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खजुराहो लोकसभा क्षेत्र: राजघराने और बाहरी उम्मीदवार के बीच जंग, अपनों से जूझ रहे सांसद

कांग्रेस ने राजघराने से ताल्लुकात रखने वाले विधायक नातीराजा की पत्नी कविता सिंह पर ऐतबार जताया है। वहीं भाजपा ने युवा चेहरे बीडी शर्मा को मैदान में उतार है।

कविता सिंह और बीडी शर्मा

धीरज चतुर्वेदी

खामोशी और सन्नाटे ने खजुराहो लोकसभा चुनाव को किसी फिल्म के अंत की तरह रोचक बना दिया है। कांग्रेस ने राजघराने से ताल्लुकात रखने वाले विधायक नातीराजा की पत्नी कविता सिंह पर ऐतबार जताया है। वहीं भाजपा ने युवा चेहरे बीडी शर्मा को मैदान में उतार है। हालांकि शर्मा की उम्मीदवारी घोषित होने के साथ ही विरोध सड़कों पर दिखाई देने लगा था। खजुराहो लोकसभा क्षेत्र भाजपा का गढ़ ही रहा है। परिसीमन के बाद से लगातार दो चुनावों में यहां भाजपा का कब्जा रहा है। 2009 में भाजपा के जीतेन्द्रसिंह बुंदेला ने कांग्रेस के राजा पटैरिया को मात्र 28332 मतों से पराजित किया था। वर्ष 2014 का चुनाव पूरी तरह मोदी लहर से प्रभावित रहा। भाजपा के बाहरी प्रत्याशी नागेन्द्रसिंह ने कांग्रेस के राजा पटैरिया को 247490 मतों के भारी अंतर से हराया था। वर्तमान चुनाव में यूं तो मतदाता खामोश हैं लेकिन भाजपा जहां जातिवाद, राष्ट्रवाद और हिन्दुत्व के दम पर चुनाव वैतरणी पार करने की चाह रख रही है, वहीं कांग्रेस के पास वे मसले हैं जो मतदाताओं को प्रभावित करते हैं।

पुराने सांसद का लापता होना, लोकसभा में एक भी प्रश्न नहीं पूछना और सबसे महत्त्वपूर्ण कि भाजपा के बाहरी प्रत्याशी होने के वे स्थानीय मुद्दे हैं जो जनता को प्रभावित कर रहे हैं। खजुराहो लोकसभा के लिए 13 लाख 96 हजार 712 मतदाता किस्मत का फैसला करेगे। इनमें 728098 पुरुष और 668569 महिला मतदाता हैं। वर्ष 2011 की जनगणना अनुसार यहां करीब 25 लाख की आबादी है। इसमें 81.78 फीसद ग्रामीण आबादी है। अनुसूचित जाति के 18.57 और 15.13 अनुसूचित जनजाति के लोगो की आबादी है जो निर्णायक है। क्षेत्र में ब्राह्मणों के वर्चस्व के कारण भाजपा ने बीडी शर्मा पर दांव लगाया है। इस कारण चुनाव में बुंदेलखंड के ब्राह्मण और ठाकुर का मुद्दा प्रमुख हो चुका है। कहा जाता है कि बीडी शर्मा का सीधे भाजपा के राष्ट्रीय स्तर के नेताओं से संपर्क है, इसलिए उन्हें यहां से टिकट मिला है।

भाजपा राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह, पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह, उमा भारती की सभाओं से साफ है कि यह क्षेत्र राष्ट्रीय स्तर पर प्रतिष्ठा की सीट बनी हुई है। मुरैना के मूल निवासी बीडी शर्मा को बाहरी होने के कारण खूब मेहनत करनी पड़ी है। सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण है कि उत्तर प्रदेश के महागठबंधन के कारण यह क्षेत्र सपा के खाते में गया है। बसपा का प्रत्याशी नही है और सपा ने दस्यु ददुआ के पुत्र वीरसिंह पटेल को मैदान में उतारा है। पटेल मतदाता का हमेशा से भाजपा पर भरोसा रहा है। वीरसिंह अगर पटेल मतदाताओं में सेंधमारी कर देते हैं तो भाजपा के लिए दिक्कत होगी। सब कुछ राष्ट्रवाद, हिन्दुत्व, जातिगत भरोसा या स्थानीय मुद्दों के ईद गिर्द घूम रहा है।

