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म‍िसाल: दर्जा प्राप्त राज्यमंत्री होते हुए भी लालबत्ती गाड़ी में नहीं चले, मरने पर हुआ देहदान, नहीं हुई कोई रस्‍म

विक्रम विश्वविद्यालय में साल 1985 में इंस्टीट्यूट ऑफ इन्वायरमेंट मैनेजमेंट विभाग की स्थापना उन्हीं के प्रयासों से हुई थी।
इस तस्वीर का इस्तेमाल प्रतीक के तौर पर किया गया है।

डॉ. शुभ्रता मिश्रा

मध्य प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के पूर्व अध्यक्ष और विक्रम विश्वविद्यालय के वनस्पति शास्त्र विभाग के पूर्व अध्यक्ष प्रेम शंकर दुबे का 27 अप्रैल, 2017 को निधन हो गया। वो 74 साल के थे। जाते-जाते उन्होंने अपना देह दान कर दिया है ताकि उनके मृत शरीर का इस्तेमाल मेडिकल कॉलेज में मेडिकल की पढ़ाई करने वाले छात्र कर सकें। प्रोफेसर दुबे ने अपनी अंतिम इच्छा में अपने परिजनों को बताया था कि उनकी मौत के बाद न तो शव यात्रा निकाली जाय, न ही उसका अंतिम विधिवत संस्कार किया जाय। उन्होंने दसवीं और तेरहवीं जैसे श्राद्ध कार्यक्रम भी नहीं कराने की इच्छा जताई थी। कोई श्रद्धांजलि सभा भी आयोजित नहीं करने की इच्छा उन्होंने जताई थी। उनकी हर इच्छा का उनकी धर्मपत्नी ने अक्षरश: पालन किया है।

दुनिया को अलविदा करते हुए भी प्रोफेसर दुबे ने एक सच्चे वैज्ञानिक और पर्यावरणविद् होने का सबूत जीवन के अंतिम क्षण तक दिया। वो देश के जाने-माने शिक्षाविद् और पर्यावरणविद् थे। उन्होंने साल 2001 से 2006 तक मध्य प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के अध्यक्ष (राज्यमंत्री) के महत्वपूर्ण पद पर अपनी सेवाएं दीं। साल 2011-2016 तक वे भारत सरकार में पर्यावरण एवं वन मंत्रालय की एक्सपर्ट एप्राईजल कमेटी के सदस्य भी रहे थे। वे विक्रम विश्वविद्यालय, उज्जैन में 1972 से 2001 तक वनस्पति शास्त्र विभाग के प्रोफेसर एवं विभागाध्यक्ष पद पर रहे। विक्रम विश्वविद्यालय में साल 1985 में इंस्टीट्यूट ऑफ इन्वायरमेंट मैनेजमेंट विभाग की स्थापना उन्हीं के प्रयासों से हुई थी।

प्रोफेसर दुबे वनस्पति शास्त्र और पर्यावरण विज्ञान को बड़ी ही कुशलता से सामाजिक स्वरुप देने में माहिर थे। वो हमेशा चाय बनने के बाद चाय पत्ती का उपयोग गुलाब के गमले में खाद के रुप में करते थे। मध्य प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के अध्यक्ष पद पर रहते हुए उन्होंने अनेक ऐसी पहलों की शुरुआत की जो वर्तमान में मध्य प्रदेश सरकार के महत्वपूर्ण अंग के रुप में काम कर रही हैं। उन्होंने हरित क्रांति के क्षेत्र में भी कई काम किए हैं। वो अलग तरह के शख्सियत थे, जिन्होंने कभी भी सामाजिक और पारिवारिक रुढ़िवादिताओं से समझौता नहीं किया। न कभी किसी पद लोलुपता ने उन्हें डिगाया। वे बेहद सहज और सरल स्वभाव के व्यक्ति थे। राज्यमंत्री का दर्जा प्राप्त होने के बावजूद कभी भी उन्होंने अपनी गाड़ी पर लालबत्ती नहीं लगाई। उन्होंने कभी भी ऐसा काम नहीं किया जो लोगों को लोगों से दूर करता हो। वो सभी को साथ लेकर चलने में यकीन रखते थे। अपने विषय को शोधार्थियों के अलावा दूसरे विषय के शोधार्थियों को भी वो अक्सर मदद किया करते थे।

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