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मध्य प्रदेशः मानसून की सुस्ती से मायूस मेहमान

मध्यप्रदेश में वन विभाग के साथ मिलकर खरमोर के संरक्षण के लिए वर्षों से सक्रिय पक्षी विज्ञानी अजय गड़ीकर ने मंगलवार को बताया कि धार जिले के सरदारपुर अभयारण्य, रतलाम जिले के सैलाना अभयारण्य, नीमच जिले के जीरन क्षेत्र और झाबुआ जिले के पेटलावद क्षेत्र में खरमोर के आगमन को लेकर अब तक आधिकारिक पुष्टि नहीं की गई है।

Author इंदौर | July 17, 2019 4:05 AM
(Photo- Wikimedia)

मानसून के आगमन में विलंब और इसकी सुस्त चाल के कारण मुफीद बसाहटें विकसित नहीं होने के चलते मध्य प्रदेश में इस बार खरमोर की आमद टल गई है। दुनिया की संकटग्रस्त प्रजातियों में शामिल मेहमान परिंदे का सूबे में इंतजार बरकरार है। प्रदेश में वन विभाग के साथ मिलकर खरमोर के संरक्षण के लिए वर्षों से सक्रिय पक्षी विज्ञानी अजय गड़ीकर ने मंगलवार को बताया कि धार जिले के सरदारपुर अभयारण्य, रतलाम जिले के सैलाना अभयारण्य, नीमच जिले के जीरन क्षेत्र और झाबुआ जिले के पेटलावद क्षेत्र में खरमोर के आगमन को लेकर अब तक आधिकारिक पुष्टि नहीं की गई है। उन्होंने बताया, ‘पश्चिमी मध्य प्रदेश के चारों इलाकों में खरमोर आमतौर पर जुलाई के पहले पखवाड़े में प्रजनन के लिए पहुंचते हैं। लेकिन इन मेहमान परिदों का अबकी बार दीदार नहीं हुआ है।’ गड़ीकर ने बताया कि खरमोर अपना घोंसला बनाने के लिए ग्रास लैंड (एक से डेढ़ फुट ऊंची हरी घास वाले क्षेत्र) को चुनते हैं। लेकिन इस बार मॉनसून की सुस्त चाल के चलते इनकी पारंपरिक बसाहट वाले क्षेत्रों में ग्रास लैंड का विकास ठीक से नहीं हो सका है। सूबे में खरमोर की आमद टलने की यह सबसे बड़ी वजह है।

उन्होंने बताया कि पिछले साल सरदारपुर अभयारण्य में 11, नीमच जिले के जीरन क्षेत्र में 16, झाबुआ जिले के पेटलावद क्षेत्र में नौ और रतलाम जिले के सैलाना अभयारण्य में चार खरमोर देखे गए थे। यानी गत मॉनसून सत्र के दौरान सूबे में इनकी कुल तादाद 40 आंकी गई थी। मौसम विभाग के एक अधिकारी ने बताया कि मध्य प्रदेश में मॉनसून इस बार नौ दिन के विलंब से 24 जून को पहुंचा था। खासकर सूबे के पश्चिमी हिस्से में पिछले 10 दिनों से मॉनसून की गतिविधियां सुस्त पड़ी हैं।

बीच, खरमोर के संरक्षण का मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंच गया है। शीर्ष अदालत ने खरमोर (लेसर फ्लोरिकन) के साथ ही भारतीय उप महाद्वीप के एक अन्य पक्षी गोडावण (ग्रेट इंडियन बस्टर्ड) के वजूद पर संकट को लेकर कल, सोमवार को, ही गंभीर चिंता जताते हुए इन प्रजातियों के संरक्षण के मकसद से फौरन आपातकालीन प्रतिक्रिया योजना बनाने तथा लागू करने के लिए उच्चशक्ति प्राप्त समिति गठित की। जानकारों के मुताबिक खरमोर अपने वार्षिक हनीमून के तहत मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, राजस्थान और गुजरात में हर साल जुलाई-अगस्त में पहुंचते हैं और तीन-चार महीनों के लिए डेरा डालते हैं। प्रजनन के बाद ये मेहमान परिंदे अज्ञात ठिकानों की ओर रवाना हो जाते हैं। (भाषा)

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