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पद्मा सचदेव को सरस्वती सम्मान

सरस्वती सम्मान वर्ष 2015 के लिए डोगरी की साहित्यकार पद्मा सचदेव की आत्मकथा चित्त-चेत को चुना गया है।

Author नई दिल्ली | April 12, 2016 11:54 PM
डोगरी की साहित्यकार पद्मा सचदेव

प्रतिष्ठित सरस्वती सम्मान वर्ष 2015 के लिए डोगरी की साहित्यकार पद्मा सचदेव की आत्मकथा चित्त-चेत को चुना गया है। 2005 से 2014 की अवधि में प्रकाशित पुस्तकों पर विचार करने के बाद चयन परिषद ने यह एलान किया। केके बिड़ला फाउंडेशन ने 1991 में इस पुरस्कार की शुरुआत की थी। इस सम्मान के तहत 15 लाख रुपए की पुरस्कार राशि के साथ प्रशस्ति और प्रतीक चिह्न भेंट किया जाता है।

फाउंडेशन के अनुसार पुरस्कार की चयन प्रक्रिया के तहत पिछले दस साल में 22 भारतीय भाषाओं में प्रकाशित पुस्तकों पर प्रत्येक भाषा समिति ने गंभीर विचार विनिमय के बाद प्रत्येक भाषा से एक-एक पुस्तक की संस्तुति की। इन सभी 22 पुस्तकों पर पांच क्षेत्रीय समितियों ने विचार विमर्श करने के बाद चयन परिषद को सरस्वती सम्मान के लिए जिन पांच पुस्तकों के नाम की सिफारिश की उनमें चित्त-चेते (पद्मा सचदेव, डोगरी), मृनमय नाद्म (ललित कुमारी पोपुरी, तेलुगु), ईशानी मेघ ओ अनन्य गल्पो (अभिजीत सेन, बांग्ला), स्वप्न संहिता (यशवंत मनोहर, मराठी) और कहानी दो बांग में खान (बादल हेमब्रम, संथाली) शामिल थीं।

इन सभी पुस्तकों पर गहन विचार विमर्श के बाद भारत के पूर्व प्रधान न्यायाधीश न्यायमूर्ति आदर्श सेन आनंद के नेतृत्व वाली 13 सदस्यीय चयन परिषद ने पद्मा सचदेव की डोगरी आत्मकथा चित्त चेते को 2015 के 25वें सरस्वती सम्मान के लिए चुना है। यह कृति 2007 में प्रकाशित हुई थी।

जम्मू के पुरमंडल गांव में 17 अप्रैल 1940 को जन्मी पद्मा सचदेव को साहित्यिक और सांस्कृतिक संस्कार विरासत में मिले। इनका परिवार और पिता संस्कृत के अच्छे जानकारों में थे। बचपन के दिनों से ही पद्मा सचदेव ने अपनी मातृभाषा डोगरी में कविताएं रचनी शुरू कर दी थीं। सरस्वती सम्मान से सम्मानित उनकी कृति चित्त-चेते डोगरी भाषा में लिखी उनकी आत्मकथात्मक रचना है। 662 पृष्ठों में समाई यह कृति कई प्रादेशिक, राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय घटनाओं को भी समेटे हुए हैं। जिसके कारण इस पुस्तक का फलक अत्यंत विस्तृत हो गया है।

पद्मा सचदेव की इस आत्मकथात्मक रचना की शुरुआत उनके गृह प्रदेश जम्मू कश्मीर में बिताए उनके बचपन से शुरू होकर दिल्ली और मुंबई जैसे महानगरों की आपाधापी में अपनी संस्कृति और अस्मिता को बचाने के संघर्ष की कहानी बन जाती है।

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