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कारगिल शहीद कैप्टन मनोज पांडेय का जन्मदिन आज: गोली लगने के बाद रेंगते हुए पाकिस्‍तान का चौथा बंकर किया तबाह, पढ़ें परमवीर की पूरी कहानी

साल 1995 में जब मनोज की ऑर्मी में भर्ती हुई तो उन्होंने गोरखा राइफल्स ज्वाइन की थी। गोरखा रेजिमेंट को बहादुरी का बड़ा प्रतीक माना जाता है। मनोज पांडेय ने जो शब्द अपने इंटरव्यू में कहे थे वो शब्द बिलकुल सही साबित हुए।

Manoj Pandey| Kargil War| Paramveer Chakra
कारगिल शहीद मनोज पांडेय का जन्मदिन आजः Photo – File

कैप्टन मनोज पांडेय का आज जन्मदिन है, साल 1999 में कारगिल युद्ध के दौरान मनोज पांडेय भारत मां की रक्षा करते शहीद हो गए थे। उनकी इस शहादत को इतिहास के पन्नों में सुनहरे अक्षरों में दर्ज किया गया है। आज के दिन मनोज पांडेय को एक परमवीर योद्धा के तौर पर याद करना ही उनके लिए सच्ची श्रद्धांजलि है। कैप्टन मनोज पांडेय का जन्म उत्तर प्रदेश में सीतापुर के कमलापुर में 25 जून 1975 को हुआ था। उनके पिता का नाम गोपी चंद्र पांडे था। बचपन से ही मनोज पांडेय अपनी मां से बहादुरी के किस्से कहानियां सुना करते थे। इन्हीं कहानियों ने उनके मन में सेना में जाने की भावना को पुख्ता किया था।

मनोज ने 8वीं क्लास तक की पढ़ाई लखनऊ के रानी लक्ष्मीबाई मेमोरियल सीनियर सेकेंडरी स्कूल में की थी। वो हमेशा अपनी क्लास में अव्वल आते थे। सीनियर सेकेंडरी के बाद मनोज ने अपना दाखिला ऑर्मी स्कूल में करवाया क्योंकि उन्हें सेना में जाने की धुन जो सवार थी। यहां एडमिशन पाने के बाद उनके जुनून को जैसे और तेजी मिल गई हो। जब मनोज ने ऑर्मी की लिखित परीक्षा पास कर ली और उन्हें इंटरव्यू कॉल आई तो वो खुशी का ठिकाना ही नहीं था। मनोज ग्रामीण इलाके से ताल्लुक रखते थे और उन्हें अंग्रेजी का ज्यादा ज्ञान नहीं था।

इंटरव्यू में ही कहा था ‘परमवीर चक्र’ चाहिए
वो कहावत है कि ‘होनहार बिरवान के होत चिकने पात’ ये कहावत भी मनोज पांडेय पर बखूबी चरितार्थ होती है जब सेना के लिए वो इंटरव्यू देने गए थे तब इंटरव्यू में उनसे सवाल किया गया, क्या आप ऑर्मी ज्वाइन करना चाहते हैं? इसके जवाब में उन्होंने कहा था- उन्हें ‘परमवीर चक्र’ चाहिए। इंटरव्यू पैनल में बैठे सभी लोग मनोज पांडेय के उस जवाब को सुनकर हंसने लगे। इसके बाद इंटरव्यूर ने पूछा कि क्या आपको पता है कि परमवीर चक्र कैसे मिलता है? तो इसपर मनोज पांडेय ने जवाब देते हुए कहा था ज्यादातर लोगों को शहादत के बाद मिला है लेकिन अगर मुझे मौका मिला तो मैं इसे जीवित लेकर आउंगा।

ऑर्मी में भर्ती के साथ ज्वाइन की गोरखा राइफल्स
साल 1995 में जब मनोज की ऑर्मी में भर्ती हुई तो उन्होंने गोरखा राइफल्स ज्वाइन की थी। गोरखा रेजिमेंट को बहादुरी का बड़ा प्रतीक माना जाता है। मनोज पांडेय ने जो शब्द अपने इंटरव्यू में कहे थे वो शब्द बिलकुल सही साबित हुए। मनोज पांडेय ने कारगिल युद्ध में अपनी वीरता को साबित किया और भारत के सर्वोच्च सम्मान परमवीर चक्र से सम्मानित किए गए। मनोज पांडेय की पहली पोस्टिंग ही श्रीनगर में हुई जहां से उन्हें दुनिया के सबसे ऊंचे युद्धक्षेत्र सियाचिन में उनकी तैनाती की गई। 4 मई 1999 को उन्हें ऑपरेशन रक्षक के तहत कारगिल में मौर्चा संभालने के लिए भेजा गया।

