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Lok Sabha Election 2019: वरुण से सीट की अदला बदली, पर सुल्तानपुर से मेनका का पुराना नाता

अगस्त 2014 में अमित शाह ने उन्हें अपनी टीम से बाहर किया। नरेंद्र मोदी और भाजपा की केंद्र्र-प्रदेश सरकार के नाम और काम के जिक्र से उनके परहेज ने उन्हें बेगाना बना दिया । 2017 के विधानसभा चुनाव में उन्होंने अपने संसदीय क्षेत्र की ओर रुख नहीं किया।

Author Published on: April 1, 2019 2:32 AM
तीन दशकों के अंतराल में पांच साल पहले 2014 में मेनका पुत्र वरुण की सुल्तानपुर में सहायता करने की लिए आई थीं।

राज खन्ना

मेनका गांधी का सुल्तानपुर से परिचय पुराना है। पति संजय गांधी की मृत्यु के बाद अपनी राजनीतिक यात्रा की शुरुआत के लिए 18 सितंबर 1982 को वे गौरीगंज (अमेठी) पहुंची थीं। 1977 के चुनाव मे भी वे पति के साथ सक्रिय थीं। हालांकि 1980 के चुनाव में वरुण के जन्म के कारण वे अमेठी नहीं आ सकी थीं। सुल्तानपुर जिला मुख्यालय था। पति को खोने का दु:ख और पारिवारिक कडुवाहट। लगभग दो वर्ष तक देश के शिखर राजनीतिक परिवार की कलह का अमेठी-सुल्तानपुर चश्मदीद बना। मेनका अपने दिवंगत पति की कर्मभूमि से राजनीतिक आसरा चाहती थीं। 1984 के चुनाव में वे जेठ राजीव गांधी के अमेठी में सामने थीं। नतीजों ने उन्हें निराश किया। अनेक कारण थे। पराजित मेनका फिर अमेठी-सुल्तानपुर को भूल गईं।

तीन दशकों के अंतराल में पांच साल पहले 2014 में मेनका पुत्र वरुण की सुल्तानपुर में सहायता करने की लिए आई थीं। 2019 में सुल्तानपुर के रण में अगर वे सीधे सामने हैं, तो भी पुत्र की ही सहायता के लिए। वरुण 2019 में सुल्तानपुर से चुनाव लड़ने का साहस नहीं बटोर सके। मेनका उन्हें पीलीभीत के मैदान में उतारकर करनाल से लड़ना चाहती थीं। पार्टी तैयार नहीं हुई। बात मां-बेटे की सीट की अदला-बदली से बनीं। चार मौकों पर सुल्तानपुर में भाजपा जीती है। हर बार बाहरी प्रत्याशी थोपे जाने से अपना हक छिनने का पार्टी का लोगों को मलाल है। मेनका सुल्तानपुर से पहली बार चुनाव के मैदान में हैं। पर पुत्र वरुण के गुजरे कार्यकाल के कार्य-व्यवहार की जबाबदेही भी उन पर आ गई है। वरुण गांधी के साथ दिलचस्प संयोग जुड़ा है। 2009 में वे पहली बार पीलीभीत से सांसद चुने गए। कुछ ही महीनों के अंतराल में 9 दिसंबर 2009 को उन्होंने खुर्शीद क्लब सुल्तानपुर में एक बड़ी जनसभा करके सुल्तानपुर से जुड़ने का संकेत दे दिया। 2014 में सुल्तानपुर से जीत के साथ ही उनके सुल्तानपुर से मोहभंग की चर्चा शुरू हो गई। सुल्तानपुर में वे 1,78,902 वोटों के फासले से जीते थे। वरुण इस अंतर से संतुष्ट नहीं थे।

अगस्त 2014 में अमित शाह ने उन्हें अपनी टीम से बाहर किया। नरेंद्र मोदी और भाजपा की केंद्र्र-प्रदेश सरकार के नाम और काम के जिक्र से उनके परहेज ने उन्हें बेगाना बना दिया । 2017 के विधानसभा चुनाव में उन्होंने अपने संसदीय क्षेत्र की ओर रुख नहीं किया। फिर भी पांच में चार सीटों पर भाजपा जीती। वरुण से इन विधायकों के कामकाजी रिश्ते भी नहीं बन सके। अब जब मेनका मैदान में हैं तो वरुण को लेकर हुए अनुभव भाजपाइयों को बेचैन कर रहे हैं। अगले कुछ दिनों में मेनका की शैली से साफ होगा कि वरुण के कारण दूर हुआ कैडर उनसे और उनके चुनाव अभियान में कितना जुड़ता है? मेनका का नाम और कद बड़ा है। वे गांधी परिवार से हैं। मोदी मंत्रिमंडल की सदस्य हैं। मेनका के मुकाबले कांग्रेस के डॉ संजय सिंह कांग्रेस के उम्मीदवार हैं। बसपा-सपा गठबंधन ने चंद्र भद्र सिंह सोनू को संसदीय क्षेत्र का प्रभारी घोषित किया है। वे तीन बार इसौली से विधानसभा चुनाव जीत चुके हैं। 2017 में भाजपा से टिकट में विफल रहने के बाद खिन्न थे।

कुछ महीने पहले बसपा से जुड़े। संजय सिंह का शुरुआती सफर संजय गांधी के साथ शुरू हुआ था। उनके निधन के बाद गांधी परिवार की धड़ेबंदी में वे राजीव गांधी के साथ थे। 1984 में राजीव-मेनका के बीच अमेठी में हुए मुकाबले की कमान संजय सिंह के हाथों में थीं। 2009 में 25 वर्षों के अंतराल पर संजय सिंह ने कांग्रेस के लिए सुल्तानपुर की सीट पर हलचल मचा दी थी। लेकिन 2014 ने उन्हें निराश किया। कांग्रेस का अपना वोट बैंक बिखर चुका है। अमेठी में गांधी परिवार की मौजूदगी सुल्तानपुर में अब तक बेअसर रही है। 2017 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस पार्टी सपा से गठबंधन में लड़ी थी। केवल कादीपुर की सीट पर कांग्रेस का प्रत्याशी था। चौथा नंबर था। कुल वोट 32,042 थे। सुल्तानपुर सीट मेनका की पहली पसंद नहीं थी। स्थानीय दावेदार पार्टी के फैसले से खिन्न हैं। सार्वजनिक रूप से भले न स्वीकारें पर चारों विधायक भी असंतुष्ट हैं।

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