ताज़ा खबर
 

खत्म नहीं हुआ है ‘विश्वास’ का विवाद!

आम आदमी पार्टी (आप) में युद्ध विराम तूफान आने से पहले सन्नाटा जैसा दिखने लगा है।

Author नई दिल्ली | May 6, 2017 01:04 am
आम आदमी पार्टी (आप) में युद्ध विराम तूफान आने से पहले सन्नाटा जैसा दिखने लगा है। पा

आम आदमी पार्टी (आप) में युद्ध विराम तूफान आने से पहले सन्नाटा जैसा दिखने लगा है। पार्टी के वरिष्ठ नेता कुमार विश्वास को मनाने के लिए पार्टी नेतृत्व ने ओखला के विधायक अमानतुल्ला खान को निलंबित तो कर दिया लेकिन उनके समर्थकों का गुरुवार को मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल के घर पर प्रदर्शन करना, इस बात की पुष्टि कर रहा है कि विवाद खत्म नहीं हुआ है। प्रदर्शनकारी अमानतुल्ला के निलंबन को वापस लेने की मांग कर रहे थे। विश्वास ने ऐसे ही आरोप नहीं लगाया था कि अमानतुल्ला खुद नहीं बोल रहे हैं बल्कि उनसे बुलवाया जा रहा है। भले ही पार्टी के नंबर दो माने जाने वाले नेता, उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया अमानतुल्ला के घर पीएसी (राजनीतिक मामलों की समिति) का फैसला बताने गए। लेकिन इसका संदेश तो विश्वास के आरोपों को पुख्ता कर रहा है। पार्टी के सर्वशक्तिमान नेता अरविंद केजरीवाल इस पूरे विवाद में यह संदेश देने में नाकाम रहे कि पार्टी पर पहले की तरह उनका दबदबा बरकरार है।

महज पांच साल के राजनीतिक जीवन में केजरीवाल दूसरी बार बड़े पैमाने पर बगावत झेल रहे हैं और इस बार कई चुनाव हारने के बाद उनका आत्मविश्वास डगमगा सा गया है। पार्टी को बचाने के लिए फौरी तौर पर उन्होंने अमानतुल्ला को निलंबित करके कुमार विश्वास को राजस्थान का प्रभारी बना दिया है। अमानतुल्ला ने कुमार विश्वास पर भाजपा से मिलकर पार्टी तोड़ने का आरोप लगाया था। भाजपा से विश्वास की नजदीकियां जगजाहिर हैं, उनके जन्मदिन से लेकर अनेक मौके पर भाजपा के नेता पास आते जाते रहे हैं। यह भी सत्य है कि आप का गठन किसी विचारधारा से जुड़ने के बजाए भ्रष्टाचार के खिलाफ जनआंदोलनों के लिए किया गया था। आप के शुरुआती दिनों में तो जो नेता शामिल हुए उनमें ज्यादातर तो भाजपा और कांग्रेस के उपेक्षित नेता थे। खुद केजरीवाल बार-बार कह चुके हैं कि उनकी कोई विचारधारा नहीं है। जहां से लोगों को लाभ मिले, वहां वे जाने को तैयार हैं। कुमार विश्वास जैसे गिनती के नेता आप में हैं जो पार्टी बनने से पहले केजरीवाल से जुड़े थे।

पार्टी की शुरुआत में सबको बराबरी का दर्जा देने की बात कह कर अनेक नेताओं की महत्वकांक्षा जगाई गई थी। वास्तव में ऐसा न होने से ही असंतोष बढ़ा है। पार्टी को वैचारिक रूप से मजबूत बनाने और अखिल भारतीय स्वरूप देने के प्रयास में लगे नेताओं योगेंद्र यादव, प्रशांत भूषण, प्रो. आनंद कुमार आदि को केजरीवाल ने एक ही झटके में पार्टी से बाहर कर दिया। वह इस पार्टी के लिए एक बड़ा झटका था। उसके बाद तो जिसने भी केजरीवाल की हां में हां नहीं मिलाई वह बाहर होता चला गया। राजनीति में नए प्रयोग को भारी समर्थन मिलने से केजरीवाल को लगा कि वह जो कर रहे हैं, वही सही है। एक के बाद एक करके दिल्ली, पंजाब और देश के दूसरे हिस्से के नेता आप से अलग होते गए। केजरीवाल और मनीष सिसोदिया के पुराने साथी कुमार विश्वास पिछले काफी दिनों से पार्टी में अलग-थलग हो गए थे। पंजाब क्या उन्हें तो दिल्ली निगम चुनाव में भी कहीं नहीं बुलाया गया। पंजाब चुनाव के बाद वह इशारों में बोले लेकिन निगम चुनाव के बाद तो वह खुलकर बोलने लगे हैं। वह सारी बातें उसी तरह से कहने लगे हैं जिस तरह से प्रशांत भूषण, योगेंद्र यादव, प्रो. आनंद कुमार और प्रो. अजीत झा दो साल पहले बोले। उन्हें केजरीवाल ने बाहर का रास्ता दिखा दिया। फिर भी कई नेता उसी राह पर चलते दिखे, भले ही उन्हें पार्टी से बाहर होना पड़ा। आप के लिए दिल्ली सरकार जाने का खतरा तो है ही संसद में आप के वजूद पर भी सवाल है। अगर भगवंत मान, डॉ. धर्मवीर गांधी और हरविंदर सिंह खालसा के साथ मिल गए तो संसद में वैधानिक आप वे ही बन जाएंगे।

