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जेएनयू की जंग में भगत सिंह का दीवाना प्रो. चमन लाल

जेएनयू मामले में सरकारी रवैए पर अपना विरोध जताने के लिए चमन लाल ने राजग सरकार के दौरान 2003 में मानव संसाधन विकास मंत्रालय का गैर हिंदी लेखन में दिया पुरस्कार लौटाने का एलान किया है।

Author नई दिल्ली | February 27, 2016 12:49 AM
जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के भूतपूर्व प्रोफेसर चमन लाल।

चमन लाल को देश में जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के पूर्व शोधार्थी या प्रोफेसर से ज्यादा शहीदे आजम भगत सिंह पर उनके काम के लिए जाना जाता है। देश के लिए जान कुर्बान करने वाले भगत सिंह से जुड़े तथ्य जुटाने के लिए उन्होंने शहीद के खटकड़कलां के पैतृक निवास से लेकर विदेश में बसी उनकी बहन तक पहुंचने में गुरेज नहीं की। लेकिन आज चमन लाल आहत हैं। जिस संस्थान ने उन्हें एक बौद्धिक पहचान दी, देश-दुनिया के हित में सोचना और लड़ना सिखाया आज वही अपनी ‘राष्ट्रभक्ति’ को लेकर विवाद में है।

जेएनयू मामले में सरकारी रवैए पर अपना विरोध जताने के लिए चमन लाल ने राजग सरकार के दौरान 2003 में मानव संसाधन विकास मंत्रालय का गैर हिंदी लेखन में दिया पुरस्कार लौटाने का एलान किया है। उन्होंने कहा कि वे प्रशस्तिपत्र और पुरस्कार के साथ मिली 50 हजार रुपए की राशि भी लौटा देंगे। वे पिछले दो दिन से जेएनयू में ही डेरा जमाए हुए हैं। परेशानहाल चमन लाल ने मानव संसाधन मंत्री स्मृति ईरानी को एक पत्र भी लिखा है। चमन लाल प्रतिबद्ध हैं कि वे जेएनयू में जनतंत्र का किला तोड़ने के खिलाफ खिलाफ बौद्धिक स्तर पर अपनी लड़ाई लड़ेंगे।

चमनलाल ने जनसत्ता से बातचीत में कहा कि देश में सामाजिक और राजनीतिक हालात बदतर होते जा रहे हैं। एमम कलबुर्गी की हत्या और गोमांस पर उठे विवाद के बाद हम साहित्यकारों ने इस उम्मीद में पुरस्कार लौटाए कि शायद इससे हालात सुधरने में कुछ मदद मिले। लेकिन यह दुखद रहा कि पुरस्कार लौटाने वालों को कांग्रेस का एजंट, वामपंथियों का पिट्ठू कह कर हालात के खिलाफ उठने वाली हर आवाज को देशद्रोही करार दे दिया गया। आरोप लगाया कि हमने पिछली सरकारों से पुरस्कार लिए और वर्तमान सरकार के प्रति असहिष्णु हो गए। लेकिन मुझे यह पुरस्कार राजग सरकार में मिला था और मैं उसी की सत्ता में इसे वापस कर रहा हूं।

हालात से निराश चमन लाल ने कहा कि महात्मा गांधी ने 1947 में पाकिस्तान का बकाया 55 करोड़ रुपए दिलाने के लिए अनशन किया था। आज के हालात में महात्मा गांधी सबसे बड़े देशद्रोही होते जब सड़कों पर जेएनयू छात्रों को लेकर नारे गूंज रहे हैं कि देश के गद्दारों को गोली मारो। उन्होंने कहा कि अक्तूबर 2015 में जेएनयू के साथ अन्य विश्वविद्यालयों ने ‘आक्युपाई यूजीसी’ मुहिम शुरू की थी। इसी के साथ हैदराबाद केंद्रीय विश्वविद्यालय के छात्रों ने दलित छात्रों के साथ भेदभाव के खिलाफ आंदोलन खड़ा किया। प्रशासन इस आंदोलन से इतनी बेरहमी से निपटा कि छात्र रोहित वेमुला ने अपनी जान दे दी। रोहित वेमुला के समर्थन में पूरे देश में एक आंदोलन खड़ा हो गया और सरकार ने इसे भी बुरी तरह कुचलना चाहा। इसके पहले एफटीआइआइ के विद्यार्थियों के साथ भी सरकार बेरहमी से निपटी।

