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दिल्ली मेरी दिल्ली: गठबंधन का मुद्दा

जनवरी में प्रदेश अध्यक्ष बनीं शीला दीक्षित पहले तो गठबंधन के पक्ष में बोलीं, लेकिन बाद में अड़ गईं। फिलहाल दोनों दल प्रचार अभियान इसी बात को मुद्दा बनाएंगे कि अमुक पार्टी ने गठजोड़ नहीं होने दिया, इसलिए उस पर विश्वास न किया जाए।

Author April 15, 2019 5:58 AM
गठबंधन होने पर भाजपा के नेता यह मुद्दा बनाते कि ‘आप’ कांग्रेस की ‘बी’ टीम है।

-बेदिल

लोकसभा चुनाव को लेकर आम आदमी पार्टी (आप) और कांग्रेस में गठबंधन न होना आखिरकार तय हो ही गया है। ‘आप’ के नेता कई दिनों तक सीटों के तालमेल की कोशिश में लगे थे और इसी बीच पार्टी ने अपने उम्मीदवार घोषित करके चुनाव प्रचार भी शुरू कर दिया। पार्टी एक तरफ तो कांग्रेस से गठजोड़ के लिए हाथ-पांव मार रही थी दूसरी तरफ उस पर तरह-तरह के हमले भी कर रही थी। दिल्ली में ‘आप’ के आने के बाद कांग्रेस की जो दुर्दशा हुई, उससे परेशान कुछ नेता तो अपने बूते चुनाव ही नहीं लड़ना चाह रहे थे। कुछ नेताओं को लगता था कि जिस ‘आप’ ने कांग्रेस की दुगर्ति की है उससे गठबंधन करके उसे ताकतवर क्यों बनाया जाए। सितंबर में अजय माकन का प्रदेश अध्यक्ष पद से इस्तीफा देना और बाद में गठबंधन की वकालत करना इसी अफरातफरी का उदाहरण है। जनवरी में प्रदेश अध्यक्ष बनीं शीला दीक्षित पहले तो गठबंधन के पक्ष में बोलीं, लेकिन बाद में अड़ गईं। फिलहाल दोनों दल प्रचार अभियान इसी बात को मुद्दा बनाएंगे कि अमुक पार्टी ने गठजोड़ नहीं होने दिया, इसलिए उस पर विश्वास न किया जाए। 16 अप्रैल को दिल्ली की सीटों पर चुनाव की अधिसूचना के बाद असली चुनाव प्रचार शुरू होगा, लेकिन अभी तो यही लग रहा है कि ये दोनों दल अब सबसे पहले इसी मुद्दे पर उलझेंगे।

टिकट की होड़
आम आदमी पार्टी और कांग्रेस के गठबंधन का इंतजार करते-करते भाजपा के टिकट पर रोजाना उम्मीदवार घोषित होने के दावे किए जा रहे हैं। दिल्ली की सातों सीटों पर भाजपा के सांसद हैं। वैसे तो हर सीट पर कई दावेदार हैं, लेकिन प्रदेश भाजपा अध्यक्ष मनोज तिवारी की उत्तर-पूर्वी दिल्ली की सीट पर तो दावेदारों की लंबी लाइन लगी हुई है। इस क्रम में पहले तो पूर्व सांसद लालबिहारी तिवारी, हिंदू फ्रंट के नेता जय भगवान गोयल और कालकापीठ के महंत सुरेंद्र नाथ अवधूत का नाम चर्चा में आया, उसके बाद बिहार मूल के एक पुलिस अधिकारी का नाम भी उछलने लगा। उम्मीदवार तय करने में जितनी देरी हो रही है, उतने ही लोग दावेदार बन रहे हैं। कहने के लिए क्रिकेटर गौतम गंभीर के भाजपा में आने से नई दिल्ली की सांसद मीनाक्षी लेखी परेशान हुई हों, लेकिन हर सीट पर नेता चुनाव प्रचार करने के बजाय अपना टिकट बचाने के लिए ज्यादा सक्रिय दिख रहे हैं।

मुलाकात का राज
दिल्ली में आम आदमी पार्टी और कांग्रेस के बीच चुनावी गठबंधन की बातचीत के दरम्यान कई ऐसे वाकये हुए जो दिल्ली की सियासत की यादगार दास्तान के रूप में याद किए जाएंगे। ऐसा ही एक वाकया तब हुआ जब सीटों के बंटवारे के मुद्दे पर दिल्ली कांग्रेस के प्रभारी पीसी चाको और आम आदमी पार्टी के सांसद संजय सिंह के बीच मुलाकात की खबरें तेजी से फैलीं। कहा गया कि संजय सिंह चाको के घर पर गए और वहां करीब 45 मिनट तक बैठे भी। यह खबर सियासी गलियारों में तैरती रही, लेकिन दोनों में से कोई भी नेता यह मानने को तैयार नहीं था कि उन दोनों की कोई मुलाकात हुई है। संजय सिंह को लेकर यह कहा जाता रहा कि वे व्यक्तिगत तौर पर इसलिए गठबंधन की वकालत करते रहे क्योंकि उन्हें उम्मीद थी कि अगर कहीं केंद्र में विपक्षी दलों की सरकार बनी तो ‘आप’ का सबसे वरिष्ठ सांसद होने की वजह से उनके लिए मंत्री बनने के रास्ते खुल जाएंगे। बहरहाल, संजय सिंह भी इस खबर की पुष्टि नहीं कर रहे थे कि उनकी चाको से मुलाकात हुई है। उधर, चाको के घर पर भी कांग्रेसियों की आवाजाही जारी थी। सबकी जुबान पर यही सवाल था कि मुलाकात हुई या नहीं। चाको भी इस सवाल से कुछ खीझ से गए थे। जब एक नेता ने इस बारे में उनसे जानना चाहा तो बोले, अरे भाई! वे मेरे पड़ोसी हैं। अक्सर मुलाकात और दुआ सलाम होती रहती है। इसमें कौन सी नई बात है। उसके बाद जिज्ञासु लोगों ने चाको के नॉर्थ एवेन्यू स्थिति सरकारी आवास से खिसकना शुरू कर दिया।

खुदाई बनी आफत
खान-पान व शादियों की खरीदारी को लेकर चर्चा में रहने वाला चांदनी चौक इन दिनों किसी और वजह से चर्चा में है। इन दिनों यहां हाय-हाय और तौबा-तौबा की रट सुनी जा सकती है। विकास के नाम पर इलाके में हुई खुदाई अब लोगों के लिए आफत बनती जा रही है। चांदनी चौक को जाम से निजात दिलाने का दावा इन दिनों जाम का मुख्य कारण बन गया है। इतना ही नहीं, ट्रैफिक पुलिस की मिलीभगत से यहां ऑटोवालों का खेल भी चल रहा है। वे संकरे रास्तों में ऑटो के साथ खड़े हो जाते हैं ताकि परेशान खरीदारों से मनमानी वसूली की जा सके। लोगों को अक्सर कहते सुना जा सकता है कि सरकार व निगम ने समस्या की जड़ में जाने के बजाय इलाके को चौपट करके रख दिया है। दरअसल यहां लाल किले से लेकर फतेहपुरी मस्जिद तक सड़क के दोनों ओर अवैध कब्जे हैं, जिन्हें बगैर हटाए जाम की समस्या से निजात नहीं मिल सकता।

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