जब एक सीएम ने राजमाता विजयाराजे सिधिंया की फाइल पर लिख दिया था ‘ऐसी की तैसी’

जब से ज्योतिरादित्य सिंधिया बीजेपी में गए हैं, लोग जनसंघ की उस नेता को लगातार राजनीतिक गलियारों में चर्चा कर रहे हैं, जिन्होंने एक अपमान का बदला लेने के लिए कांग्रेस की सरकार गिरवाकर, मध्यप्रदेश में पहली गैर-कांग्रेसी सरकार बनवा दी थी। हम बात कर रहे हैं राजमाता विजया राजे सिंधिया की।

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विजया राजे सिंधिया और गोविंद नारायण सिंह (फोटो- Indian Express &govindnarayansingh.org)

मध्यप्रदेश की राजनीति में राजमाता विजया राजे सिंधिया का नाम हमेशा एक बड़े राजनीतिज्ञ के तौर पर लिया जाता रहा है। हालांकि कई बार उन्हें इस क्षेत्र में कुछ ऐसा भी सामना करना पड़ा, जिसका अंदेशा उन्हें खुद भी नहीं था। ऐसा ही एक किस्सा है, जब मध्यप्रदेश के एक सीएम ने उनकी फाइल पर ‘ऐसी की तैसी’ लिख दिया। क्या था पूरा मामला पढ़िए ये रिपोर्ट…

ज्योतिरादित्य सिंधिया की दादी और ग्वालियर की राजमाता के राजनीतिक किस्से और अपमान का बदला लेने की कहानियां अक्सर चर्चाओं में बनी रहती है। आज हम आपको एक ऐसी कहानी से रूबरू कराने जा रहे हैं, जब एक मीटिंग के कारण कांग्रेस को मध्यप्रदेश का सत्ता खोना पड़ा था।

राजमाता विजया राजे सिंधिया ने भी राजनीति की शुरुआत कांग्रेस से ही की थी। हालांकि 10 साल बाद ही उनका कांग्रेस से मोह भंग हो गया और उन्होंने कांग्रेस छोड़, निर्दलीय चुनाव के मैदान में उतर गईं। चुनाव के बाद 36 विधायकों ने भी कांग्रेस को छोड़ दिया और राजमाता के साथ हो लिए।

क्यों छोड़ा कांग्रेस

दरअसल राज्य में उस समय कांग्रेस के डीपी मिश्रा मुख्यमंत्री थे। ग्वालियर में हुए छात्र आंदोलन को लेकर मुख्यमंत्री और राजमाता में अनबन हो गई। एक मीटिंग में राजमाता को सीएम ने काफी देर तक इंतजार करवाया। जिसे राजमाता ने अपना अपमान समझा और कांग्रेस छोड़ दी।

कांग्रेस छोडने के बाद उन्होंने निर्दलीय चुनाव लड़ा और जीत गईं। चुनाव के बाद कांग्रेस से भी विधायक टूटे। विजया राजे ने इन विधायकों के समर्थन से  गोविंद नारायण सिंह को मुख्यमंत्री बनवा दिया। इस तरह मध्य प्रदेश में पहली गैर-कांग्रेसी सरकार बनी और डीपी मिश्रा को इस्तीफा देना पड़ गया। हालांकि गोविंदनारायण से भी राजमाता की उतनी बनी नहीं।

हाल ही में आई एक किताब राजनीतिनामा मध्यप्रदेश के अनुसार गोविंद नारायण का काल भारी अनियमितताओं के लिए जाना गया। राजमाता सीधे सरकार में तो नहीं थी, लेकिन उनका हस्तक्षेप लगातार जारी रहा। राजमाता संयुक्त विधायक दल की नेता थी और सरकार पर नजर रखने के लिए उन्होंने अपने सबसे खास सरदार आंद्रे को मध्यथ बना रखा था। शुरूआत में तो गोविंद नारायण, राजमाता के सभी आदेशों को मान लेते थे, लेकिन बाद में वो भी इससे तंग आ गए। राजमाता के नाम से अधिकारियों की नियुक्ति और ट्रांसफर होते रहा।

गोविंद नारायण के पास राजमाता की फाइल आती और उसे ज्यों का त्यों पास कर दिया जाता था। इसी तरह की एक फाइल पर गोविंद नारायण ने लिख दिया ‘ऐसी की तैसी’। बस फिर क्या था, हो गया बवाल। लोग कहने लगे कि सीएम ने राजमाता की फाइल पर गाली लिख दी है। बाद में गोविंद नारायण ने सबको समझाया कि इसका मतलब होता है ‘एज प्रपोज्ड’, यानि कि आपने जैसे लिखा वैसा माना।

हालांकि गोविंद नारायण की सरकार भी ज्यादा दिन नहीं चली और 2 साल के अंदर ही उन्हें ये कुर्सी छोड़नी पड़ गई।