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केदारनाथ त्रासदी: आखिर क्या हुआ था पांच साल पहले?

केदारनाथ फिल्म पर उत्तराखंड में बैन लगा दिया है। फिल्म से सैफ अली खान की बेटी सारा अली खान डेब्यू करने वाली है और उनके साथ सुशांत सिंह राजपूत भी स्क्रिन शेयर करेगें। फिल्म में साल 2013 की त्रासदी के बारे में भी दिखाया गया है जिसमें हजारों लोग मारे गए थे, लाखों लोग बेघर हो गए और करोड़ों रुपयों का नुकसान भी हुआ था।

Author December 7, 2018 5:32 PM

फिल्म ‘केदारनाथ’ के प्रदर्शन को उत्तराखंड में बैन कर दिया गया है। हिंदू लड़की और मुस्लिम लड़के की प्रेम की कहानी वाली इस फिल्म ने उस त्रासदी के जख्मों को फिर हरा कर दिया, जिसने 2013 में समूची देवभूमि में तबाही मचा दी थी। अभिनेता सुशांत सिंह राजपूत और अभिनेत्री सारा अली खान अभिनीत इस फिल्म में केदारनाथ की तबाही भी दिखाई गई है, जिसने लाखों लोगों और इस पर्यटन भूमि को पूरी तरह बर्बाद कर दिया था। आइए जानते हैं कि 16 जून 2013 की उस शाम को आखिर हुआ क्या था?

दरअसल 13 जून से 17 जून के बीच में उत्तराखंड राज्य में काफी बारिश हुई थी। आमतौर पर मॉनसून के दिनों में होने वाली यह बारिश सामान्य तौर बारिश से काफी ज्यादा थी, जिससे चौराबाड़ी ग्लेशियर पिघल गया। ग्लेशियर पिघलने से मंदाकिनी नदी उफान पर आ गई और इससे आई बाढ़ ने उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश और पश्चिमी नेपाल के एक बड़े हिस्से को प्रभावित कर दिया। तेज बारिश का पानी पहाड़ों से होकर सीधे केदारनाथ मंदिर में आ गया, जिससे हजारों लोग पानी में बह गए। हालांकि, सबसे ज्यादा तबाही केदारनाथ, बद्रीनाथ, गंगोत्री, यमुनोत्री और हेमकुंड साहिब जैसे धार्मिक स्थानों में हुई। केदारनाथ के शिव मंदिर में लाशों का अंबार लग गया। भारी बारिश और ग्लेशियर के पिघलने के कारण आई इस बाढ़ से हजारों लोग मारे गए। लाखों लोग बेघर हो गए और करोड़ों रुपयों का नुकसान हो गया। अधिकतर रास्ते कट गए थे। कई पहाड़ दरकने से सबकुछ मलबे में तब्दील हो गया था। 8वीं शताब्दी में बने भगवान केदारनाथ के मंदिर को भी नुकसान पहुंचा था। लगभग 5000 लोगों की जान चली गई थी। 5 साल पहले आई इस त्रासदी के बारे में सोचकर आज भी लोग सिहर जाते हैं।

त्रासदी के दौरान बचाव कार्य में भारतीय सेना के दस हज़ार जवान, 11 हेलिकॉप्टर्स, नेवी के गोताखोर और लगभग 45 एयरफोर्स विमानों को लगाया गया था। ये आपदा उत्तराखंड के लोगों के लिए भी किसी बुरे सपने से कम नहीं थी। इंडो-चीन सीमा पर तैनात होने वाले ITBP के जवानों ने एयरफोर्स और सेना के आने से पहले ही मोर्चा संभालकर कई लोगों की जिंदगी बचाई थी।

बादल फटने के कारण हुई बहुत तेज बारिश को इस तबाही का कारण बताया गया, लेकिन पर्यावरणविद् मानते हैं कि मानवीय कारणों से यह आपदा आई थी। पहाड़ों पर अत्यधिक निर्माण कार्य करने, बहुत अधिक पर्यटकों की आवाजाही, खनन के कारण पहाड़ों और पारिस्थितिकी तंत्र को बहुत ज्यादा नुकसान पहुंचा, जो इस त्रासदी का कारण बना। हालांकि, बहुत ज्यादा बारिश के कारण भी यह बाढ़ आई। यह सब इतना अचानक हुआ कि किसी को संभलने का मौका नहीं मिला।

तेजी से हुए निर्माण कार्यों के बाद हालात सुधरे और ये क्षेत्र फिर विकसित होने लगे हैं। वहीं, इस हादसे के बाद सरकार भी संभली। यात्रा पर आने वाले हर यात्री का पंजीकरण करवाना जरूरी किया गया, जिससे श्रद्धालुओं का रिकॉर्ड रखा जा सके। इस त्रासदी के 5 साल बाद देवभूमि के लोगों का जीवन पटरी पर तो लौट आया, लेकिन आज भी वे इस घटना को किसी बुरे सपने से कम नहीं समझते हैं।

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