इजरायल-अमेरिका-ईरान के बीच चल रहे संघर्ष के चलते LPG सिलेंडरों की सप्लाई में रुकावटें आ रही हैं। इस कमी का असर पूरे भारत में देखने को मिल रहा है। कई होटल और रेस्टोरेंट जहां अस्थायी रूप से बंद हो रहे हैं तो वहीं एलपीजी सिलेंडर विक्रेताओं के यहां लंबी-लंबी कतारें देखने को मिल रही हैं। एलपीजी की कमी का असर मुंबई में भी देखने को मिल रहा है जहां के प्रसिद्ध डब्बावालों को काफी दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है।
मुंबई की टिफिन सर्विस को एलपीजी सिलेंडरों की कमी ने बिगाड़ दिया है। विभिन्न इलाकों में डब्बावालों को मजबूरन बदलाव करने पड़ रहे हैं। किसी को मेन्यू में कटौती करनी पड़ रही है, कीमतें बढ़ानी पड़ रही हैं या कुछ तो पूरी तरह से बंद हो गए हैं।
रसोई चलाने के लिए ‘सिगड़ी’ का सहारा ले रहे डब्बावाले
साकिनाका में 2009 से यम्मी टिफिन्स चला रहे चिराग पुरोहित ने एलपीजी सिलेंडर न मिलने के कारण अपनी रसोई चलाने के लिए लकड़ी और कोयले से जलने वाली ‘सिगड़ी’ का सहारा लिया है। उन्होंने इंडियन एक्सप्रेस से बातचीत के दौरान कहा, “रोटी-सब्जी के अलावा, हम हाई प्रोटीन राइस बाउल भी बनाते थे लेकिन अब हमें उन्हें भी बंद करना पड़ा है। ऑर्डर प्रतिदिन 500 डिब्बों से घटकर लगभग 300 रह गए हैं। सिगड़ी पर खाना पकाने में बहुत अधिक समय लगता है। आप लकड़ी या कोयले पर चाइनीज व्यंजन या ऐसे स्नैक्स नहीं बना सकते जिन्हें ठीक से तलने की जरूरत होती है।”
भांडुप में भोजन्यान टिफिन सर्विस चलाने वाले 29 वर्षीय ओमकार अजीत पाटकर का कहना है कि उनका कारोबार बंद होने की कगार पर है। उन्होंने कहा, “पिछले दो हफ्तों में हमें एक भी एलपीजी सिलेंडर नहीं मिला है। अब वे दो इलेक्ट्रिक कॉइल स्टोव पर निर्भर हैं। गैस पर खाना बनाने की तुलना में इसमें दोगुने से भी ज्यादा समय लगता है। उन्होंने स्विगी और ज़ोमैटो के ज़रिए ऑर्डर लेना बंद कर दिया है और सिर्फ़ प्री-ऑर्डर ही ले रहे हैं। उनका मेन्यू, जिसमें पहले बिरयानी से लेकर कई तरह के खाने के विकल्प होते थे अब रोटी, एक शाकाहारी व्यंजन, एक मांसाहारी व्यंजन और दाल-चावल तक सीमित हो गया है।
रोटी के कारोबार पर असर
नितिन मोरगांवकर जो ‘आइचा डब्बा टिफिन सर्विस’ चलाते हैं, उनके लिए 14 किलो के सिलेंडर की कीमत 920 रुपये से बढ़कर 2500 से 3000 रुपये के बीच हो गई है। साधारण रोटी-सब्जी जिसकी कीमत पहले 120 रुपये थी, अब 135 रुपये हो गई है; डिलीवरी के साथ यह 175 रुपये हो जाता है। वहीं, मुनाफा लगभग 30 प्रतिशत कम हो गया है। सबसे ज्यादा नुकसान उनके रोटी आपूर्ति के कारोबार को हुआ है, जहां पांच महिलाएं मिलकर थोक बिक्री के लिए प्रतिदिन लगभग 2,000 चपातियां बनाती थीं। नितिन ने कहा, “मुझे बहुत बुरा लग रहा है कि मैंने इन महिलाओं से काम छीन लिया है लेकिन मेरे पास कोई विकल्प नहीं था।”
