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बीजेपी को जिताने के लिए कर्नाटक में पहली बार बूथ मैनेज करेगा आरएसएस, बेंगलुरु में हुई अहम बैठक

दक्षिण भारत में कर्नाटक एक मात्र ऐसा राज्य है, जहां पांच साल के लिए पहले भी बीजेपी की सरकार रही है। 2013 से 2018 के बीच कर्नाटक में बारी-बारी से बीएस येदियुरप्पा, सदानंद गौड़ा और जगदीश शेट्टार मुख्यमंत्री रह चुके हैं।

कर्नाटक में चुनावी जनसभा को संबोधित करने के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी( फोटो-ट्विटर)

त्रिपुरा में लाल किले को ढाहने के बाद संघ और बीजेपी के लोग इस बात से गदगद हैं कि अब वे लोग कर्नाटक में भी कांग्रेस की सिद्धारमैया सरकार को उखाड़ फेकेंगे। लिहाजा, बीजेपी पीएम नरेंद्र मोदी के जादूई करिश्मे और पार्टी अध्यक्ष अमित शाह की रणनीति के अलावा आरएसएस की बूथ लेवेल मैनेजमेंट पर भी जोर दे रही है। बीजेपी के लिए कर्नाटक दक्षिण में प्रवेश का किला माना जाता रहा है। इसलिए बीजेपी को उम्मीद है कि वो फिर से सियासी किलेबंदी कर इस दक्षिणी राज्य पर फतह कर लेगी। न्यूज 18 इंडिया के मुताबिक संघ और बीजेपी के नेताओं ने रविवार (04 मार्च) को बेंगलुरु में एक अहम बैठक की जिसमें चुनावी रणनीति पर विचार किया गया। बैठक में संघ ने कर्नाटक में पहली बार बूथ लेवेल पर मैनेजमेंट की जिम्मेदारी उठाई है।

चैनल से बीजेपी के एक नेता ने कहा कि संघ उनकी पार्टी के लिए वैचारिक अभिभावक है मगर पहली बार कर्नाटक में संघ उनकी मदद के लिए बूथ स्तर पर कार्यकर्ताओं की तैनाती कर हिन्दू वोटरों को लामबंद करेगा। माना जा रहा है कि बीजेपी की मुश्किलों को देखते हुए ही संघ ने कर्नाटक में बूथ स्तर पर लोगों को मैनेज करने का बीड़ा उठाया है। यह भगवा ब्रिगेड के लिए राहतभरी खबर है। हालांकि, इससे पहले संघ चुनावों में बीजेपी को मदद करता रहा है लेकिन पहली बार राज्य में बूथ स्तर पर बीजेपी के लिए चुनावी रणनीति बनाएगा और लोगों को मैनेज करेगा। इसके पीछे संघ की कोशिश होगी कि वो ओबीसी और दलित वोट बैंक में सेंध लगाए।

माना जाता है कि कर्नाटक में ओबीसी, दलित और मुस्लिम वोट बैंक कांग्रेस के साथ है। कर्नाटक की राजनीति में इस वोट बैंक को अहिन्दा कहा जाता है। संघ इसी अहिन्दे को तोड़ने की रणनीति पर काम कर रहा है। इधर, कांग्रेस सिद्धारमैया सरकार के कार्यकाल में विकास की बात तो कर रही है लेकिन वोट के नाम पर अहिन्दा पर ही फोकस कर रही है। इस लिहाज से कांग्रेस भी बूथ लेवेल मैनेजमेंट पर काम कर रही है। कांग्रेस की कोशिश है कि अहिन्दा को बूथ स्तर पर अपने पक्ष में लामबंद कर रखा जाय। कांग्रेस की पारंपरिक एससी/एसटी वोटरों को लुभाने के लिए भी बीजेपी कड़ी मेहनत कर रही है।

उधर, बीजेपी और संघ के कार्यकर्ता सिद्धारमैया सरकार के खिलाफ इनकम्बेंसी फैक्टर को भी भुनाने की कोशिशों में जुटे हैं। हालांकि, करप्शन के नाम पर संघ ने चुप्पी साध रखी है क्योंकि पिछली बीजेपी सरकार में भी करप्शन के आरोप लगे थे। बता दें कि दक्षिण भारत में कर्नाटक एक मात्र ऐसा राज्य है, जहां पांच साल के लिए पहले भी बीजेपी की सरकार रही है। 2013 से 2018 के बीच कर्नाटक में बारी-बारी से बीएस येदियुरप्पा, सदानंद गौड़ा और जगदीश शेट्टार मुख्यमंत्री रह चुके हैं। फिलहाल 224 सीटों वाली विधानसभा में बीजेपी 44 सीटों के साथ मुख्य विपक्षी दल है जबकि जनता दल (एस) के 40 विधायक हैं। गुजरात के बाद अब कर्नाटक विधान सभा चुनाव में बीजेपी और कांग्रेस के बीच कांटे की टक्कर की संभावना है।

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