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कोरोना पीड़ितों से मजाकः एमपी सरकार अनाथ बच्चों को निजी स्कूल में दाखिले दिलाने के लिए निकालेगी लाटरी

कोरोना की दूसरी लहर में राज्य में आक्सीजन की कमी और अस्पतालों में इलाज नहीं मिलने की वजह से सैकड़ों लोगों ने दम तोड़ दिया था। इनमें कई ऐसे लोग भी हैं, जिनके बच्चे अनाथ हो गए।

नि:शुल्क प्रवेश के लिए आवेदन 10 जून से शुरू होगा और आवेदन करने की अंतिम तिथि 30 जून है। ऑनलाइन प्रवेश के लिए 6 जुलाई को लॉटरी निकाली जाएगी। (फोटो: अमित चक्रवर्ती इंडियन एक्सप्रेस)

स्कूल शिक्षा विभाग, मध्य प्रदेश उन छात्रों की सहायता के लिए आया है, जिन्होंने कोविड-19 महामारी के कारण अपने माता-पिता को खो दिया था। विभाग की ओर से जारी ताजा आदेश के अनुसार पिछले सत्र में पात्र छात्र और कोरोना काल में अनाथ हुए बच्चों को ऑनलाइन लॉटरी में प्राथमिकता के साथ निजी स्कूलों में नि:शुल्क प्रवेश मिलेगा। हालांकि इसको लेकर कई लोगों ने चिंता जताते हुए इसे कोरोना पीड़ित बच्चों के साथ मजाक कहा है। अनाथ हुए सभी बच्चों की सरकार को मदद करनी चाहिए थी, लेकिन सरकार उनमें भी लाटरी सिस्टम से छंटनी करने जा रही है।

नि:शुल्क प्रवेश के लिए आवेदन 10 जून से शुरू होगा और आवेदन करने की अंतिम तिथि 30 जून है। ऑनलाइन प्रवेश के लिए 6 जुलाई को लॉटरी निकाली जाएगी। महामारी के बीच, छात्रों की सुरक्षा और स्वास्थ्य को प्राथमिकता के रूप में रखते हुए, राज्य सरकार ने देश में कोविड-19 महामारी की दूसरी लहर के कारण एमपीबीएसई कक्षा 12 की बोर्ड परीक्षाओं को रद्द करने के अपने निर्णय की भी घोषणा की थी। इससे पहले, परीक्षाएं स्थगित कर दी गई थीं और स्कूल शिक्षा विभाग जुलाई में ऑफलाइन परीक्षा आयोजित करने का तरीका ढूंढ रहा था।

राज्य के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने कहा था, “जब बच्चों पर कोविड-19 का बोझ है, तो हम उन पर परीक्षाओं का मानसिक बोझ नहीं डाल सकते। हमने मंत्रियों का एक समूह बनाया है, जो विशेषज्ञों के साथ चर्चा करने के बाद आंतरिक मूल्यांकन या अन्य आधारों पर विचार करने के बाद परिणाम तय करेंगे।”

स्कूल शिक्षा (स्वतंत्र प्रभार) राज्य मंत्री इंदर सिंह ने कहा था कि कोरोना संक्रमण के मद्देनजर विद्यार्थियों के स्वास्थ्य और सुरक्षित भविष्य को ध्यान में रखते हुए मुख्यमंत्री ने 12वीं कक्षा की बोर्ड परीक्षाओं को निरस्त करने का निर्णय लिया है।

कोरोना की दूसरी लहर में राज्य में आक्सीजन की कमी और अस्पतालों में इलाज नहीं मिलने की वजह से सैकड़ों लोगों ने दम तोड़ दिया था। इनमें कई ऐसे लोग भी हैं, जिनके बच्चे अनाथ हो गए।

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