रेस्टोरेंट बंद होने से बढ़ी मांग
अजीत ने आगे कहा, “मैं रसोई के लिए हर महीने 25,000 रुपये किराया देता हूं और मेरे पास सात कर्मचारी हैं सिर्फ़ दो इलेक्ट्रिक स्टोव के साथ काम चलाना मुमकिन नहीं है। मांग में कोई कमी नहीं आई है बल्कि मांग बढ़ रही है क्योंकि कई रेस्टोरेंट बंद हो रहे हैं।” ठाणे के वर्तक नगर में भूमि टिफिन्स के मालिक ने एक आपातकालीन योजना तैयार रखी है। उन्होंने कहा, “अगर मेरा सामान खत्म हो जाता है तो मैं वापस घर से खाना बनाना शुरू कर दूंगा जहां गैस पाइपलाइन है।”
राज्यों को कमर्शियल एलपीजी की आपूर्ति में 20% की बढ़ोत्तरी
इस बीच, सोमवार से केंद्र सरकार ने सभी राज्यों को कमर्शियल एलपीजी की आपूर्ति में 20% की बढ़ोत्तरी कर दी है। 21 मार्च को जारी एक पत्र में केंद्रीय पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस मंत्रालय ने कहा कि अतिरिक्त 20% आवंटन को रेस्तरां, ढाबे, होटल, औद्योगिक कैंटीन, डेयरी इकाइयों, राज्य सरकारों या स्थानीय निकायों द्वारा संचालित रियायती कैंटीन या आउटलेट, सामुदायिक रसोई और प्रवासी श्रमिकों के लिए 5 किलो के मुफ्त एलपीजी सिलेंडरों सहित प्रमुख क्षेत्रों को प्राथमिकता दी जानी चाहिए, साथ ही एलपीजी के दुरुपयोग को रोकने के उपाय भी किए जाने चाहिए।
सिलेंडर मिलने में 5 से 6 दिन लगेंगे
टिफिन सेवा व्यवसाय से जुड़े लोगों का कहना है कि उन्हें अभी तक इस बारे में कोई जानकारी नहीं है कि सिलेंडर उन तक कब पहुंचेंगे या इस तरह का कोई निर्देश उन्हें नहीं दिया गया है। चिराग पुरोहित ने कहा, “मैंने शनिवार को गैस एजेंसी को फोन किया और मुझे बताया गया कि सिलेंडर मिलने में 5 से 6 दिन और लगेंगे। मैंने सोमवार को दोबारा फोन किया तब भी कोई स्पष्ट जवाब नहीं मिला।”
अजीत पाटकर ने कहा कि बढ़े हुए आवंटन से उनके जैसे ऑपरेटरों की स्थिति में अभी तक कोई बदलाव नहीं आया है। अस्पतालों को टिफिन की आपूर्ति करने वाले पाटकर ने बताया कि उन्हें एक पत्र मिला है जिसमें कहा गया है कि वे आवश्यक सेवाओं के अंतर्गत आते हैं और उन्होंने इसे गैस एजेंसी को सौंप दिया लेकिन अभी तक उन्हें कोई जवाब नहीं मिला है।
शिमला में LPG संकट की मार
एलपीजी की कमी का असर हिमाचल प्रदेश में भी देखने को मिल रहा है जहां शिमला के एक लोकप्रिय होटल में पारंपरिक चूल्हे का इस्तेमाल शुरू कर दिया गया है। इसके साथ ही विधानसभा की रसोई में भी ‘चार’ का इस्तेमाल शुरू कर दिया गया है। पूरी खबर पढ़ने के लिए क्लिक करें
