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और मेहर ने JNU को कहा धन्यवाद

दलित छात्रों के साथ कथित भेदभाव के आरोपों से घिरे जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) प्रशासन ने अपने एक दलित छात्र मदन मेहर के मसले को निपटाने में तेजी दिखाई।

Author नई दिल्ली | January 31, 2016 1:38 AM
JNU के दलित छात्र मदन मेहर

दलित छात्रों के साथ कथित भेदभाव के आरोपों से घिरे जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) प्रशासन ने अपने एक दलित छात्र मदन मेहर के मसले को निपटाने में तेजी दिखाई। खुदकुशी की धमकी देकर मसले को उभार देने वाले छात्र मदन मेहर की छात्रवृत्ति बहाल कर दी गई है। विश्वविद्यालय ने इसकी पुष्टि की है। शोधार्थी ने एक हफ्ते के भीतर अपनी फेलोशिप बहाल करने की मांग करते हुए कहा था कि ऐसा न हुआ तो वह खुदकुशी कर लेगा।

विश्वविद्यालय के नए कुलपति प्रोफेसर एम जगदीश कुमार ने पदभार संभालने के 48 घंटे के भीतर परिसर को हिला देने वाले इस मामले को सुलझा दिया। हैदराबाद विश्वविद्यालय में दलित शोधार्थी रोहित वेमुला की खुदकुशी को लेकर राष्ट्रव्यापी आक्रोश के बीच जेएनयू के एक दलित छात्रों की खुदकुशी की धमकी ने जेएनयू को बीच बहस में ला दिया था। कुलपति कुमार को कमान संभालते ही यह चुनौती मिली थी। मानव संसाधन विकास मंत्रालय ने जेएनयू प्रशासन से मदन की वास्तविक शिकायत पर तुरंत गौर करने को कहा था।

विश्वविद्यालय के मुताबिक, मदन ने शनिवार दोपहर विश्वविधालय प्रशासन को पत्र लिखकर बताया कि उसे किन हालात में छात्रवृत्ति को शोध से इतर खर्च करना पड़ा। लिखित रूप से उन्होंने अपने परिवार में हुई मौतों का जिक्र कर अपनी छात्रवृत्ति को दोबारा बहाल करने की अपील की थी। छात्रवृत्ति बहाल होने पर मदन ने विश्वविद्यालय प्रशासन और खासकर कुलपति का धन्यवाद किया है। इसके अलावा विश्वविद्यालय ने दावा किया है कि जेएनयू में किसी भी दलित छात्र के साथ भेदभाव नहीं है। छात्रों की तमाम शिकायतों का निपटारा होगा।

जगदीश कुमार के लिए यह पहली चुनौती इसलिए भी थी क्योंकि विश्वविद्यालय के तत्कालीन कुलपति प्रोफेसर सुधीर कुमार सोपोरी ने अपने कार्यदिवस के अंतिम दिन दावा किया था कि उन्होंने इस मुद्दे पर ‘औपचारिक कार्रवाई’ कर आठ फरवरी को इस मुद्दे को सुलझाने की तारीख तय कर दी गई है। माना जा रहा था कि ऐसा कर सोपोरी ने गेंद कुमार के पाले में डाल दी थी।

मदन मेहर को राजीव गांधी राष्ट्रीय छात्रवृत्ति योजना के तहत कई छात्रवृत्तियां दी गई हैं। अंतरराष्ट्रीय संगठन (ओआरजी) प्रभाग से जुड़े इस शोधार्थी को ब्रुसेल्स जाने के लिए 66,000 रुपए का अग्रिम भुगतान हो गया था। लेकिन घर में हुई कई मौतों और उससे पहले दादी के अस्पताल खर्च के कारण वह छात्रवृत्ति को इसी में खर्च करने पर मजबूर हो गया था। तब विश्वविद्यालय ने ‘तय नियम का पालन न कर पाने के कारण ’ छात्र का पंजीकरण खत्म कर दिया था। मदन दोबारा पंजीकरण करने और छात्रवृति शुरू करने की लगातार मांग कर रहा था। यह मामला जिस रास्ते सुलझा वह देश के चोटी के विश्वविद्यालय के प्रशासन को सवालों के घेरे में लाता है। मानव संसाधन मंत्रालय ने शिकायत को वास्तविक बताते हुए कहा था, ‘वास्तविक शिकायत पर गौर किया जाना चाहिए’।

छात्र संगठन इस मुद्दे पर दबाव बनाने के लिए रणनीति तय कर रहे थे। वे आठ फरवरी के इंतजार में थे। लेकिन उससे पहले मामले को सुलझाकर विश्वविद्यालय ने आंदोलन के दबाव को टाल दिया है। लेकिन विश्वविद्यालय को इस बाबत अभी पाक-साफ होना बाकी है। मदन के बाद विश्वविद्यालय के नौ और छात्रों ने दावा किया कि उन्हें जातिगत आधार पर प्रताड़ित किया जा रहा है। इंटरनेशनल आर्गनाइजेशन (ओआरजी) डिवीजन सीआइपीओडी के शोधार्थी ने आरोप लगाया है कि उनका विभाग उनकी पीएचडी रोकने का प्रयास कर रहा है और उसे प्रताड़ित कर रहा है। विश्वविद्यालय प्रशासन को अब इससे निपटना होगा।

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