लुधियाना जिले के धुरकोट गांव के रहने वाले और चंडीगढ़ यूनिवर्सिटी से इंजीनियरिंग करने वाले अमृत सिंह बुट्टर को 2020 में ऑस्ट्रेलिया का वीजा मिल गया था और उनकी पत्नी भी वहां पहले से ही थीं, लेकिन उन्होंने कुछ और ही करने का फैसला किया। वे अपने गांव लौट आए और डेयरी फार्मिंग में निवेश किया। छह साल बाद उन्होंने अपने उस फैसले को एक कामयाबी की कहानी में बदल दिया।

उन्होंने बुट्टर डेयरी फार्म और धुरकोट फीड इंडस्ट्री बनाई। इसमें भैंस पालन, ब्रीडिंग, पशु आहार बनाना, बकरी पालन, खेती और स्टार्ट-अप कंसल्टेंसी जैसे काम शामिल हैं।

लगभग 5 करोड़ रुपये के निवेश से बुट्टर अब 130 भैंसों के झुंड की देखभाल करते हैं, रोजाना लगभग 500 लीटर दूध का उत्पादन करते हैं, अपनी पशु आहार इकाई चलाते हैं, 25 एकड़ जमीन पर खेती करते हैं और हर महीने 6-7 लाख रुपये का मुनाफा कमाते हैं। बुट्टर की योजना अगले दशक में अपने काम को बढ़ाकर लगभग 1000 भैंसों तक ले जाने की है।

माता-पिता चाहते थे आईएएस अधिकारी बनें बुट्टर

बुट्टर ने याद करते हुए कहा, “मेरे माता-पिता चाहते थे कि मैं आईएएस अफसर बनूं, लेकिन मैंने अपना बिजनेस शुरू करने और डेयरी फार्मिंग में आने का फैसला किया। बहुत से लोगों को लगा कि मैं अपनी पढ़ाई बर्बाद कर रहा हूं क्योंकि मैं ऐसा काम कर रहा था जो एक अनपढ़ व्यक्ति भी कर सकता है।”

परिवार के कुछ सदस्यों ने उनसे महीनों तक बात करना बंद कर दिया था। रिश्तेदारों ने खुलेआम उनके फैसले पर सवाल उठाए। उन्होंने कहा, “मेरे पास एक विजन था, लेकिन मुझे पता था कि इसे हकीकत में बदलने में समय लगेगा। उस समय, कोई नहीं देख पा रहा था कि मैं क्या बनाने की कोशिश कर रहा हूं। आज, वही लोग मुझ पर गर्व करते हैं, सलाह लेते हैं और मेरे फैसले की तारीफ करते हैं।”

2021 में बुट्टर ने अपनी पत्नी रमनदीप कौर से पंजाब लौटने और बिजनेस को आगे बढ़ाने में उनका साथ देने के लिए कहा। रमनदीप ने तब तक ऑस्ट्रेलिया की एक यूनिवर्सिटी से एनवायरनमेंटल साइंस में मास्टर्स डिग्री पूरी कर ली थी। उन्होंने कहा, “हम अक्सर ‘ब्रेन ड्रेन’ और माइग्रेशन के बारे में बात करते हैं, लेकिन किसी न किसी को तो यहीं रुककर मौके बनाने होंगे। पैसा तो कहीं भी कमाया जा सकता है, लेकिन हमारी जमीन, हमारी संस्कृति और हमारे गांवों का ध्यान कौन रखेगा।”

अब, रमनदीप फार्म पर बकरी पालन यूनिट और ब्रीडिंग से जुड़े कामों को संभालती हैं। बुट्टर ने डेयरी फार्मिंग को एक गंभीर बिजनेस प्रोजेक्ट के तौर पर लिया। उन्होंने लगभग सात-आठ महीनों तक हरियाणा और दूसरे राज्यों का काफी दौरा किया और ब्रीडर्स, वेटेरिनेरियन और सफल डेयरी किसानों से मुलाकात की। उनका मकसद भैंस की सबसे अच्छी नस्लों की पहचान करना और डेयरी मैनेजमेंट के वैज्ञानिक तरीकों को समझना था। उन्होंने कहा, “मैं बिना सोचे-समझे डेयरी फार्मिंग में नहीं उतरना चाहता था। मैंने ब्रीडिंग और न्यूट्रिशन से लेकर बीमारी के मैनेजमेंट और दूध के इकोनॉमिक्स तक, हर चीज की स्टडी की।”

उन्होंने लुधियाना स्थित गुरु अंगद देव वेटरनरी एंड एनिमल साइंसेज यूनिवर्सिटी से डेयरी से जुड़ी औपचारिक ट्रेनिंग भी ली। 2020 में बुट्टर ने हरियाणा से 4.40 लाख रुपये में दो बेहतरीन मुर्रा नस्ल की भैंसें खरीदी थीं। अब उनके पास लगभग 130 भैंसों का झुंड है। अभी लगभग 80 भैंसें दूध दे रही हैं। वे कहते हैं, “बताइए, ऐसा कौन सा दूसरा बिजनेस है जो दिन में दो बार आपकी जेब में पैसे डालता है।”

