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महाकवि घाघ: विज्ञान से आगे की सोचने वाला अद्भुत मौसम विज्ञानी, अंग्रेजी सत्ता भी उनकी सटीक जानकारी से थी हैरान

सर्वोदय कार्यकर्ता जल योद्धा उमा शंकर पांडे बताते हैं कि घाघ के मौसम विज्ञान पर जर्मनी के सुप्रसिद्ध वैज्ञानिक लिविंग ने यूरोप में कृत्रिम उर्वरक के संबंध में बड़ा अनुसंधान किया। उसमें उन्होंने उनकी कहावतों को सबसे सटीक पाया। उन्होंने इसे पूरी दुनिया में प्रचारित किया।

महाकवि घाघ की मौमस और कृषि पर कहावतें आज भी एकदम सटीक और प्रासंगिक हैं।

खेती और मौसम का आपसी संबंध बहुत निकट का है। अगर किसान को मौसम की सटीक जानकारी मिल जाए तो वह अपनी फसल के अनुरूप जरूरी तैयारी पहले से कर ले। हालांकि ऐसा हो नहीं पा रहा है। लेकिन हमारे पूर्वजों के जमाने में लोक कवि घाघ की कहावतें इतनी सटीक रहती थीं कि मिट्टी कैसी हो से लेकर फसल कौन सी बोई जाए, सबकी बिल्कुल सही जानकारी मिल जाती थी। लोक कवि घाघ की कहावतें आज भी उतनी ही प्रासंगिक हैं, जितनी पहले थी।

बुंदेलखंड में घाघो का एक गांव है। जर्मनी के वैज्ञानिकों ने उन पर अनुसंधान किया और उसे बिल्कुल सही पाया।
घाघ के सूत्र, लोक कवि बुझ बुझक्कड़, लोक कवि गिरिधर लोक रसिक, कवि ईसुरी संत मलूक दास की कहावतें आज भी सैकड़ों साल बाद खरी उतर रही हैं। ये सभी लोग अपने जमाने के महान समाज वैज्ञानिक थे। खेती, खेत, कृषि खलिहान के मौसम और मानसून के वैज्ञानिक कवि घाघ के सूत्रों को आज भी कोई काट नहीं सकता है।

सर्वोदय कार्यकर्ता जल योद्धा उमा शंकर पांडे बताते हैं कि घाघ के मौसम विज्ञान पर जर्मनी के सुप्रसिद्ध वैज्ञानिक लिविंग ने यूरोप में कृत्रिम उर्वरक के संबंध में बड़ा अनुसंधान किया। उसमें उन्होंने उनकी कहावतों को सबसे सटीक पाया। उन्होंने इसे पूरी दुनिया में प्रचारित किया। पहले इस पर विश्वास नहीं किया जाता था। घाघ महराज ने खेतों की जुताई, गुड़ाई, पानी कब बरसेगा, किस खेत में क्या बोया जाए, कब बोया जाए, बैल कैसा हो, बीज कैसा हो, मिट्टी कैसी हो, नक्षत्र, दिन, तिथि का बहुत सूक्ष्मता से अध्ययन किया है।

खेती कोई आजकल का पेशा नहीं है। यह सदियों से होता चला आ रहा है। भारतवर्ष का यह सबसे पुराना कार्य है। हजारों लाखों वर्ष बीत गए जब मनुष्य ने खेती करना सिखा। उस समय उसके खेत में जो पैदा होता था बहुत कम होता रहा होगा। खेती के विज्ञान को बहुत धीरे-धीरे सीखा होगा। घाघ कवि ने अनुसंधान किया होगा। प्रयोग किया होगा और किसानों को सिखाया होगा। जबकि उनकी एक-एक कहावत पाठ्यक्रम में होनी चाहिए। खेती-बाड़ी इतना बड़ा विज्ञान है कि बहुत सारी बातें ध्यान से हट जाती हैं क्योंकि इनका प्रयोग खेत में होता है। मिट्टी, मौसम, मानसून, समय, तिथि, स्थान का निर्धारण प्रकृति के ऊपर नियत है।

