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क्षेत्रवार सोशल इंजीनियरिंग में भाजपा ने कांग्रेस से बाजी मार ली, लिंगायत-मुसलिम बहुल इलाकों में भाजपा का परचम

कर्नाटक चुनाव में भारतीय जनता पार्टी सबसे बड़े राजनीतिक दल के रूप में उभरी है। उसने भाषा, क्षेत्र, जाति और धर्म-हर कोण से कर्नाटक का विश्लेषण किया और सोशल इंजीनियरिंग पर ध्यान दिया। पार्टी छोड़कर जा चुके बीएस येदियुरप्पा की वापसी कराना भाजपा के लिए सटीक बैठा।

Author नई दिल्ली | May 16, 2018 03:33 am
येदियुरप्पा

कर्नाटक चुनाव में भारतीय जनता पार्टी सबसे बड़े राजनीतिक दल के रूप में उभरी है। उसने भाषा, क्षेत्र, जाति और धर्म-हर कोण से कर्नाटक का विश्लेषण किया और सोशल इंजीनियरिंग पर ध्यान दिया। पार्टी छोड़कर जा चुके बीएस येदियुरप्पा की वापसी कराना भाजपा के लिए सटीक बैठा। लिंगायत समुदाय के इस बड़े नेता को साधकर भाजपा ने लिंगायत मतदाताओं में सेंध लगा ली। बी श्रीरामुलू की वापसी कराने का भी फायदा भाजपा को मिला। कर्नाटक के क्षेत्रवार रुझान देखें तो मुंबई-कर्नाटक क्षेत्र में कमल खिला है। यहां भाजपा 29 पर सफल रही। हालांकि, हैदराबाद कर्नाटक क्षेत्र पर पहले केसरिया परचम लहरा रहा था, लेकिन बाद में कांग्रेस ने बढ़त ले ली। हैदराबाद कर्नाटक क्षेत्र में भाजपा 12 और कांग्रेस 15 और जेडीएस 4 सीटों के फायदे में रहे। तटीय कर्नाटक की 21 सीटों में से 18 पर भाजपा को फायदा हुआ है। मध्य कर्नाटक की 35 सीटों में भाजपा 24 सीटों पर आगे रही।

दक्षिण कर्नाटक में जद (सेकु) को भारी बढ़त मिली। कांग्रेस इस क्षेत्र में दूसरे और भाजपा तीसरे स्थान पर रही। बंगलुरू क्षेत्र की 36 सीटों पर भाजपा, जद (एस) और कांग्रेस के बीच कांटे की टक्कर रही। भाजपा ने बेंगलुरु में 16 और कांग्रेस ने 11 सीटों पर बढ़त बनाई। भाजपा ने लिंगायत बहुल उत्तरी कर्नाटक, तटीय कर्नाटक और हैदराबाद कर्नाटक में अच्छा प्रदर्शन किया। कांग्रेस के नेता सिद्धारमैया ने लिंगायतों को अलग धर्म का दर्जा देने की सिफारिश कर बड़ा चुनावी दांव चला था। लेकिन भाजपा ने इसे हिंदुओं को बांटने का मुद्दा बनाया और वह इसमें कामयाब हो गई। वर्ष 2013 के चुनाव में भाजपा को 62 लिंगायत बहुल क्षेत्रों से 29 सीटों पर जीत हासिल हुई थी। इस बार यह जीत और बड़ी हो गई। भाजपा को 40 से ज्यादा सीटों पर सफलता मिली है। लिंगायत बहुल इलाकों में भाजपा को बड़ी बढ़त मिली है, तो इसका श्रेय येदियुरप्पा को ही जाता है। 2013 के आंकड़े इसकी तस्दीक करते हैं। तब वह भाजपा से अलग होकर लड़े थे और ऐसे इलाकों में पार्टी महज पांच सीटों पर ही सिमट गई थी। जबकि कांग्रेस को 47, जनता दल (सेकु) को 11 और 7 सीटें अन्य के खाते में गई थीं।

कर्नाटक में 23 मुसलिम बहुल सीटें हैं। 2013 में भाजपा को 23 में से सिर्फ आठ सीटों पर जीत हासिल हुई थी। लेकिन इस विधानसभा चुनाव में भाजपा को 19 सीटें मिली हैं। अनुसूचित जाति-जनजाति के मतदाताओं ने भी भाजपा पर भरोसा जताया है। 2013 में भाजपा को 23 सीटें मिली थीं, लेकिन 2018 में भाजपा को 28 सीटों पर जीत मिली है। कर्नाटक में अजा-अजजा बहुल 62 सीटें हैं। भाजपा ने जनता दल (सेकु) के वोक्कालिंगा मतदाताओं में भी सेंध लगाई है। वोक्कालिंगा बहुल 43 सीटों में से भाजपा को 11 सीटों पर जीत मिली है, जबकि 2013 में वह सिर्फ आठ सीटों पर ही जीत हासिल कर सकी थी। तटीय क्षेत्रों की 32 सीटों पर भाजपा को नौ सीटों का फायदा हुआ है। भाजपा ने सत्ता विरोधी लहर को भी खूब भुनाया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपनी रैलियों में भ्रष्टाचार का मुद्दा उठाया। सिद्धरमैया की महंगी घड़ी पर तंज कसे थे।

कर्नाटक के चुनाव नतीजों का इस साल के अंत में होने वाले मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान के विधानसभा चुनाव पर राजनीतिक समीकरण के लिहाज से असर पड़ेगा। कांग्रेस ने इन राज्यों में विधानसभा चुनावों के लिए तैयारियां शुरू कर दी हैं। लेकिन भाजपा में नरेंद्र मोदी और अमित शाह की जोड़ी जिस तरह से सोशल इंजीनियरिंग के मुद्दों पर काम करती है, उसकी काट कांग्रेस ढूंढ नहीं पाई है। कम से कम कर्नाटक के नतीजों से यह स्पष्ट है।

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