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30 साल में 6 बार नौकरी से निकाला गया, हर बार कोर्ट से लड़कर वापस हासिल की

हाई कोर्ट ने मूर्ति के नियोक्ता कर्नाटक सिल्क इंडस्ट्रीज कॉर्पोरेशन पर 25 हजार रुपये का जुर्माना भी लगाया।
तस्वीर का इस्तेमाल प्रतीक के तौर पर किया गया है।

वाईएन कृष्ण मूर्ति को नौकरी से छह बार निकाला गया लेकिन उन्होंने हर बार हाई कोर्ट जाकर अपनी नौकरी वापस ले ली। टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के अनुसार कर्नाटक सिल्क इंडस्ट्रीज कॉर्पोरेशन (केएसआईसी) में काम करने वाले कृष्ण मूर्ति को पहली बार 1994 में “खराब कर्मचारी” बताकर नौकरी से निकाला गया था। कृष्ण मूर्ति फैसले के खिलाफ हाई कोर्ट गये और जीत हासिल की। कृष्ण मूर्ति केएसआईसी में असिस्टेंट सेल्स अफसर के तौर पर काम करते हैं। कृष्ण मूर्ति पिछले 30 सालों में छह बार नौकरी से निकाले जा चुके हैं और हर बार उन्होंने हाई कोर्ट से कहा कि उन्हें “झूठे बहाने और गैर कानूनी तरीके” निकाला गया है, हर बार कोर्ट ने उनकी बात को सही पाया। 20 सितंबर को कृष्ण मूर्ति ने छठवीं बार हाई कोर्ट में केएसआईसी के खिलाफ हाई कोर्ट में मामला जीता। हाई कोर्ट ने केएसआईसी को कृष्ण मूर्ति का वेतन और अन्य भत्ते देने का आदेश दिया है।

कर्नाटक हाई कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि कृष्ण मूर्ति को “लगातार परेशान” किया जा रहा है जो “अनुचित, अतार्किक और अन्यायपूर्ण” है। अदालत ने कहा कि कृष्ण मूर्ति को “खराब कर्मचारी” जैसे अस्पष्ट कारण के आधार पर नौकरी से निकाला गया और “अगर बचाव पक्ष को लगता है कि याची खराब कर्मचारी है तो भी उसे हटाने के लिए कानून का उल्लंघन नहीं किया जा सकता और उसे पद का मनचाहा इस्तेमाल करके उसने नहीं हटाया जा सकता।”

49 वर्षीय मूर्ति 11 सितंबर 1989 में केएसआईसी में असिस्टेंट सेल्स अफसर के तौर पर नियुक्त हुए थे। उनका प्रोबेशन पीरियड एक साल का था लेकिन उसे “प्रदर्शन संतोषजनक” होने का कारण बताकर मार्च 1994 तक कर दिया गया। ये अवधि खत्म होने के बाद उन्हें नौकरी से निकाल दिया गया।  फैसले के खिलाफ वो हाई कोर्ट गये। मामले में अपील भी दायर हुई और जब दो जज मामले पर परस्पर असहमत रहे तो 1996 में तीसरे जज ने मूर्ति के पक्ष में फैसला दिया। नौकरी पर आते ही कुछ महीने बाद ही उन्हें “कारण बताओ” नोटिस दे दी गयी और 1997 में दोबारा नौकरी से निकाल दिया गया। 1998 में होई कोर्ट गये और 2001 में अदालत ने उनके पक्ष में फैसला दिया। हाई कोर्ट ने केएसआईसी को मूर्ति के वेतन और भत्ते के अलावा पांच हजार रुपये हर्जाना देने का भी आदेश दिया।

टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के अनुसार उसके बाद चार सालों तक मूर्ति की नौकरी सही चली लेकिन साल 2005 में उन्हें फिर “कारण बताओ” नोटिस दी गयी। हाई कोर्ट ने इस बार भी मूर्ति को सही मानते नोटिस खारिज कर दिया और केएसआईसी पर 10 हजार रुपये का जुर्माना लगाया। लेकिन केएसआईसी ने फैसले के खिलाफ अपील की और जीत हासिल की जिससे “कारण बताओ” नोटिस कायम रही। विभागीय जांच के बाद साल  मार्च 2006 में मूर्ति को फिर नौकरी से निकाल दिया गया। इस बार भी हाई कोर्ट में मूर्ति को जीत मिली।

जुलाई 2012 में एक विभागीय जांच के बाद केएसआईसी ने मूर्ति को नौकरी से निकाल दिया। कई बार की अपील के बाद इस महीने मूर्ति के हक में फैसला आ गया। हाई कोर्ट ने इस बात पर हैरानी जतायी कि मूर्ति 25 साल से प्रोबेशन पर हैं। हाई कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि मूर्ति को हटाने के लिए “अपने काम की अनदेखी और रुचि के अभाव” को कारण बताया गया है लेकिन इस आरोप के समर्थन में ठोस उदाहरण नहीं दिये गये हैं। अदालत ने कहा है कि मूर्ति को निकालने के लिए विभागीय जांच में केवल “निर्णय” दिए गये हैं उनके समर्थन में तथ्य नहीं। हाई कोर्ट ने केएसआईसी पर 25 हजार रुपये का जुर्माना भी लगाया है।

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  1. Sidheswar Misra
    Sep 29, 2017 at 12:03 pm
    अफसरशाही के शिकार
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    Reply
    1. G
      Girish
      Sep 28, 2017 at 4:39 pm
      आज कल नौकरी से निकलना ेएक स्टंट हुआ है, कर्मचारी लोगो को उनकी नौकरी में कुछ भी सुरक्षा नहीं रही है, उद्योगपति अपने फायदे के लिए अपने कर्मी को बालिका बकरा बनाते है, कभी काम के बारेमे , परफॉरमेंस अछि नहीं, कारखान में मॉल बिकता नहीं, आपसी पर्सनल दुश्मनी , अच्छे काम करने वालोंके खिलाब उनके अफसर शिकायत एवं उनकी ख़राब रिकॉर्ड की वकालत अपनी वरिस्टोसे करते है, अपने फयदे के लिए उनकी जूनियर्स की काम ठीक होने के बावजूद नकारात्मक फीड बैक देते रहते है, खुद काम में कुशल नहीं होते, झूठ मुठ अपनी एम्प्लाइज के बारे में HR , डिपार्टमेंटल लोगो को गलत जानकारी देके अप्पना रोजी रोटी फॅमिली को बचाते है, खुद काम किये बिना अछि ग्रेडिंग हासिल करते है, और बॉस की नज़रोमे अछि रहने की कोशिश करते है, बैईमानीसे अपनी नौकरी टिकाते है, कर्मचारी के ऊपर दादागिरी करके अप्पनी ६० साल नौकरी सुरिक्षित रखने में कामयाब होते है, बड़े अधिकारी ६० साल होने बाउजूद २ या ३ साल कंसल्टेंसी करके रिटायरमेंट का पैसा बैंक में रखकर ज्यादा कमाई के ऊपर अत्तिरिक्त तन्खा लेते,मै टाटा हिताची धारवाड़ में अछि काम करने बावजूद इंदु ,गुप्ता ,ने बकरा किया
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