पुराने जमाने में संस्कृत का श्लोक या कविताओं के माध्यम से कोई भी जानकारी सीखी जाती थी। आजकल की तरह किताबें नहीं थीं, पुस्तकें हाथ से लिखी जाती थी, लोग आपस में ज्ञान की बातों की चर्चा गांव की चौपाल में करते थे। कृषि कवियों में घाघ और भड्डरी विशेष रूप से प्रसिद्ध हैं। महाकवि घाघ के बारे में तथा उनके जन्म स्थान के बारे में बड़ा मतभेद है घाघ बिहार के थे, कन्नौज के थे या फतेहपुर के थे, यह शोध का विषय है।

केन नदी के तट पर बुंदेलखंड के बांदा जिले की सीमा से 5 किलोमीटर दूर छतरपुर जिले का अंतिम गांव घाघ पुरवा, जो नांद पंचायत चंदला के अंतर्गत आता है, के बाबा जगन्नाथ घाघ जिनकी उम्र 90 के आसपास थी, वह उन्हें अपना पूर्वज बताते थे। उनके पुत्र भाऊ घाघ जिनकी उम्र 95 बरस है उनका बेटा श्री उमाकांत घाघ नाद गांव का सरपंच है अपना पूर्वज मानते हैं। नदी के किनारे गांव में करीब डेढ़ सौ व्यक्ति घाघ परिवार के हैं, जो महाकवि घाघ को अपना पूर्वज मानते हैं। इस गांव के अलावा कोई दूसरा घाघो का गांव नहीं है। जल योद्धा उमा शंकर पांडे के मुताबिक कई माह पहले इस गांव में गया था। सागर मंडल के कमिश्नर आयुक्त, जिला विकास अधिकारी, मुख्य विकास अधिकारी, उप जिलाधिकारी तहसीलदार भी थे। मैंने स्वयं अनुभव किया था यहां कोई ना कोई वैज्ञानिक ऋषि रहा है, ऐसा वहां का वातावरण अवशेष साधना स्थल के देखने से लगा। घाघ महाराज अकेले एकांत में रहते थे।

खेतों पर नदी के किनारे प्रयोग करते थे, वह सोते नहीं थे। हर घटना को हर क्षण 51 बरस तक लिखते रहे, प्रयोग करते रहे अधिकांश कहावतें बुंदेलखंड में सटीक होती हैं। वे बुंदेली भाषा में है। इसलिए घाघ कवि जी का कोई ना कोई रिश्ता यहां से जरूर रहा है। यहां के घाघ पंडित यह भी बताते हैं कि हम कुठार भोजपुर से आए थे जो गंगा किनारे रायबरेली में पड़ता है। हुसैनगंज लालगंज तहसील के पास है। इस गांव में कन्नौज से आकर घाघ महाकवि रहे हैं। चंद्र दास शोध संस्थान के निदेशक राष्ट्रीय कवि डॉ चंद्रिका दीक्षित ललित जी इस विषय पर चिंतन कर रहे हैं। आज भी कवि गिरिधर की कुंडलियां – कह गिरधर कविराय सुनो अब मेरे साथी सब हथियार छोड़ हाथ लीजे लाठी।

महाराज मलूक दास कहते हैं अजगर करे न चाकरी पंछी करे न काम दास मलूका कह गए सबके दाता राम।
महाकवि बुझ बुझक्कड़ कहते हैं बुझ बुझक्कड़ बूझ को और न बुझे कोय पावन में चिक्की बांध के बिल्ली निकल गई होय।

महाकवि ईश्वरी की रंग फाग को सुनने से अलग आनंद प्राप्त होता है, जो पति-पत्नी, प्रेमिका के प्रेम के बारे में अद्भुत रचना प्रस्तुत करते हैं, वह भी बुंदेली भाषा में खेत खलिहान गांव पर आधारित है। उन्होंने पूछा कि दूसरे देश हमारे महान कवियों के विचारों पर अनुसंधान कर रहे हैं, हमारा कृषि विभाग क्यों नहीं कर रहा। उनके प्रयोग पर कुछ प्रयोग यहां भी होना चाहिए। उनकी कहावतों को पाठ्यक्रम में शामिल किया जाना चाहिए। आज भी घाघ की कहावतें सटीक बैठती हैं।

