हें पद गंवाना पड़ सकता है।

संविधान के अनुच्छेद 164(4) के तहत किसी नेता को केंद्र या राज्य सरकार में पद ग्रहण करने के बाद छह महीने के अंदर सदन की सदस्यता लेनी होती है। यानी उद्धव ठाकरे के पास इन विधानसभा या विधानपरिषद का सदस्य बनने के लिए 27 मई तक का समय है। हालांकि, कोरोनावायरस की गंभीरता को देखते हुए इन हालात में उनका चुनाव के जरिए सदन में पहुंचना काफी मुश्किल है।

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उद्धव की इस परेशानी के बीच गेंद एक बार फिर राज्यपाल भगत सिंह कोश्यारी के पाले में है। गुरुवार को राज्य कैबिनेट की बैठक में सिफारिश की गई कि उद्धव को विधान परिषद में राज्यपाल की तरफ से नामित सदस्य के तौर पर भेजा जाए। यह सिफारिश महाराष्ट्र के डिप्टी चीफ मिनिस्टर और एनसीपी नेता अजीत पवार की ओर से की गई। राज्यपाल 78 सदस्यीय विधान परिषद में से 12 सदस्यों को नामित कर सकता है। हालांकि, विधान परिषद के 12 नामित सदस्यों का 6 साल का कार्यकाल 6 जून को खत्म हो रहा है। इनमें से दो सीटें अभी खाली हैं, क्योंकि एनसीपी के नेता रामाराव वद्कुते और राहुल नरवेकर पिछले साल चुनाव से पहले ही भाजपा में शामिल हो गए थे।

अगर कोश्यारी उद्धव को खाली सीटों के लिए नामित कर भी देते हैं, तो भी उनकी सदन की सदस्यता 6 जून को ही चली जाएगी। ऐसे में उद्धव को राज्यपाल कोश्यारी की तरफ से एक बार फिर नामित किए जाने की जरूरत होगी। हालांकि, अगर इसके बाद कोश्यारी ने उद्धव को नामित करने से इनकार किया, तो उनकी सदन की सदस्यता तो चली जाएगी। क्योंकि राज्यपाल के पास संविधान के ही अनुच्छेद 163(2) के तहत कैबिनेट की तरफ से नामांकन अस्वीकृत करने का अधिकार है। इस स्थिति में उन्हें दोनों सदनों में से किसी एक में शामिल होने के लिए 6 महीने और मिल जाएंगे।

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