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जेएनयू में अध्यात्म और योग पढ़ाने की तैयारी

परिषद के एक सदस्य ने बताया कि प्रस्तावित पाठ्यक्रम के मसविदे को एसी में पिछले साल खारिज कर दिया गया था। लेकिन हाल में हुई बैठक में यह मामला फिर उठा।

नई दिल्ली | May 30, 2016 5:29 AM
जवाहर लाल नेहरू यूनिवर्सिटी साल 2017 में देश के टॉप 10 शिक्षण संस्थाओं में दूसरे नंबर पर रहा । (फाइल फोटो)

जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) में आध्यात्मिक और पौराणिक परंपरा और दुनिया में भारतीय मूल्यों की स्थापना के लिए भारतीय संस्कृति और योग पर अल्पकालिक पाठ्यक्रम शुरू करने की तैयारी चल रही है। इससे संबंधित एक प्रस्ताव को पहले ठंडे बस्ते में डाल दिया गया था। लेकिन हाल में हुई विश्वविद्यालय की विद्वत परिषद (एसी) की बैठक में इस प्रस्ताव पर पुनर्विचार का फैसला किया गया।

परिषद के एक सदस्य ने बताया कि प्रस्तावित पाठ्यक्रम के मसविदे को एसी में पिछले साल खारिज कर दिया गया था। लेकिन हाल में हुई बैठक में यह मामला फिर उठा। कुछ शिक्षक इसका विरोध कर रहे हैं और कुछ इसके पक्ष में हैं। परिषद की बैठक में इस पर पुनर्विचार का फैसला किया गया। सदस्य ने बताया कि कुलपति जगदीश कुमार ने विभागों को प्रस्तावित पाठ्यक्रम के ढांचे पर फिर से काम करने और इसे एसी के समक्ष फिर रखने का फैसला किया है।

भारत की समृद्ध धरोहर को आगे बढ़ाने और इसकी सांस्कृतिक पहचान बहाल करने के लिए शैक्षिक परिसरों में संस्कृति के प्रचार-प्रसार पर भाजपा के वैचारिक संरक्षक आरएसएस सहित दक्षिणपंथी संगठनों के जोर दिए जाने की पृष्ठभूमि में, पिछले साल इन विषयों में तीन अल्पकालिक पाठ्यक्रम शामिल करने का प्रस्ताव आया था। मानव संसाधन विकास मंत्रालय और विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) के साथ कई संवाद के बाद विश्वविद्यालय ने पिछले साल तीनों पाठ्यक्रमों का मसौदा विभिन्न स्कूलों और जेएनयू के विभागों की प्रतिक्रिया के लिए उन्हें भेजा गया। बाद में एसी ने नवंबर में इस प्रस्ताव को खारिज कर दिया।

पहले तैयार किए गए मसविदे के मुताबिक भारतीय संस्कृति पर पाठ्यक्रम का उद्देश्य देश की संस्कृति के महत्व का प्रचार करना। इसके व्युत्पत्ति विषयक, सामाजिक, आध्यात्मिक, सांस्कृतिक और पौराणिक पहलुओं का अन्वेषण करना और विश्व में भारतीय मूल्यों की स्थापना करना था। मसविदे में कहा गया था कि पाठ्यक्रम में विभिन्न संस्कृतियों के पाठ, विचार और परंपराओं का जिक्र होगा। इसमें अन्य के साथ-साथ भारतीय संस्कृति में धर्म व्यवस्थाएं आदि भी शामिल होंगे। इसके अलावा, इसमें वेदों,पुराणों और जातकों के हिस्सों को रखा जाएगा।

हिंदू पौराणिक ग्रंथों जैसे रामायण आदि पर टिप्पणियां भी होंगी। इस मसविदे में कहा गया था कि भारतीय साहित्य की मदद के बिना भारतीय संस्कृति को समझा नहीं जा सकता। इसमें यह भी कहा गया था कि गीता प्रेस गोरखपुर की भगवद गीता, रामायण, आचार्य जयदेव की वैदिक संस्कृति, तुलसी राम के वेद और रामधारी सिंह दिनकर की संस्कृति के चार अध्याय सहित अन्य रचनाओं का अध्ययन भी इसमें शामिल होगा।

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