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पांचवीं से आगे नहीं पढ़ पातीं बेटियां

बेटियों यानी लड़कियों को पढ़ाने के लिए केंद्र और राज्य सरकार की ओर से कई तरह की सुविधा और सहूलियत मुहैया कराई जा रही है, बावजूद आप लोग लड़कियों को चौथी कक्षा से आगे क्यों नहीं पढ़ाते? इसके जवाब में इस बस्ती की सबसे बुजुर्ग 55 वर्ष की विद्या गुजराती ने बताया कि दिन-रात मेहनत करके किसी तरह घर-परिवार का गुजारा होता है। औसतन छह से आठ हजार रुपए की महीने की कमाई में उनके लिए लड़कियों का अधिक पढ़ाना संभव नहीं है।

Author December 5, 2018 6:27 AM
तस्वीर का इस्तेमाल केवल प्रतीकात्मक तौर पर किया गया है। (फोटो सोर्स- pixabay)

शंकर जालान

कोलकाता में ‘गुजराती’ शब्द का तात्पर्य न तो समग्र गुजरात से है और ना ही संपूर्ण गुजरातियों से, बल्कि इसका संबंध उस ‘गुजराती’ समुदाय से है जो महानगर के विभिन्न इलाकों में रहता हैं और बेटी बचाओ पर तो पूरा ध्यान देता है, लेकिन बेटी पढ़ाओ से बिल्कुल इत्तिफाक नहीं रखता। मूल रूप से गुजरात के अहमदाबाद व राजकोट के बीच जोटिया गांव के निवासी इस ‘गुजराती’ समुदाय के करीबन 80 हजार लोग बीते कई दशकों से महानगर कोलकाता के विभिन्न इलाकों में रहते आ रहे हैं। इसे अचरज कहें या अफसोस की इस ‘गुजराती’ समुदाय की किसी भी लड़की ने पांचवीं कक्षा में कदम नहीं रखा। इस समुदाय का मानना है कि लड़की को चौथी तक पढ़ा लिया, उसे जोड़-घटाव व गुणा-भाग आ गया, बस उसकी पढ़ाई पूरी हो गई।

शहर के टालीगंज, कालीघाट, भवानीपुर, शिमला माठ, सिंघी बागान, रामबागान, बेलगछिया, बारासात समेत अन्य इलाकों में रहने वाले इस ‘गुजराती’ समुदाय की आर्थिक, सामाजिक, शैक्षणिक स्थिति काफी पिछड़ी हुई है। मूल रूप से पुराने कपड़ों के बदले स्टील, एल्यूमुनियन व प्लास्टिक के बर्तन व अन्य सामान देकर उससे होने वाली मालूमी आय पर ये लोग किसी तरह से सिर्फ दो वक्त की रोटी का जुगाड़ ही कर पाते हैं, ऐसे में इन्हें लगता है कि लड़कियों को उच्च शिक्षित करना बेहद परेशानी भरा काम है। सिंघी बागान बस्ती में रहने वाली 25 वर्षीय बंदनी गुजराती ने ‘जनसत्ता’ को बताया कि इस बस्ती में ‘गुजराती’ समुदाय के करीब 30 परिवार रहते हैं, लेकिन किसी घर की लड़की ने पांचवीं कक्षा की दहलीज पर पांव नहीं रखा।

बेटियों यानी लड़कियों को पढ़ाने के लिए केंद्र और राज्य सरकार की ओर से कई तरह की सुविधा और सहूलियत मुहैया कराई जा रही है, बावजूद आप लोग लड़कियों को चौथी कक्षा से आगे क्यों नहीं पढ़ाते? इसके जवाब में इस बस्ती की सबसे बुजुर्ग 55 वर्ष की विद्या गुजराती ने बताया कि दिन-रात मेहनत करके किसी तरह घर-परिवार का गुजारा होता है। औसतन छह से आठ हजार रुपए की महीने की कमाई में उनके लिए लड़कियों का अधिक पढ़ाना संभव नहीं है। चुन्नी गुजराती (23) ने बताया कि उनके समुदाय की लड़कियों को पांचवीं उत्तीर्ण होने के लाले पड़ गए हैं। ‘गुजराती’ समुदाय की लड़कियों को चौथी के बाद ही मां के साथ रोजगार में निकलना पड़ता है। चुन्नी ने बताया कि उनके समुदाय में लड़कों का काम घर पर रहना और घर की देखरेख करना है, जबकि लड़कियों का काम गली-गली, द्वार-द्वार जाकर पुराने कपड़ों की एवज में ग्राहकों को उनकी जरूरत के मुताबिक स्टील, एल्यूमुनियन व प्लास्टिक के बर्तन व अन्य सामान देना है।

पुराने कपड़ों का क्या करते हैं? इसके जवाब मै जैली गुजराती (26) व राजा गुजराती (20) ने बताया कि पुराने कपड़ों को बेचते हैं। पुराने कपड़ों का यह बाजार चित्तरंजन एवेन्यू में गिरीश पार्क से लेकर बिडन स्ट्रीट तक रोजाना देर रात लगता है। शिमला माठ के पंकज गुजराती (30) की बात मानें तो इनदिनों ‘गुजराती’ समुदाय की कुछ लड़कियां पढ़ना चाहती हैं, लेकिन कोई सही परामर्श या सलाह देने वाली नहीं है। उन्होंने नेताओं पर गुस्सा निकालते हुए कहा कि चुनाव के समय हर पार्टी के नेता आकर उनके विकास और उत्थान बाबत भारी-भरकम भरोसा दे जाते हैं, लेकिन चुनाव पश्चात उनकी सुध लेने वाला कोई नहीं है।

राम बागान निवासी 15 साल की जावित्री गुजराती का कहना है कि उसने पास के सरकारी स्कूल में कक्षा चार तक की पढ़ाई कर ली है। वह आगे पढ़ना चाहती है, लेकिन घरवालों तैयार नहीं। हालांकि उसका भाई अभी भी स्कूल जाता है। इसे बाबत शिक्षा जगत से जुड़े विशेषज्ञों का कहना है कि ऐसे बच्चों के माता-पिता की काउंसिलिंग जरूरी है। साथ ही स्थानीय नेताओं को भी ऐसा कुछ करना चाहिए जिससे इन्हें शिक्षा का महत्त्व पता चले। वहीं, स्थानीय पार्षद व विधायक स्मिता बक्सी का कहना है कि वे अपने स्तर पर पूरी कोशिश करती हैं कि हर बच्चा चाहे वह लड़की हो या लड़का स्कूल जाए और उच्च शिक्षा ग्रहण करें, लेकिन अगर किसी के अभिभावक ऐसा नहीं चाहते तो इसमें उनके पास करने को कुछ नहीं हैं।

दूसरी ओर, कोलकाता नगर निगम के शिक्षा विभाग के मेयर परिषद के सदस्य अभिजीत मुखर्जी का कहना है कि विभाग के सारे प्रयासों के बावजूद कुछ अभिभावक अपने बच्चों को स्कूल नहीं भेजते। सर्व शिक्षा अभियान के तहत नगर निगम द्वारा संचालित स्कूलों को अपग्रेड कर आठवीं तक किया गया है। कामकाजी महिलाएं बेटियों को अकेले छोड़ने से डरती हैं। इसलिए वे उन्हें अपने साथ लेकर काम पर निकलती हैं। ऐसी ही गरीब कामकाजी महिलाओं को ध्यान में रखकर डे बोर्डिंग स्कूल तैयार किया जा रहा है, जहां पर लड़कियां सुरक्षित भी रह सकें और पढ़ भी सकें।

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