विरोधी लहर नहीं, पर अपनों से जूझना पड़ रहा है सांसद को

दमोह बुंदेलखंड का एक ऐसा लोकसभा क्षेत्र है जहां वर्तमान भाजपा सांसद के खिलाफ कोई विरोधी लहर नहीं है लेकिन उन्हें भितरघात का खतरा बना हुआ है। विधानसभा चुनाव में भी भाजपा की अंदरूनी खींचतान के कारण शिवराज सरकार के वित्त मंत्री जंयत मलैया को हारना पड़ा था। अब वही खुन्नस लोकसभा चुनाव में भी देखने का मिल रही है। दमोह लोकसभा पर 1989 से भाजपा का कब्जा रहा है। पिछले लोकसभा चुनाव में भाजपा ने ताकतवर प्रहलाद पटेल को बाहरी होने के बावजूद मैदान में उतार दिया था।

जहां उन्होने कांग्रेस के महेंद्र सिंह को करीब 2 लाख 13 हजार मतों से हराया था। दमोह की 4, सागर की 3 और छतरपुर जिले की एक सीट को मिलाकर निर्मित दमोह लोकसभा क्षेत्र में भाजपा के ताकतवर नेताओ की फौज ही वर्चस्व की जंग का कारण बनती रही है। दमोह जिले से जंयत मलैया, रामकृष्ण कुसमरिया, छतरपुर जिले में उमा भारती का वर्चस्व, और सागर जिले में गोपाल भार्गव, भूपेंद्र सिंह के दबदबे के कारण कई बार भाजपा के अंदरूनी झगड़े सड़को पर दिखे। नतीजनत आठ विधानसभा क्षेत्रों में 4 पर कांग्रेस काबिज हो गई जबकि एक सीट पर बसपा ने कब्जा जमा लिया। इस क्षेत्र में 17 लाख 69 हजार मतदाता हैं जिनमें चार लाख युवा मतदाता हैं। सभी की निगाहें इसी नए मतदाता पर है।

प्रहलाद पटेल और प्रताप सिंह लोधी

जातिगत आधार पर इस बार कांग्रेस ने नया तानाबाना बुनते हुए प्रतापसिंह लोधी को उम्मीदवार बनाया है। जो भाजपा के प्रहलाद पटेल के लोधी समाज से ही आते हैं। विधानसभा चुनाव में इस समाज से तीन लोधी समाज के विधायक जीत कर आए हैं जो तीनों ही कांग्रेस से हैं। साथ ही स्वयं प्रतापसिंह लोधी दमोह जिले की जबेरा सीट से कांग्रेस प्रत्याशी थे जो मात्र तीन हजार मतों से हार गए थे। आंकड़े बताते हैं कि विधानसभा चुनाव में भले ही कांग्रेस ने बाजी मार ली हो लेकिन भाजपा का पलड़ा भारी रहा है। विधानसभा चुनाव में दमोह लोकसभा क्षेत्र के आठ विधानसभा क्षेत्रों में भाजपा को 5 लाख 11 हजार 951 मत मिले थे। जबकि कांग्रेस के चार विधायक जीतने के बाद भी उसे 4 लाख 95 हजार 94 मत ही प्राप्त हो सके थे। कांग्रेस के पक्ष में पथरिया पर बसपा की काबिज सीट का गणित जोड़ दिया जाए तो अवश्य वो भाजपा से आगे दिखती है।

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