ताज़ा खबर
 

कर्नाटक चुनाव: 2013 में बीजेपी को 20, 2014 में 43 और 2016 में 35 फीसदी वोट, 2018 में ये हो सकता है हाल

बदले सियासी समीकरण में जेडीएस को बीएसपी और एआईएमआईएम ने समर्थन दिया है लेकिन इन दोनों दलों का खास प्रभाव राज्य में नहीं है। लिहाजा, 2013 के मुकाबले 20 फीसदी वोट वाली जेडीएस का वोटिंग फीसदी की आंकड़ा थोड़ा और बढ़ सकता है।

कर्नाटक में चुनावी जनसभा को संबोधित करने के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी( फोटो-ट्विटर)

कर्नाटक में 12 मई को चुनाव होंगे और 15 मई को नतीजे आएंगे। राजनीतिक पंडितों के मुताबिक इस बार यहां मुकाबला त्रिकोणीय है। अधिकांश चुनावी ओपिनियन पोल्स के मुताबिक कांग्रेस 93-99 सीटें जीतकर सबसे बड़ी पार्टी बन सकती है जबकि बीजेपी 85-91 सीट के साथ दूसरी और जेडीएस 33-39 सीट के आसपास तीसरे नंबर पर किंगमेकर की भूमिका में रह सकती है। 224 सीटों वाले कर्नाटक विधानसभा के पिछले यानी 2013 के चुनावों में कांग्रेस ने कुल 36.6 फीसदी वोट शेयर के साथ 122 सीटें जीती थीं जबकि बीजेपी 19.9 फीसदी वोट शेयर के साथ सिर्फ 40 सीट जीत सकी थी। जेडीएस भी 20.2 फीसदी वोटों के साथ 40 सीटें जीती थीं। बता दें कि उस वक्त बीएस येदुरप्पा की पार्टी कर्नाटक जनता पक्ष (केजेपी) ने अलग चुनाव लड़ा था और 9.8 फीसदी वोट शेयर के साथ कुल 6 सीटें जीती थीं। मौजूदा बीजेपी सांसद श्रीरामुलू की पार्टी बीएसआर कांग्रेस ने भी अलग चुनाव लड़ा था। उन्हें 2.7 फीसदी वोट और चार सीटें मिली थीं। समाजवादी पार्टी को एक सीट और 0.3 फीसदी वोट मिले थे। इनके अलावा कुल नौ निर्दलीयों को 7.4 फीसदी वोट मिले थे।

करीब सालभर बाद ही जब अप्रैल 2014 में लोकसभा चुनाव हुए तो राज्य में न केवल सियासी समीकरण बदल चुके थे बल्कि चुनावी नतीजे भी बदल गए थे। येदुरप्पा की पार्टी केजीपी और श्रीरामूलू की पीर्टी बीएसआर कांग्रेस का बीजेपी में विलय हो चुका था। यानी बीजेपी में इन दोनों के (9.8 और 2.7) कुल वोट पर्सेन्ट 12.5 फीसदी मिल चुके थे। 2014 के लोकसभा चुनावों में कर्नाटक में बीजेपी को 17 सीटें और कुल 43 फीसदी वोट मिले थे। जो साल भर पहले विधानसभा चुनाव के वक्त मात्र 19.9 फीसदी था। हालांकि, कांग्रेस के वोट पर्सेन्ट में भी इजाफा हुआ था। यह 36.6 फीसदी से बढ़कर 40.8 फीसदी हो गया था। कांग्रेस के 9 सांसद चुने गए थे। यानी दोनों राष्ट्रीय पार्टियों का वोट बैंक बढ़ा था। राज्य में सबसे ज्यादा नुकसान क्षेत्रीय पार्टी जेडीएस को लोकसभा चुनाव में हुआ था। 2013 के मुकाबले उसके वोट पर्सेन्ट में 9.2 फीसदी की गिरावट आई थी। जेडीएस के केवल दो सांसद ही लोकसभा पहुंच सके थे। अन्य के खाते में 5.2 फीसदी वोट गए थे।

चार साल बाद फिर से राज्य में चुनाव हो रहे हैं। सियासी समीकरण भी बदले हुए हैं। 2014 में मोदी लहर थी लिहाजा, 2013 की तुलना में बीजेपी का वोट पर्सेन्ट करीब 23 फीसदी बढ़ गया था। मौजूदा दौर में चुनाव विधानसभा का है और सर्वे के मुताबिक मोदी लहर में भी कमी दिख रही है। ऐसे में अगर 2013 के आधार पर बीजेपी, केजेपी और बीएसआर कांग्रेस के कुल वोट पर्सेन्ट को जोड़ दें तो यह आंकड़ा 32.7 फीसदी हो जाता है। कांग्रेस का वोट पर्सेन्ट 2013 में 36.6 फीसदी था उसे सपा समर्थन दे रही है, जिसके 0.3 फीसदी वोट हैं। यानी कांग्रेस को 40 फीसदी वोट मिल सकते हैं। पारंपरिक रूप से बीजेपी का वोट बैंक समझे जाने वाले लिंगायतों ने कांग्रेस के समर्थन में वोट किया तो यह आंकड़ा बढ़ सकता है।

उधर, बदले सियासी समीकरण में जेडीएस को बीएसपी और एआईएमआईएम ने समर्थन दिया है लेकिन इन दोनों दलों का खास प्रभाव राज्य में नहीं है। लिहाजा, 2013 के मुकाबले 20 फीसदी वोट वाली जेडीएस का वोटिंग फीसदी की आंकड़ा थोड़ा और बढ़ सकता है। राष्ट्रीय राजनीति में चल रही साम्प्रदायिक राजनीति की हवा ने वोटरों को प्रभावित किया तो भी बीजेपी की सेहत पर कुछ खास प्रभाव नहीं पड़ने वाला। हालांकि, इससे कांग्रेस को फायदा हो सकता है क्योंकि राज्य में करीब 13 फीसदी मुस्लिम वोट है।

मोदी सरकार बनने के दो साल बाद और आज से दो साल पहले यानी 2016 के बीच में जब कर्नाटक में नगर निकाय चुनाव हुए थे तब कांग्रेस को 46.9, बीजेपी को 34.8 और जेडीएस को 15.7 फीसदी वोट मिले थे। यानी दो साल बाद ही बीजेपी के वोट पर्सेन्ट में करीब 9 फीसदी की गिरावट दर्ज की गई। 2013 के मुकाबले यह करीब 14 फीसदी ज्यादा है।

Hindi News से जुड़े अपडेट और व्‍यूज लगातार हासिल करने के लिए हमारे साथ फेसबुक पेज और ट्विटर हैंडल के साथ गूगल प्लस पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News App