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राहत बनी आफत

कोरोना महामारी की भयावता के बीच दवाओं की कालाबाजारी रोकने के लिए जारी हुए नए आदेश से मरीज और तीमारदारों को राहत नहीं बल्कि आफत हो रही है।

Author नई दिल्‍ली | Updated: May 3, 2021 3:30 AM

कोरोना महामारी की भयावता के बीच दवाओं की कालाबाजारी रोकने के लिए जारी हुए नए आदेश से मरीज और तीमारदारों को राहत नहीं बल्कि आफत हो रही है। पहले निजी अस्पताल मरीजों के तीमारदारों को रेमडेसिविर या टोसिलिजुमाब इंजेक्शन आदि को बाहर से खरीदकर लाने के लिए कहते थे।

तीमारदार किसी तरह धक्के खाकर, ज्यादा कीमत देकर इन्हें डॉक्टरों को देते थे ताकि मरीज की जान बच जाए। लेकिन कालाबाजारी की शिकायत के बाद सरकार ने इन दवाओं को पूरी तरह से सरकारी नियंत्रण के दायरे में ला दिया है। यानी आपूर्ति सीधे निजी और सरकारी अस्पतालों के जरिए होगी। लेकिन मांग के अनुरूप उपलब्धता न होने से न तो तीमारदारों को दवा बाहर मिल रही है और न डॉक्टर ही कहीं से इंतजाम कर पा रहे हैं। डॉक्टर दवा लिखने से भी बच रहे हैं। नतीजा मरीजों को समस्या हो रही है।

दुबके नेताजी

चुनाव पूर्व हर परिस्थितियों में जनता का साथ देने का वादा करने वाले नेता, कार्यकर्ता और पार्टियों के पदाधिकारी इस आपदा के वक्त नजर नहीं आ रहे हैं। अपने-अपने इलाकों के लोगों के हर सुख-दुख का हिस्सा बनने का ढोंग करने वाले नेता अब काफी कम नजर आ रहे हैं। बेदिल को पता चला कि जब से कोरोना आया है दिल्ली में लोग किसी न किसी परेशानी से जूझते हुए अपने नेताओं और कार्यकर्ताओं से मदद मांग रहे हैं लेकिन संक्रमण के डर से सब दुबके हुए हैं। दूूसरी ओर सोशल मीडिया पर नेताजी सामाजिक दूरी का असल में पालन करते हुए सक्रिय दिखते हैं। हां, अगर चुनावी मौसम होता तो जरूर बंगाल की तरह परवाह न करते हुए सारे नेता बिना मास्क के जनता के बीच होते। खैर, जनता का क्या! वह तो फिर भूल जाएगी और नेता लोग इस बार भी माफी मांग लेंगे।

कुछ तो है!

कमियां छिपाने के लिए दिल्ली नगर निगम के पास आंकड़ों की बाजीगरी का अच्छा अनुभव है। वहां के महाराथी कहीं न कहीं इसका उपयोग कर ही लेते हैं। इस बार कोरोना काल में जब पूरी दिल्ली में हाहाकार मचा हुआ है लोगों की जान जा रही है तो भी यह आंकड़ों की बाजीगरी दिख रही है। जहां पूर्वी दिल्ली के श्मशान घाट पर जलाए जाने वाले शवो के आंकड़े प्रति दिन आ रहे हैं वहीं दक्षिणी दिल्ली और उत्तरी दिल्ली एक दिन बाद अपने आंकड़े दिखा रहे हैं।

वह भी तब जब पूरे-पूरे दिन श्मशान घाट पर शवों को जलाने के लिए लंबा इंतजार करना पड़ रहा है। लोग शवों को लाइन में लगाकर इंतजार कर रहे हैं। राजनीतिक पार्टियों के बीच आंकड़ों को लेकर बहस चल रही है। बेदिल ने कहीं सुना, अब जब शवों की गिनती में निगमों को एक दिन का समय लग रहा है तो बाकी की तो बात ही छोड़िए।

हड़बड़ी में गड़बड़ी

दिल्ली में सरकारी तंत्र हड़बड़ी में गड़बड़ी कर रहे हैं। लोग भी सोच में हैं कि यह गड़बड़ी जानबूझकर है या जल्दबाजी में। दरअसल, हुआ यूं कि दिल्ली सरकार की ओर से रोजाना कोरोना मरीजों के आंकड़ों को देर रात तक जारी किया जा रहा है। अब ऐसे में तो कभी-कभी रात दस बजे तक रिपोर्ट को इंतजार करना पड़ रहा है। और जब रिपोर्ट आ रही है तो उसमें भी तमाम गलतियां होती हैं। एक बार तो सरकार को ही अगल दिन रिपोर्ट जारी करने सफाई देनी पड़ी।

नाम की ‘जय’

दिल्ली भाजपा के नेताओं को अपने राष्टÑीय अध्यक्ष का पूरा नाम लेने में जरा परेशानी हो रही है। राष्ट्रीय अध्यक्ष का नाम जेपी नड्डा है लेकिन जल्दबाजी में ‘जगत’ की ‘जय’ छपा है। दरअसल, यह कारनामा 20 अप्रैल को हुआ। जब पार्टी ने हर बूथ को कोरोना मुक्त बनाने का अभियान शुरू किया। इस अभियान के लिए जारी किए गए प्रेस वक्तव्य में दिल्ली भाजपा के नेताओं ने पार्टी अध्यक्ष का नाम ही जय प्रकाश नड्डा कर दिया। सभी नेताओं की जांच के बाद इसे मीडिया में जारी भी कर दिया। हालांकि गलती बाद में पता चली कि पार्टी के राष्टÑीय अध्यक्ष का नाम जगत प्रकाश नड्डा है।

ट्वीट से सांस

आॅक्सीजन की समस्या से जूझ रही दिल्ली में इन दिनों चर्चा में ट्विटर भी है। मरीजों को सलाह देने वालों की नजर में तो ट्विटर बीते दिनों मानो आॅक्सीजन का पर्यायवाची बनता दिखा! अस्पतालों की गेट पर मरीजों को तड़पता देख आॅटो वाले-रिक्शावाले तक लाचार परिजनों को ट्वीट करने की सलाह देते नजर आ रहे हैं। हालांकि सलाह देने वालों में ज्यादातर लोगों को यह नहीं पता कि ट्विटर किस तरह काम करता है। लेकिन उन्होंने आॅक्सीजन पाने में सफल लोगों के मुंह से सुन रखा है।

आगे बताते नहीं थकते। वे रोते बिलखते परिजनों से कहते है- ट्विटर से आॅक्सीजन मिल जाती है, वहीं जाओ। इन दिनों हर असहाय आदमी को ये लोग ट्विटर से आॅक्सीजन पा लेने का सुझाव देते सुने जा सकते हैं। शायद उनके नजर में यह ट्विटर संदेश पहुंचाने का मंच न होकर आॅक्सीजन मुहैया कराने वाली दुकान है। यह बात दिगर है कि सोशल मीडिया के जानकार सोशल प्लेटफार्म ट्विटर का उपयोग कर अपनी बात सरकार तक पहुंचाकर सफलता पा भी लेते हैं लेकिन वे तो मुट्ठी भर ही हैं। हाशिए पर रह रहे लोगों को क्या पता कि वे इस मंच से कैसे आॅक्सीजन तक पहुंचे!
-बेदिल

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