संसाधनों की कमी में भी मनोज ने दिखाई थी जांबाजी
जब कारगिल युद्ध शुरुआती दौर में था तब जवानों को इस बात की जानकारी नहीं थी कि दुश्मनों की संख्या कितनी है क्योंकि वो ऊंचाई पर छिपे हुए बंकरों से वार करते थे। ऐसे में मनोज पांडेय को शुरुआत में सिर्फ इस इलाके की गश्त की जिम्मेदारी दी गई थी। मनोज ने सीमित संसाधनों में भी इस काम को बखूबी निभाया था। वो कई बार अपने पैरे के मोजे ही हाथों में पहन कर चढ़ाई कर लेते थे। बर्फीले इलाके में बंदूक की नली कहीं जाम ना हो जाए इसके लिए वो उसे गर्म रखने के लिए कपड़े बांध कर रखते थे।

दुश्मनों को बनाया खुखरी से निशाना
3 जुलाई साल 1999 का दिन मनोज पांडेय के जीवन का ऐतिहासिक दिन रहा। इस दिन मनोज पांडेय को खालूबार चोटी को दुश्मनों से आजाद करवाने की जिम्मेदारी दी गई। खालूबार चोटी पर तापमान शून्य डिग्री या उससे कम भी रहता था। ऐसे माहौल के लिए गोरखा बटालियन सबसे उपयुक्त टीम थी। इस युद्ध में पाकिस्तान की कमर तोड़ने के लिए खालूबार चोटी को जीतना बहुत ही जरूरी था। ऐसा इसलिए क्योंकि उसके पीछे पीओके था जहां पर पाकिस्तान ने अपना हैलिपैड बनाया था। उन्हें दुश्मनों को दायीं तरफ से घेरना था। जबकि बाकी टुकड़ी बायीं तरफ से दुश्मन को घेरने वाली थी। वह दुश्मन के सैनिकों पर चीते की तरह टूट पड़े और उन्हें अपनी खुखुरी से फाड़कर रख दिया। उनकी खुखुरी ने चार सैनिकों की जान ली। ये लड़ाई हाथों से लड़ी गई ​थी।

जख्मी होने के बाद भी दुश्मनों पर पड़े भारी
खालूबार चोटी जीतने के बाद मनोज पांडेय बुरी तरह से जख्मी हो गए थे उनके कंधे और घुटनों में चोट लगी थी। इसके बावजूद उनके जज्बे में कहीं से भी कोई कमी नहीं दिखाई दे रही थी। इस दौरान उन्होंने पीछे लौटने से इनकार कर दिया और घायल अवस्था में ही अपने सैनिकों का उत्साह बढ़ाते रहे। उन्होंने अपनी गोलियों और ग्रेनेड हमलों से दुश्मन के एक के बाद एक करके सारे बंकर तबाह कर दिए ​थे। गोली लगने के बाद मनोज पांडेय ने रेंगते हुए पाकिस्तान का चौथा बंकर तबाह किया था। इन्हीं हमलो के बाद मनोज पांडेय ने खालूबार चोटी तो जीत ली लेकिन इसे जीतने की देश ने भारी कीमत भी चुकाई। हमने कारगिल के युद्ध को तो जीत लिया। लेकिन उसे जीतने के लिए हमने कई बहादुर सैनिकों जैसे विजयंत थापर, विक्रम बत्रा, सौरभ कालिया, पदमपाणि आचार्य, अनुज नायर और मनोज पांडेय जैसे वीरों को खो दिया।

इतिहास में अमर हुए कैप्टन मनोज पांडेय
साल 2003 में आई फिल्म एलओसी कारगिल में अजय देवगन ने कैप्टन मनोज पांडेय का किरदार निभाया था। वहीं अमर चित्र कथा ने भी उनकी वीरता पर कॉमिक बुक प्रकाशित की थी। भारत सरकार ने मनोज पांडेय की वीरता और उनके अदम्य साहस के लिए उन्हें मरणोपरांत परमवीर चक्र से सम्मानित किया था। कैप्टन मनोज पांडेय की वीरता हर देशवासी के लिए आदर्श है कैप्टन मनोज पांडेय ने अपनी डायरी में एक लाइन लिखी थी, जो सिर्फ उनके जैसा दिलेर ही लिख सकता था। उन्होंने लिखा था,”कुछ लक्ष्य इतने महान होते हैं कि उन्हें पाने में विफल होना भी गौरवपूर्ण होता है।”

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