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मुरैना: कैलारस कारखाना: प्रशासनिक अफसरों की लूट का शिकार होकर कंगाली में हो गया बंद

300 करोड़ से ज्यादा की संपत्ति वाले इस कारखाने को 2010 में किसी ने उधार दस हजार रुपये नहीं दिए लिहाजा आज सात साल से बंद यह कारखाना कबाड़ में बदल गया है।

Author मुरैना | July 26, 2017 3:43 AM
तस्वीर का इस्तेमाल का प्रतीक के तौर पर किया गया है।

आदर्श गुप्ता

सत्तर के दशक में चंबल की डाकू समस्या के हल में मदद के लिए स्थापित किया गया कैलारस का सहकारी शक्कर कारखाना जिले में तैनात रहे प्रशासनिक अफसरों की लूट का शिकार होकर कंगाली में बंद हो गया। 300 करोड़ से ज्यादा की संपत्ति वाले इस कारखाने को 2010 में किसी ने उधार दस हजार रुपये नहीं दिए लिहाजा आज सात साल से बंद यह कारखाना कबाड़ में बदल गया है। कैलारस और उसके आसपास के किसान, कारखाने की ट्रेड यूनियन के नेता तथा राजनीतिक दलों के लोग इस कारखाने को फिर से शुरू कराने के लिए संघर्ष कर रहे हैं लेकिन मध्यप्रदेश सरकार इसे सहकारिता के माध्यम से चलाने को तैयार नहीं है। वह इस कारखाने को पब्लिक प्राइवेट पार्टनरशिप से चलानी चाहती है और पिछले दो साल से इसकी जमीन तैयार करने में लगी है। लेकिन स्थानीय विरोध के कारण वह ऐसा कर पाने में सफल नहीं हो पा रही है।

दि मुरैना मंडल सहकारी शक्कर कारखाना (मर्यादित) कैलारस जिला मुरैना की स्थापना का निर्णय 1967 में हुआ था। 1968 में मुरैना के कलेक्टर रहे आईएस राव ने हाल ही में मुरैना में चर्चा के दौरान बताया था कि उस समय डकैतों से पीड़ित इस इलाके में शक्कर कारखाना लगा कर किसानों को नगदी की फसल के तौर पर गन्ना उपजाने को प्रोत्साहित करने की रणनीति बनी थी। कारखाने के लिए भूमि अधिग्रहण का तब किसानों ने विरोध किया था। उन्होने जैसे तैसे कारखाने का निर्माण शुरू कराया था। 1970 में यह कारखाना बनकर तैयार हुआ। 1972 से इसमें चीनी उत्पादन शुरू हो गया। तब सहकारिता के क्षेत्र का यह चंबल का एकमात्र उद्योग था। अपने शुरुआती दौर में यह कारखाना रोजाना 1800 से 2000 बोरी शक्कर का उत्पादन करता था। सहकारिता के क्षेत्र में होने के कारण राज्य सरकार इसके संचालक मंडल का मनोनयन करती रहती थी। बोर्ड का अध्यक्ष पार्टी का स्थानीय नेता बनाया जाता था जबकि प्रबंध संचालक कलेक्टर को बना दिया जाता था। कलेक्टर अपनी मनमानी करते थे और संचालक मंडल को काम नहीं करने देते थे। बाद में अध्यक्ष का दायित्व भी चंबल संभागायुक्त को सौंप दिया गया। बाद में अधिकारियों की लापरवाही के कारण कारखाने की सेहत बिगड़नी शुरू हुई तो फिर लगातार बिगड़ती ही गई। अपवाद स्वरूप 1996 से 1998 तक मुरैना के कलेक्टर रहे राधेश्याम जुलानियां ने इस कारखाने को इन दो सालों में लगभग पांच करोड़ के मुनाफे में ला खड़ा किया। उनके जाने के बाद कारखाना फिर लूट का शिकार हो गया। प्रबंध संचालक और कारखाने के स्टाफ ने मिलकर इसे इतना लूटा कि चलाने के लिए कारखाने के पास नगदी नहीं बची। किसानों को गन्ने का भुगतान नहीं हुआ तो उन्होने गन्ना उपजाना बंद करके सरसों उपजाना शुरू कर दिया।

किसान गन्ने की फसल से मोटा मुनाफा कमाते थे। गन्ने से उन्हें एक बीघा से लगभग 70 हजार रुपए की आमदनी होती थी जबकि आज सरसों की फसल से मुश्किल से 20 हजार रुपए बीघा की कमाई ही हो पाती है। इसलिए किसान आज भी चाहते हंै कि कारखाना चालू हो जाए। मौजूदा भाजपा सरकार ने 2008 में इसे फिर से शुरू करने के लिए अचानक पहली बार इसके संचालक मंडल के चुनाव करा दिए। कारखाने को चलाने के लिए तब कुल 25 लाख रुपए की जरूरत थी।2013 के मध्यप्रदेश विधानसभा के चुनाव में शक्कर कारखाना एक बडा मुद्दा था। खुद मुख्यमंत्री ने आश्वस्त किया कि अगर इस बार यहां भाजपा जीत गई तो वे कैलारस का शक्कर कारखाना शुरू करवा देंगे। तीन साल तक प्रदेश सरकार ने कारखाना चलाने का कोई प्रयास नहीं किया। बाद में खबर आई कि सरकार ने कारखाने की एक आॅडिट रिपोर्ट बनवाई है जिसमें इसे 30 करोड़ के घाटे में दिखाया गया है। इतना पैसा लगाकर सरकार इसे चलाने के लिए तैयार नहीं है। इसलिए इसे चलाने के लिए किसी निजी कंपनी को सौंपा जा सकता है। तो इसका विरोध शुरू हो गया। लोगो का कहना था कि 30 करोड़ के घाटे की बात काल्पनिक है। इसमें पांच करोड़ की ऐसी खरीद दर्ज है जो कारखाने मेंं आई ही नहीं है। यह सामान कहां है? किसने खरीदा? इसका जबाब तलाशने की कोशिश नहीं हुई। वैसे कारखाने के प्रबंधक महेश पाराशर पर इसका हिसाब था,उनसे किसी ने कोई सवाल नहीं किया। फिलहाल कारखाने के 1500 कर्मचारियों का भविष्य भी खतरे में है इसलिए कामरेड इसके विरोध में हैं। इस खींचतान में यह मामला अब तक अटका है जबकि 2018 में विधानसभा के नए चुनाव सिर पर आ गए हैं।

 

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