यह सत्य है कि पार्टी केजरीवाल की है और किसी की वह हैसियत नहीं है जो केजरीवाल की है। केजरीवाल यह तय नहीं कर पा रहे हैं कि एक के बाद एक हार के बाद वह पार्टी को कैसे बचाएं। कुमार विश्वास ने वह सारी बातें कह दीं जो आम जन के चर्चा में थीं। दिल्ली के उपराज्यपाल और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ दिन भर आरोप लगाने के बाद चुनाव आयोग जैसी संवैधानिक संस्था पर मर्यादाहीन आरोप लगाने से लेकर देश विरोधी कार्यों की केजरीवाल की सराहना से वह आहत थे। वह अपने को केजरीवाल और सिसोदिया से किसी भी तरह से कम मानने को तैयार नहीं हैं। उनकी लाइन पार्टी से एकदम अलग हो गई है इसलिए पार्टी के विधायकों में काफी हलचल है। निगम चुनाव के बाद केजरीवाल हालात को भांप कर एक बार फिर दिल्ली के लोगों से माफी मांग कर नए सिरे से लोगों से जुड़ने की बात कही है। वैसे अभी भी उसके नेता लोगों से सीधा संवाद करने के बजाए ट्विटर पर ही संवाद कर रहे हैं। आने वाले दिनों में नियमों के बिना संसदीय सचिव बनाए गए 21 विधायकों की सदस्यता पर फैसला आने वाला है। कई विधायक पहले ही बागी बने हुए हैं। अगले साल इन विधायकों के बूते तीन राज्यसभा के सदस्यों का चुनाव होने वाले हैं।

जिस तरह से हलचल चल रही है, उससे लगता नहीं कि केजरीवाल सरकार अपना कार्यकाल पूरा कर लेगी। यह भी कहा जा रहा है कि 21 विधायकों का फैसला आते ही पार्टी बिखर जाएगी। प्रदेश भाजपा अध्यक्ष मनोज तिवारी का भी मानना है कि दिल्ली में विधान सभा के मध्यावधि चुनाव हो सकते हैं। यह बात हवा में नहीं है कि आप के अनेक विधायक नए ठौर की तलाश में हैं, कई विधायकों के भाजपा नेताओं से ही नहीं कांग्रेस के भी कुछ नेताओं से मिलने की जानकारी सार्वजनिक हो चुकी है। भाजपा में तो एक विधायक चला ही गया और कई जाने के लिए मौके की तलाश में हैं। इसके माध्यम कुमार विश्वास हैं यह कहने का साहस किसी आप विधायक में हो सकता है, यह चौंकाने वाला है। विश्वास के मुद्दा बनाने पर भी उसे पार्टी से निकालने के बजाए विधायक को पार्टी से निलंबित करने से लोगों के मन में शंका पैदा हो रही है। इतना ही नहीं निलंबन पर भी अमानतुल्ला का रुख न बदलने, उनके घर सिसोदिया के जाने और गुरुवार को मुख्यमंत्री के घर अमानतुल्ला के समर्थकों का निलंबन वापस लेने के लिए प्रदर्शन करके आत्मदाह की चेतावनी देना भी यह संकेत दे रहा है कि यह विवाद अभी थमा नहीं है और न ही अमानतुल्ला अकेले हैं, उनके साथ पार्टी का एक तबका जुड़ा लगता है।

Hindi News से जुड़े अपडेट और व्‍यूज लगातार हासिल करने के लिए हमारे साथ फेसबुक पेज और ट्विटर हैंडल के साथ गूगल प्लस पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News App