इसी दौरान नौ फरवरी को जेएनयू में हुए कार्यक्रम में कुछ विवादित गतिविधियां हुर्इं और पुलिस ने छात्र संगठन के अध्यक्ष कन्हैया कुमार को गिरफ्तार कर लिया। इस संवेदनशील समय में मानव संसाधन मंत्रालय और दिल्ली पुलिस कमिश्नर की तरफ से गैरजिम्मेदाराना बयान दिए गए जिसका असर हुआ कि कोर्ट में पेशी के दौरान न सिर्फ कन्हैया कुमार बल्कि पत्रकारों और छात्रों पर भी काले कोट पहने हुए गुंडों ने हमला किया। सबसे खतरनाक बात तो यह थी कि सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों का सरासर उल्लंघन किया गया। ऐसा तो अंग्रेजों के समय में भी नहीं हुआ था। भगत सिंह को कोर्ट के अंदर ब्रितानी पुलिस ने पीटा था, लेकिन औपनिवेशिक काल के विद्रोही पर उस समय भी गैरकानूनी रूप से गुंडे हमला नहीं कर पाए थे।

जेएनयू के पूर्व छात्र ने रोष जताते हुए कहा कि संस्थान के इतिहास में इससे पहले ऐसा पुलिसिया दखल नहीं हुआ था। यहां तक कि आपातकाल के दौरान भी इसकी गरिमा बची हुई थी। और आज राष्ट्रवाद के नाम पर सेना के लोग यहां पहुंच रहे हैं। भाजपा सांसद साध्वी प्राची जिनका इस परिसर से कोई लेना-देना नहीं विश्वविद्यालय प्रशासन के सहयोग से पहुंचती हैं और जेएनयू समुदाय को धमकाती हैं। चमन लाल ने मानव संसाधन मंत्रालय पर आरोप लगाया कि रोहित वेमुला मामले में सरकार को मुंह की खानी पड़ी थी।

‘आक्युपाई यूजीसी’ और रोहित वेमुला आंदोलन के कारण जेएनयू सरकार के निशाने पर था, क्योंकि तत्कालीन वीसी प्रोफेसर एसके सोपोरी विवि में पुलिसिया दखल के खिलाफ थे। मंत्रालय जेएनयू से बदला लेने के लिए बेकरार था और इसके लिए उसने ‘अपना वीसी’ चुना। नए वीसी ने पदभार संभालने के दो हफ्ते बाद ही पुलिस के लिए जेएनयू के दरवाजे खोल दिए। लेकिन ऐसे ही मामले में जादवपुर विवि के वीसी अपने सिद्धांत पर अड़े रहे।

उन्होंने न तो किसी छात्र के खिलाफ पुलिस शिकायत दी और न ही पुलिस को परिसर में आने दिया और विश्वविद्यालय प्रशासन के स्तर पर मामला सुलझाया। इतना ही नहीं परिसर में असामाजिक तत्त्वों के घुसने से रोकने के लिए छात्रों ने जो मानव कड़ी बनाई थी उसमें एक हाथ जादवपुर विवि के वीसी का भी था। लेकिन जेएनयू में जिस तरह सरकारी दखल से जनतंत्र का किला ढहाया गया उसके खिलाफ मैं मानव संसाधन मंत्रालय का दिया पुरस्कार लौटाता हूं। और मैं जानता हूं कि इसके बाद मुझ पर कैसे हमले हो सकते हैं जो मैं पहले भी झेल चुका हूं।
चमन लाल ने लौटाया मानव संसाधन मंत्रालय का पुरस्कार:

वीसी ने खोले पुलिस के लिए दरवाजे
‘आक्युपाई यूजीसी’ और रोहित वेमुला आंदोलन के कारण जेएनयू सरकार के निशाने पर था, क्योंकि तत्कालीन वीसी प्रोफेसर एसके सोपोरी विवि में पुलिसिया दखल के खिलाफ थे। मंत्रालय जेएनयू से बदला लेने के लिए बेकरार था और इसके लिए उसने ‘अपना वीसी’ चुना। नए वीसी ने पदभार संभालने के दो हफ्ते बाद ही पुलिस के लिए जेएनयू के दरवाजे खोल दिए।
– प्रोफेसर चमन लाल, जेएनयू शिक्षक संघ के पूर्व अध्यक्ष

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