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पत्रकार हत्याकांड: इतनी थी राम रहीम की पावर कि 28 दिन जिंदा रहे छत्रपति, लेकिन नहीं हुए बयान

सिरसा के पत्रकार रामचंद्र छत्रपति के परिवार को 16 साल बाद सीबीआई कोर्ट ने इंसाफ दे दिया है, लेकिन 2002 में डेरे ने ज्यादतियों ने उन्हें सड़क पर ला दिया था। हालात ऐसे हो गए थे कि 2 साल तक छत्रपति के परिवार को घर से बाहर निकलने में डर लगता था।

रामचंद्र छत्रपति और बेटा अंशुल फोटो सोर्स- इंडियन एक्सप्रेस

पत्रकार रामचंद्र छत्र पति की हत्या के मामले में सीबीआई की विशेष अदालत राम रहीम को पचास हजार के जुर्माने के साथ उम्रकैद की सजा सुना चुकी है। वहीं गुरमीत राम रहीम के साथ तीन अन्य आरोपियों कुलदीप सिंह, निर्मल सिंह और कृष्ण लाल को भी उम्रकैद की सजा सुनाई गई है। सिरसा के पत्रकार रामचंद्र छत्रपति के परिवार को 16 साल बाद सीबीआई कोर्ट ने इंसाफ दे दिया है, लेकिन 2002 में डेरे ने ज्यादतियों ने उन्हें सड़क पर ला दिया था। हालात ऐसे हो गए थे कि 2 साल तक छत्रपति के परिवार को घर से बाहर निकलने में डर लगता था। वहीं, 28 दिन तक छत्रपति जिंदगी-मौत से जूझते रहे थे, लेकिन पुलिस का कोई भी अधिकारी उनके बयान लेने नहीं गया था।

पत्रकार ने बयान दिया, पुलिस ने दर्ज ही नहीं किया: बताया जाता है कि घायल छत्रपति को रोहतक के पीजीआई अस्पताल में भर्ती कराया गया था। उन्होंने अपने बयान में कहा था, ‘‘मुझ पर हमला डेरा मैनेजर ने नहीं, बल्कि राम रहीम ने कराया है।’’ इसके बावजूद पुलिस ने राम रहीम का नाम एफआईआर में दर्ज ही नहीं किया। हरियाणा के तत्कालीन मुख्यमंत्री ओमप्रकाश चौटाला भी अस्पताल में छत्रपति से मिले। उन्होंने भरोसा दिलाया कि इंसाफ होगा, लेकिन पुलिस राम रहीम को बचाने में ही लगी रही। इसके बाद छत्रपति की तबीयत बिगड़ती चली गई और उन्होंने 21 नवंबर, 2002 को दुनिया को अलविदा कह दिया। यह राम रहीम की पावर ही थी कि इस हमले के 28 दिन बीतने तक भी छत्रपति के बयान लेने कोई मैजिस्ट्रेट अस्पताल नहीं पहुंचा था।

पहले धमकाया, फिर झूठे केस में फंसाने की दी धमकी : छत्रपति के बेटे अंशुल ने इंडियन एक्सप्रेस को एक इंटरव्यू में बताया था कि डेरे के लोगों ने उनके पिता को कई बार धमकाया था। जब धमकी से बात नहीं बनी तो डेरे के एक अनुयायी ने उनके खिलाफ एससी/एसटी एक्ट में केस दर्ज करा दिया। शिकायत में दावा किया गया था कि छत्रपति ने उसे डेरे में घुसकर जातिसूचक शब्द कहे। हालांकि, शिकायत में दर्ज वारदात की तारीख वाले दिन छत्रपति और उनका परिवार एक रिश्तेदार की शादी में पंजाब गए थे। उन्होंने पुलिस को शादी की तस्वीरें दिखाईं, जिससे वे बच गए। डेरे से मिल रही धमकियों से परेशान होकर छत्रपति ने सिरसा के एसपी को एक चिट्ठी लिखी थी, लेकिन पुलिस ने कोई कार्रवाई नहीं की।

हमले की आशंका जताई और 4 दिन बाद हो गई हत्या: जानकारी के मुताबिक, छत्रपति ने एक भरी सभा में अपनी जान को खतरा बताया था। इसके महज 4 दिन बाद ही उन पर हमला हो गया। कहा जाता है कि हमलावर पहले उनके ऑफिस गए थे, लेकिन वहां उन्हें हमला करने का मौका नहीं मिला। ऐसे में वे पत्रकार के घर पहुंच गए। उस वक्त छत्रपति का परिवार करवाचौथ मना रहा था। गोलियां चलाकर दोनों हमलावर भागे, लेकिन छत्रपति के घर से कुछ दूर मौजूद पुलिस पिकेट ने एक हमलावर को पकड़ लिया। उसकी निशानदेही पर दूसरा बदमाश भी गिरफ्तार हो गया। एक पत्रकार की सरेआम हत्या के विरोध में 25 अक्टूबर, 2002 को सिरसा बंद रहा था। वहीं, 16 नवंबर, 2002 को सिरसा में मीडिया महापंचायत भी हुई थी।

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