पश्चिम एशिया में जारी युद्ध के चलते देश के कई हिस्सों में एलपीजी की कमी देखने को मिल रही है। इस बीच मुंबई में श्रमिकों का पलायन भी शुरू हो गया है। हालांकि, यह पलायन सीधे तौर पर नहीं देखने को मिल रहा लेकिन मुंबई के रेलवे स्टेशनों पर यह साफ जाहिर है कि बिहार और यूपी जाने वाली ट्रेनों में भीड़ बढ़ गयी है और टिकट की मारामारी है।

पिछले हफ्ते पांच दिनों तक, इंडियन एक्सप्रेस ने मुंबई से रवाना होने वाली तीन ट्रेनों उत्तर प्रदेश जाने वाली कामायनी एक्सप्रेस, बिहार जाने वाली एलटीटी राजगीर एक्सप्रेस और पश्चिम बंगाल जाने वाली सीएसएमटी हावड़ा मेल पर नजर रखी। 2011 की जनगणना के अनुसार, मुंबई में रहने वाले प्रवासियों की सबसे बड़ी संख्या उत्तर प्रदेश से है जबकि बिहार और पश्चिम बंगाल के प्रवासी भी बड़ी संख्या में हैं।

लोकमान्य तिलक टर्मिनस (एलटीटी) और छत्रपति शिवाजी महाराज टर्मिनस (सीएसएमटी) पर पांच दिनों तक प्रवासियों से बातचीत की। इस दौरान 130 लोगों में से 62 ने एलपीजी संकट के कारण घर लौटने की बात कही। एलटीटी में 70 में से 40 लोगों ने एलपीजी संकट को अपने घर लौटने का कारण बताया। सीएसएमटी में 50 में से 22 लोगों ने भी यही बात कही।

ब्लैक मार्केट में एलपीजी सिलेंडरों की ऊंची कीमत

पश्चिम एशिया में चल रहे संघर्ष ने आपूर्ति बाधित कर दी है जिसके चलते 5 किलो के सिलेंडरों की कालाबाजारी में कीमतें 500-550 रुपये से बढ़कर 1100-2000 रुपये हो गई हैं, और 14.2 किलो के सिलेंडरों की कीमतें 900-1200 रुपये से बढ़कर 3200-4000 रुपये हो गई हैं। प्रवासी श्रमिकों के अनुसार,रजिस्टर्ड कनेक्शन के लिए आवश्यक केवाईसी दस्तावेज न होने के कारण अधिकांश प्रवासी श्रमिकों को आधिकारिक दरों पर सिलेंडर नहीं मिल पा रहे हैं। उनका कहना है कि जब होटल का खाना बहुत महंगा हो गया और बचत खत्म होने लगी तो घर लौटना ही एकमात्र विकल्प बचा।

घर वापसी को मजबूर प्रवासी मजदूर

24 वर्षीय विशेष त्यागी पिछले पांच सालों से मुंबई की एक प्लंबिंग सामग्री बनाने वाली फैक्ट्री में काम कर रहे हैं। वे कुछ दिनों की छुट्टी के लिए वाराणसी में अपने घर गए थे और 19 मार्च को लौटे। पांच दिन बाद, वे वापस ट्रेन में सवार हो गए। इंडियन एक्सप्रेस से बातचीत के दौरान विशेष ने बताया कि उन्हें गैस सिलेंडर नहीं मिल पा रहा था, बाहर खाना खाने का खर्च भी नहीं उठा सकते थे, ऐसे में उन्हें मुंबई में रुकने का कोई मतलब नहीं दिख रहा था।

‘खाना पकाने के लिए लकड़ी और कोयला खरीदने की हिम्मत नहीं’

यह कोविड-19 महामारी के दौरान हुआ सामूहिक पलायन नहीं है बल्कि लोग स्थिति पर नजर रखते हुए और स्थिति स्थिर होते ही लौटने की योजना के साथ जा रहे हैं। कामायनी एक्सप्रेस से उत्तर प्रदेश के ग़ाज़ीपुर जा रहीं कुसुम गुप्ता के पति एक रिक्शा चालक हैं, वह उन्हें स्टेशन पर छोड़कर वापस चले गए। वे स्थिति पर नज़र रखने के लिए मुंबई में ही रुके हुए हैं। उन्होंने इंडियन एक्सप्रेस से कहा, “मेरे पास खाना पकाने के लिए लकड़ी और कोयला खरीदने की हिम्मत नहीं है। यह बहुत थका देने वाला काम है। मैं केरोसिन का इस्तेमाल करना चाहती थी लेकिन वह भी उपलब्ध नहीं है।” हालात सुधरने तक वे यहां से जा रही हैं।

उत्तर प्रदेश के भदोई जा रहे साहिल रेहम शेख साल 2005 से मुंबई में रह रहे हैं और घर-घर जाकर सफाई के सामान बेचते हैं। उन्होंने कहा, “मुंबई में इतनी सारी मुश्किलों का सामना करते-करते मैं थक गया हूं। 2020 में, कोविड-19 महामारी के कारण मेरा कारोबार बंद हो गया। अब, एलपीजी सिलेंडरों की कमी है, और कई अन्य समस्याएं भी हैं।” वे घर जा रहे हैं लेकिन वापस आएंगे या नहीं, यह उन्होंने अभी तय नहीं किया है।

एलपीजी कनेक्शन के लिए जरूरी कागजात होने के बाद भी नहीं मिला सिलेंडर

मुंबई में आठ साल से रह रहे टैक्सी ड्राइवर राम लखन यादव के पास आधार कार्ड , पता प्रमाण, पंजीकृत एलपीजी कनेक्शन के लिए ज़रूरी सारे कागजात थे लेकिन फिर भी कोई फर्क नहीं पड़ा। उन्होंने कहा, “मैंने कुर्ला, अंधेरी की कई दुकानों में जरूरी दस्तावेज दिखाकर छानबीन की लेकिन मुझे सिलेंडर नहीं मिला।”

हावड़ा मेल द्वारा पश्चिम बंगाल के बीरभूम जा रहे सुखदीप बाओरी के ग्यारह सहकर्मी उनके साथ वापस जा रहे हैं। उन्होंने कहा, “मैंने चार अलग-अलग दुकानों पर घंटों कतार में इंतजार किया लेकिन आमतौर पर मेरी बारी आने से पहले ही स्टॉक खत्म हो जाता था।” पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के बाद वे अपने नियोक्ता को फोन करके यह पता लगाने की योजना बना रहे हैं कि स्थिति में सुधार हुआ है या नहीं, उसके बाद ही वे वापस लौटेंगे।

क्या ईरान युद्ध के कारण खाने-पीने की चीजों के बढ़ेंगे दाम?

पश्चिम एशिया में युद्ध से बाजार की हालत बिगड़ गई है। लोगों की चिंता है कि युद्ध के कारण क्या खाद्य पदार्थों की महंगाई बढ़ेगी? 2020 में जब कोविड आया, तो भारत के सरकारी गोदामों में गेहूं और चावल का पर्याप्त स्टॉक था। उस समय कृषि राहत का एक जरिया थी। इस बार भी स्थिति कुछ वैसी ही लग रही है। पूरी खबर पढ़ने के लिए क्लिक करें