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मृत्युंदड पाए शख्स की दया याचिका पर सरकार ने नहीं लिया फैसला, सुप्रीम कोर्ट ने बदल दी सजा

व्यक्ति को पत्नी और पांच बच्चों की हत्या का दोषी मानते हुए फांसी की सजा सुनाई गई थी। इस मामले में दोषी व्यक्ति ने दया याचिका की अपील की थी।

Author Updated: February 24, 2019 9:14 PM
इस तस्वीर का इस्तेमाल प्रतीकात्मक तौर पर किया गया है। (एक्सप्रेस फाइल फोटो)

सुप्रीम कोर्ट ने एक व्यक्ति की फांसी की सजा को आजीवन कारावास में बदल दिया। व्यक्ति को उसकी पत्नी और पांच बच्चों की हत्या का दोषी पाया गया था और फांसी की सजा सुनाई गई थी। इसके बाद उस व्यक्ति ने दया याचिका के लिए आवेदन किया। मध्य प्रदेश सरकार की ओर से दोषी की दया याचिका को केंद्रीय गृह मंत्रालय को भेजने करने में चार वर्ष की ‘बेवजह देरी’ हुई। इस वजह से सुप्रीम कोर्ट ने उसकी फांसी की सजा को बदल उम्रकैद कर दिया। शीर्ष अदालत ने कहा कि दया याचिका पर निर्णय करने में लगभग पांच वर्ष का विलंब हुआ क्योंकि राज्य के अधिकारियों ने इसे चार वर्ष तक गृह मंत्रालय के पास नहीं भेजा।

न्यायमूर्ति एन वी रमना के नेतृत्व वाली पीठ ने कहा कि दया याचिका उस व्यक्ति की ‘‘आखिरी उम्मीद’’ होती है जिसे फांसी की सजा सुनायी गई हो। पीठ ने कहा कि दोषी जगदीश ने 13 अक्टूबर 2009 को जेल अधिकारियों के समक्ष दया याचिका दायर की थी लेकिन उसकी याचिका को 15 अक्टूबर 2013 को गृह मंत्रालय को भेजा गया। पीठ में न्यायमूर्ति दीपक गुप्ता और न्यायमूर्ति इंदिरा बनर्जी भी शामिल थीं। पीठ ने कहा, ‘‘दया याचिका ऐसे किसी भी व्यक्ति की आखिरी उम्मीद है जिसे फांसी की सजा सुनायी गई हो। प्रत्येक सुबह उसके लिए एक नई उम्मीद लेकर आएगी कि हो सकता है कि उसकी दया याचिका स्वीकार कर ली जाए। लेकिन रात के साथ ही उसकी उम्मीद भी खत्म हो जाएगी।’’

अदालत ने कहा कि मामले की सभी परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए जिसमें मध्य प्रदेश राज्य द्वारा दया याचिका को आगे बढ़ाने में चार साल की अकारण देरी शामिल है जिससे दया याचिका पर निर्णय करने में लगभग पांच साल की देरी हुई और यह तथ्य कि याचिकाकर्ता लगभग 14 वर्षों से जेल में है, हमारा विचार है कि अपराध की प्रकृति भले ही क्रूर है लेकिन यह ऐसा मामला नहीं है जिसमें मौत की सजा दी जाए। हम तदनुसार मौत की सजा को आजीवन कारावास में बदलते हैं।’’ हालांकि, पीठ ने निर्देश दिया कि मामले में आजीवन कारावास का मतलब है कि दोषी को उसकी स्वभाविक मौत तक जेल से रिहा नहीं किया जाएगा।

जगदीश ने अगस्त 2005 में अपनी पत्नी और पांच बच्चों की हत्या कर दी थी। निचली अदालत ने उसे अप्रैल 2006 में फांसी की सजा सुनायी थी। जून 2006 में मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय ने उसे सुनायी गई फांसी की सजा की पुष्टि की थी और बाद में सितंबर 2009 में उच्चतम न्यायालय ने उसकी अपील खारिज कर दी थी। जगदीश ने उसके बाद 13 अक्टूबर 2009 को जेल अधिकारियों के माध्यम से भारत के राष्ट्रपति और मध्य प्रदेश के राज्यपाल को संबोधित एक दया याचिका दायर की थी। राष्ट्रपति ने उसकी दया याचिका 16 जुलाई 2014 को खारिज कर दी थी।

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