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गोवा में स्‍लीवलेस ड्रेस की वजह से महिला को चर्च में एंट्री नहीं, कर्नाटक के मंदिर में भी लग सकता है ड्रेस कोड

यदि एक ड्रेस कोड लागू किया जाता है, तो पुरुषों को ट्राउजर, धोती, कुर्ता, शर्ट पहनने की अनुमति दी जाएगी और महिलाओं को स्लीवलेस कपड़े पहनने की अनुमति नहीं दी जा सकती है।

Author Published on: October 17, 2018 4:29 PM
औसतन, मंदिर में रोजाना कम से कम 2,000 भक्त आते हैं और पीक सीजन के दौरान, संख्या बढ़ जाती है।

भारत के कई मंदिरों ने ड्रेस कोड पेश किए गए हैं, कुछ इसका समर्थन करते हैं और कुछ इसका विरोध करते हैं। दरअसल गोवा के से कैथेड्रल चर्च में एक महिला को एंट्री नहीं मिली। चर्च में महिला को इसलिए एंट्री नहीं मिली क्योंकि महिला ने स्लीवलेस ड्रेस पहन रखी थी। इसके अलावा हम्पी में 15 वीं शताब्दी का विरुपक्ष मंदिर इस लिस्ट में शामिल होने वाला नया मंदिर हो सकता है जहां भक्तों को ड्रेस कोड का पालन करना होगा। दरअसल मंदिर प्रशासन ने सरकार से ड्रेस कोड लागू करने की मांग की है। द इकॉनोमिक टाइम्स के मुताबिक हम्पी में विरुपक्ष मंदिर के कार्यकारी अधिकारी प्रकाश राव ने कहा, “पिछले महीने, बलारी सहायक आयुक्त के माध्यम से उप आयुक्त को एक नया प्रस्ताव भेजा गया था। स्थानीय लोगों का कहना है कि लोग शॉर्ट ड्रेस पहनकर मंदिर जाते हैं।”

उन्होंने कहा कि यदि जगह की पवित्रता को बनाए रखा जाना है तो ड्रेस कोड को लागू करना जरूरी है। लोगों को यहां अक्सर शॉर्ट्स पहनकर मंदिर में देखा जाता है। यह एक प्रमुख मंदिर और पूजा का एक महत्वपूर्ण स्थान है। पूजा और अन्य संबंधित गतिविधियां पूरे दिन की जाती हैं। हमने ड्रेस कोड के कार्यान्वयन की मांग को प्रस्तुत कर दिया है। अभी तक, हमने कोई ड्रेस कोड लागू नहीं किया है, कोई आदेश पारित नहीं किया गया है।

यदि एक ड्रेस कोड लागू किया जाता है, तो पुरुषों को ट्राउजर, धोती, कुर्ता, शर्ट पहनने की अनुमति दी जाएगी और महिलाओं को स्लीवलेस कपड़े पहनने की अनुमति नहीं दी जा सकती है। केवल पूरी लंबाई वाली पैंट की अनुमति होगी। जैसा कि ड्रेस कोड के रूप में है, भारतीय और विदेशी भक्तों के साथ समस्याएं हैं। औसतन, मंदिर में रोजाना कम से कम 2,000 भक्त आते हैं और पीक सीजन के दौरान, संख्या बढ़ जाती है। एक अधिकारी ने कहा, “भक्त कम से कम पूजा के समय पवित्रता बनाए रखें।” इससे पहले, मंदिर ने ड्रेस कोड को लागू करने का प्रयास किया था। सूत्रों के मुताबिक, लगभग छह साल पहले, मंदिर कार्यालय ने एक सफेद शॉल देने का प्रयास किया था, जो भक्तों को मंदिर जाने से पहले लपेटना होता था।

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