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किन्नौर में खुंब ‘संभव’ होने से जीविका सरल हुई बर्फीले पहाड़ के वासियों की

किन्नौर में छह महीने बर्फ रहती है। अमूमन नवंबर से अप्रैल तक यह क्षेत्र ठंडा रहता है और हवा में नमी कम रहती है। लेकिन डाक्टर यशवंत सिंह परमार वानिकी व बागवानी विश्वविद्यालय नौणी के शिक्षा प्रसार निदेशालय के तहत राष्ट्रीय जलवायु अनुरूप खेती नवाचार परियोजना के तहत यहां खुंब उगाना संभव हो पाया है।

Author February 14, 2018 6:18 AM
कंकरीट के मकानों में जिस कमरे में मशरूम के थैले रखे गए उस कमरे की भीतर से दीवारों पर टाट की परतें चढ़ा दी गर्इं।

ओमप्रकाश ठाकुर

जलवायु बदलाव की आहट के बीच तापमान और नमी को बांधने का हुनर सीखकर हिमाचल के कबाइली जिले किन्नौर जैसे ठंडे क्षेत्र के किसान खुंब या मशरूम की खेती को आय का एक और जरिया बनाने में कामयाब हो गए हैं। यहां तापमान ही नहीं नमी को बांधना भी बेहद मुश्किल था। इस ठंडे इलाके में इन दिनों हवा में नमी का फ ीसद 10 से 12 है, जबकि अप्रैल से जून तक यह फीसद 40 से 45 हो जाता है और जब पूरे देश में बरसात हो रही होती हैं तो यहां पर हवा में 55 से 60 फीसद नमी रहती है। खुंब की खेती के लिए हवा में 70 फीसद से ज्यादा नमी की जरूरत होती हैं। इसके लिए 17 से 18 डिग्री के स्थायी तापमान की जरूरत होती है जबकि इन दिनों किन्नौर के इन इलाकों में तापमान 12 डिग्री से भी कम है।

किन्नौर में छह महीने बर्फ रहती है। अमूमन नवंबर से अप्रैल तक यह क्षेत्र ठंडा रहता है और हवा में नमी कम रहती है। लेकिन डाक्टर यशवंत सिंह परमार वानिकी व बागवानी विश्वविद्यालय नौणी के शिक्षा प्रसार निदेशालय के तहत राष्ट्रीय जलवायु अनुरूप खेती नवाचार परियोजना के तहत यहां खुंब उगाना संभव हो पाया है। जिले के कृषि विज्ञान केंद्र के प्रभारी और क्षेत्रीय बागवानी अनुसंधान और प्रशिक्षण केंद्र शारबो के सहायक निदेशक डॉक्टर शशि शर्मा ने 2200 मीटर की ऊंचाई में बसे तिलंगी नामक गांव को निकरा परियोजना के तहत गोद लिया और पिछले साल अप्रैल के बाद किसानों को खुंब की खेती का प्रशिक्षण शुरू किया। शशि शर्मा खुद फल विज्ञानी हैं। वे कहते हैं कि पहाड़ों में जलवायु में बदलाव देख कर इस गांव को गोद लिया गया। पहले के मुकाबले यहां की जलवायु थोड़ी गर्म हुई तो यहां ऐसा प्रयोग करने का फैसला किया गया।

तिलंगी के अलावा खवांगी, सुधारंग, शारबो और कोठी जैसे गांव भी इस परियोजना से जोड़े जा रहे हैं। साथ ही किसान अब खुद गर्मी और नमी को बांधने का हुनर सीखने लगे हैं। फिलहाल शुरू में कृषि विज्ञान केंद्र के विज्ञानियों ने नमी और तापमान को बांधने का हुनर सिखाया, वह भी टाट व पॉली शीट का सहारा लेकर। विपरीत जलवायु में मशरूम उगाने के इस मिशन में दो सबसे बड़ी चुनौतियां थीं। किन्नौर के इन गांवों में कंकरीट के घर हैं या पारंपरिक शैली से बने पुराने मकान। विज्ञानियों का मानें तो इन गांवों में इन दोनों ही तरह के मकानों में तापमान और नमी को बांधना मुश्किल था। कंकरीट के मकानों में जिस कमरे में मशरूम के थैले रखे गए उस कमरे की भीतर से दीवारों पर टाट की परतें चढ़ा दी गर्इं। इससे ठंड थम गई। नमी के लिए पानी का छिड़काव तो किया ही जाता है। पारंपरिक तरह के पहाड़ी शैली के मकानों की दीवारें मिट्टी की है जबकि छतें लकड़ी की। मिट्टी और लकड़ी नमी को सोख लेती हैं। ऐसे में नमी को बांधना बेहद मुश्किल काम था। डॉ शशि शर्मा कहते हैं कि इसके लिए भी अंदर से दाीवारों पर पॉली शीट की लाइनिंग की गई। यह प्रयोग सफल रहा और लोग यहां पर मशरूम उगाने लग गए हैं। इसी गांव में छेरिंग लामो ने पॉलीहाउस में मशरूम की खेती शुरू की। पॉली हाउस के भीतर उन्होंने प्लास्टिक का मोटा तिरपाल लगाया और उस के अंदर मशरूम की खेती शुरू की है। अप्रैल के बाद वह इस खेती को और ज्यादा करेंगे। छेरिंग लामो ने कहा कि उनके अलावा उनके पति और बेटे ने भी मशरूम की खेती का प्रशिक्षण ले रखा है। फल विज्ञानी शशि शर्मा कहते हैं कि मार्च से अक्तूबर के बीच यहां मशरूम की खेती सहजता से की जा सकती है। पहाड़ कुछ गर्म हो रहे हैं। हम इसी का फायदा उठाने की कोशिश कर रहे हैं।

इंजीनियरिंग से बागवानी तक
गांव सुधारंग के गजेंद्र सिंह ऑटोमोबाइल में इंजीनियर हैं लेकिन 18 सालों से वह खेती और बागवानी की ओर मुड़ गए। पिछले साल से उन्होंने भी मशरूम की खेती शुरू की हैं। वह कहते हैं कि मार्च के बाद वह बड़े पैमाने पर यह खेती शुरू करेंगे। वह भी दो सौ ग्राम की मशरूम की पैकिंग को 30 से लेकर 50 रुपए में बेच आते हैं।

मीट का विकल्प
कबाइली जिला किन्नौर देवी-देवताओं का क्षेत्र हैं। अपर किन्नौर में बौद्व धर्म के मानने वाले ज्यादा हैं। छत्र सिंह कहते है कि देवी देवताओं को पशुओं की बलि पर रोक है। इसके अलावा राधास्वामी जैसे धार्मिक संस्थाओं ने भी अपनी पहुंच यहां तक बनाई हैं। ऐसे में अब मांस का प्रचलन धीरे-धीरे कम हो रहा हैं। वे कहते भी हैं मांस के विकल्प के तौर पर मशरूम उभर कर सामने आ रहा है।

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