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दिल्ली मेरी दिल्ली: अंदाज-ए-बयां

दिल्ली में सीलिंग रोकने के लिए सरकार कुछ सड़कों को मिश्रित उपयोग वाला घोषित करने की अधिसूचना जारी करके उन इलाकों में सीलिंग टलवा सकती थी, लेकिन वह इसमें देरी करती रही।

दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल (फोटो सोर्स : Indian Express)

बेदिल

दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल को भले ही दूसरे राज्यों के लोगों ने अभी तक न स्वीकारा हो, लेकिन संवाद अदायगी में वे अव्वल माने जाते हैं। 2015 के विधानसभा चुनाव में जिन वादों के सहारे उनकी पार्टी ने भारी बहुमत से जीत हासिल की, उनमें से ज्यादातर वादों को उन्होंने भुला दिया और कुछ को पूरा न करने का ठीकरा केंद्र के लिर पर फोड़ दिया। हालांकि बिजली, पानी, शिक्षा और स्वास्थ्य के क्षेत्र में केजरीवाल की सरकार ने अच्छा काम किया, लेकिन जितना काम नहीं किया उससे ज्यादा उसका गुणगान किया। इतना ही नहीं, जो काम यह सरकार नहीं कर पाई है, उन्हें उसने अगले चुनाव का मुद्दा बना लिया है। दिल्ली में सीलिंग रोकने के लिए सरकार कुछ सड़कों को मिश्रित उपयोग वाला घोषित करने की अधिसूचना जारी करके उन इलाकों में सीलिंग टलवा सकती थी, लेकिन वह इसमें देरी करती रही। वहीं अब सरकार ने पूरी तरह सीलिंग बंद कराने के नाम पर लोगों से वोट मांगना शुरू कर दिया है। दरअसल, केजरीवाल की सबसे बड़ी खासियत ही यही है कि वे अपनी गलत बात को भी इस अंदाज में पेश करते हैं कि वह लोगों को सही लगने लगती है।

तालमेल का खेल
इसी हफ्ते दिल्ली के मुख्य सचिव बने विजय देव ने अपना जलवा दिखाना शुरू कर दिया है। अपने अनोखे अंदाज के लिए मशहूर देव ने सभी विभाग प्रमुखों से हफ्ते भर में रिपोर्ट मांगी थी। कहा जा रहा है कि एमएम कुट्टी और अंशु प्रकाश के बाद विजय देव लगातार तीसरे मुख्य सचिव हैं जिनकी नियुक्ति में केंद्र ने दिल्ली सरकार से राय नहीं ली। जबकि इससे पहले केंद्र शासित प्रदेश होने के नाते दिल्ली में होने वाली अधिकारियों की नियुक्ति में केंद्र और दिल्ली सरकार दोनों की सहमति होती थी। हालांकि विजय देव के दिल्ली की आम आदमी पार्टी (आप) सरकार से कोई खराब संबंध नहीं हैं, लेकिन ‘आप’ सरकार के काम करने का ढंग ही ऐसा है कि आसानी से कोई अफसर उससे तालमेल ही नहीं बिठा पाता। विजय देव के काम करने का ढंग भी औरों से थोड़ा अलग है, ऐसे में उनके साथ तालमेल बिठाना सरकार के लिए आसान नहीं होगा। इतना ही नहीं, देव से नाराजगी सरकार को महंगी पड़ सकती है क्योंकि वे जिस बिरादरी से आते हैं, वह बेहद संवेदनशील मानी जाती है।

टिकट का जुगाड़
कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी को भले ही इस बात की चिंता सताती हो कि दिल्ली में पार्टी को किस तरह मजबूत किया जाए लेकिन सूबे के कद्दावर कांग्रेसियों की परेशानी का सबब कुछ और ही है। डेढ़ दशक तक की सत्ता के बाद राजधानी में तीसरे नंबर पर खिसक चुकी कांग्रेस को मजबूत करने के बदले नेता एक-दूसरे की टांग-खिंचाई के दांव-पेंच आजमाने में जुटे हैं। इसी के तहत अपने-अपने बेटों व बेटियों को अहम कुर्सी दिलवाने की कवायद भी बाकायदा जारी है। कुछ नेता ऐसा करने में सफल हो चुके हैं और जो नहीं हुए हैं, उन्होंने अभियान छेड़ रखा है। कुछ नेताओं की कोशिश है कि उम्र और अन्य वजहों से अगर उन्हें चुनावी टिकट नहीं मिल रहा तो उनके बच्चे को दे दिया जाए और अगर लोकसभा का टिकट नहीं मिल रहा तो कम से कम विधानसभा टिकट का जुगाड़ तो होना ही चाहिए। विरासत की सियासत में बड़े कांग्रेसियों के बच्चों ने भी पूरी ताकत झोंक रखी है और पार्टी के हर प्रदर्शन, हर धरने में अपनी मौजूदगी दर्ज करा के वे अपने लिए जगह सुरक्षित करने में जुटे हैं। हालांकि इनकी मौजूदगी उन नेताओं को नागवार गुजर रही है जिन्हें न तो पहले सत्ता की मलाई मिली और न अब संगठन में कुर्सी मिलती दिख रही है। ऐसे नेता पार्टी हाईकमान तक यह संदेश भेजना चाहते हैं कि आखिर कब तक कुछ चंद बड़े नाम ही दिल्ली कांग्रेस में हावी रहेंगे और कब तक दरी बिछाने वाले व नारे लगाने वाले जमीनी कार्यकर्ता हाशिए पर धकेले जाते रहेंगे।

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