यह फार्म रोजाना 500-600 लीटर दूध सप्लाई करता है। इसमें से 50 प्रतिशत दूध ‘वेरका’ को बेचा जाता है, जबकि बाकी दूध प्राइवेट ग्राहकों को अच्छे दाम पर बेचा जाता है। फार्म हर महीने लगभग 11 से 12 लाख रुपये का दूध बेचता है और इसमें मुनाफा लगभग 50 प्रतिशत होता है।

कंसल्टेंसी से एक लाख रुपये की होती है कमाई

बुट्टर का अनुमान है कि अकेले कंसल्टेंसी से ही उन्हें हर महीने लगभग 1 लाख रुपये की कमाई होती है। बुट्टर की सफलता ने पंजाब और विदेशों से भी नए बिजनेस शुरू करने के इच्छुक लोगों को आकर्षित किया है। अब वे डेयरी फार्मिंग में रुचि रखने वाले लोगों के लिए प्रोफेशनल कंसल्टेंसी सेशन चलाते हैं और हर सेशन के लिए 5000 रुपये फीस लेते हैं। इसकी इतनी ज्यादा मांग है कि अपॉइंटमेंट अक्सर दो से ढाई महीने पहले ही बुक हो जाते हैं।

इसके अलावा, बुट्टर ने 10 से 12 डेयरी फार्म शुरू करने में मदद की है, जिनमें से कई उन लोगों के हैं जो विदेश से लौटे थे। वे 1000 भैंसों का झुंड बनाने के अपने लंबे समय के लक्ष्य के तहत, अपने मौजूदा इंफ्रास्ट्रक्चर के अलावा दो एकड़ में फैला एक बड़ा पशु शेड भी बनवा रहे हैं। बुट्टर के पास अपनी लगभग 14 एकड़ जमीन है और वे लीज पर ली गई जमीन पर भी खेती करते हैं, जिससे उनकी कुल खेती की जमीन लगभग 25 एकड़ हो जाती है। उनकी ज्यादातर खेती की उपज का इस्तेमाल उनके डेयरी बिजनेस में ही होता है।

फार्म में मक्का, धान और गेहूं उगाया जाता है, जबकि मक्के का इस्तेमाल बड़े पैमाने पर साइलेज और पशु आहार बनाने में किया जाता है। उन्होंने कहा, “हम खेती और डेयरी को अलग-अलग नहीं देखते। खेती से डेयरी को मदद मिलती है। अगर हम पूरी तरह से कमर्शियल चारे पर निर्भर रहें, तो हमारी लागत बहुत बढ़ जाएगी। खुद चारा बनाने से हमें क्वालिटी पर बेहतर कंट्रोल मिलता है और मुनाफा भी ज्यादा होता है।” उन्होंने आगे बताया, “चारा बनाने वाली यूनिट मक्का, गेहूं, जौ, सरसों की खली और दूसरी चीजों का इस्तेमाल करके बछड़ों, बढ़ते जानवरों और बड़ी भैंसों के लिए खास चारा तैयार करती है।”

चारा बनाने वाली यूनिट से चारे की न्यूट्रिशन वैल्यू एक जैसी बनी रहती है। भैंस पालन के साथ-साथ, यह परिवार लगभग 30 बीटल बकरियां भी पालता है। रमनदीप बकरी पालन यूनिट की ब्रीडिंग और मैनेजमेंट का काम देखते हैं, जिसे धीरे-धीरे बढ़ाया जा रहा है। वह ब्रुसेलोसिस से जुड़ी समस्याओं का ध्यान रखते हैं और नए जानवर खरीदते समय क्वारंटीन के तरीकों को अपनाते हैं। जानवरों के डॉक्टर की देखरेख, वैज्ञानिक इलाज और सख्त मैनेजमेंट नियमों के जरिए, फार्म ने बीमारियों को फैलने से सफलतापूर्वक रोका है।

इस काम से 10 लोगों को मिला रोजगार

इस काम से अभी लगभग 10 लोगों को रोजगार मिला हुआ है, जिनमें तीन महिलाएं भी शामिल हैं। वे कहते हैं, “डेयरी फार्मिंग का मतलब अब सिर्फ दूध उत्पादन नहीं रह गया है। इसमें जेनेटिक्स, न्यूट्रिशन, चारा बनाना, टेक्नोलॉजी, बीमारी-मुक्त दूध हासिल करना और वैल्यू एडिशन जैसी चीजें शामिल हैं। अगर इसे प्रोफेशनल तरीके से किया जाए, तो यह बहुत मुनाफे वाला बिजनेस बन सकता है। मेरी इंजीनियरिंग की डिग्री और यूपीएससी की तैयारी ने मुझे एक सफल बिजनेस शुरू करने में बहुत मदद की है।”

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