वह एक अच्छे कृषक पंडित व्यवहारिक अनुभवी गुरु थे। उनके सूत्र उस समय से अधिक आज प्रसांगिक हैं और उनका महत्व आज भी है। सदियों से किसानों का पथ प्रदर्शित कर रही हैं। अनपढ़ व्यक्ति को भी उनके सूत्र याद हैं परंपरागत कृषि मौसम वैज्ञानिक ने मानव जीवन के अनुभव को सूक्ष्म निरीक्षण परीक्षण किया कृषि के वैज्ञानिक व्यावहारिक पुरुष हैं। मेरा विषय यह नहीं है कि उनका जन्म बिहार के छपरा में हुआ, अपनी ससुराल कन्नौज में आए, फिर रायबरेली आ गए या गौरिहार स्टेट आ गए अथवा महाराज छत्रसाल के चंदेल स्टेट गए, अंग्रेज वैज्ञानिक उनके प्रयोग से भयभीत थे, उनके प्रयोग के आधार पर ही अधिकतर किसान बैल खरीदते थे, खेत मे बीज बोते थे, फसल काटते थे, बाजार ले जाते थे, हल तालाब कुआं नदी की पूजा करते थे। तिथि समय दिन के अनुसार पौधरोपण करते थे। यहां तक की वर-वधु के जीवन भर उनके सटीक अनुभव थे।

अंग्रेज परेशान थे, कोई भी उनकी वैज्ञानिक नवीन तकनीकों को भारत में नहीं अपना रहा था, अंग्रेजों ने उन्हें भागने पर मजबूर किया था, वे कहां कहां कब-कब रहे इसका कोई प्रमाण नहीं है। विद्वानों के अलग-अलग मत हैं कोई कहता है किसी राजा ने घाघ के नाम पर कन्नौज के पास अकबराबाद में एक अनुसंधान केंद्र घाग सराय बनाया था। उनके द्वारा लिखी हुई कोई किताब अब तक मुझे पढ़ने को नहीं मिली। हिंदुस्तानी एकेडमी ने 1931 में घाघ भड्डरी पर एक संकलन प्रकाशित किया था। खेत, खलिहान, मौसम, कृषि के परंपरागत अनुसंधानकर्ता महाकवि घाघ भड्डरी का अभिमत था कि कृषि सबसे उपयुक्त व्यवसाय है। किसान स्वयं भूमि को जोतता है, किसान के श्रम से अर्जित पूंजी ही असली धन है. वहीं अन्य का दाता है।

आज हमें टीवी रेडियो पर मौसम की जानकारी मिल जाती है, सदियों पहले घाघ की कहावतों के अनुसार भारत का किसान खेती करता था। आचार्य वराहमिहिर ने संस्कृत भाषा में अनेक जानकारियां दी हैं, किंतु सरल भाषा में घाघ ही सर्वमान्य हैं। जल योद्धा उमा शंकर पांडे ने बताया कि वह स्वयं पिछले 2 वर्ष से उस गांव पर महाकवि घाघ से संबंधित जानकारियां एकत्र कर रहा हैं।

कहा कि मैं गांव में रहता हूं, अपने पूर्वजों से मैंने सुनी है मेरी जानकारी में इनसे बड़ा वैज्ञानिक आज तक भविष्य को जानने वाला कृषि के क्षेत्र में दूसरा नहीं है। कहा कि मैं विषय विशेषज्ञ नहीं हूं, लेकिन चाहता हूं कि युवा पीढ़ी इन महान आचार्यों पर शोध करें। जो कृषि करना चाहते हैं अथवा कृषि मौसम वैज्ञानिक बनना चाहते हैं, वे उनकी कहावतों को पढ़े, बहुत जानकारी प्राप्त होगी। मेरे पास उनकी डेढ़ सौ से अधिक कहावतें उपलब्ध हैं।

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