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मंदिर में देवी मां के सामने पढ़ा मंत्र, कटार से गला काटकर दे दी खुद की बलि

राजरप्पा मंदिर के पांडा (Priest) समिति के जनरल सेक्रेटरी सुभाशीष पांडा ने टीओआई को बताया कि संजय अन्य भक्तों के साथ मंदिर के गर्भगृ़ह में गए और अपनी आंखों को बंद करके मंत्र पढ़ने लगे।

जगदीश 20 अप्रैल की रात एक मेहंदी कार्यक्रम में हिस्सा लेने के लिए घर से निकले थे और वापस नहीं आए। (प्रतीकात्मक तस्वीर)

झारखंड के रामगढ़ जिले में मंगलवार को एक हैरान करने वाला मामला सामने आया है। राजरप्पा स्थित छिन्नमस्तिका देवी के मंदिर में पहुंचे एक शख्स ने अपना गला काटकर बलि दे दी। मृतक की पहचान बिहार के बक्सर जिले में रहने वाले संजय नट के रूप में हुई है। प्रत्यक्षदर्शियों के मुताबिक सुबह 6 बजे मंदिर के दरवाजे खुलने के बाद संजय नट समेत अन्य श्रद्धालुओं के साथ दर्शन करने गए। इस दौरान मंदिर के पुजारी भी वहां मौजूद थे।

राजरप्पा मंदिर के पांडा (Priest) समिति के जनरल सेक्रेटरी सुभाशीष पांडा ने टीओआई को बताया कि संजय अन्य भक्तों के साथ मंदिर के गर्भगृह में गए और अपनी आंखों को बंद करके मंत्र पढ़ने लगे। उसके बाद उन्होंने अपने गम्छे में छिपाकर रखे गए कटारी को निकाला और अपना गला रेत लिया। कुछ श्रद्धालुओं ने इस घटना को देखने के बाद इस बात की जानकारी पुजारियों को दी। उन्होंने बताया कि जब वह पहुंचे तो वह शख्स खून से लथ-पथ जमीन में मृत पड़ा था। इसके बाद मंदिर प्रशासन की ओर से जानकारी पुलिस को दी गई।

घटना स्थल पर पहुंची पुलिस ने बताया कि तालाशी के दौरान मृतक के जेब से एक कागज मिला। जिस पर उसका नाम, पता और उसके परिवारवालों का नंबर दिया गया था पुलिस के मुताबिक मृतक के पिता सीआरपीएफ के कॉन्सटेबल है और बक्सर में तैनात है। मृतक के परिवारवालों को इस बात की जानकारी दे दी गई है और वह पहुंच रहे हैं। इस घटना से मंदिर में दहशत का माहौल पैदा हो गया। मंदिर प्रशासन ने तीन घंटे के लिए दर्शन बंद कर दिेए, बाद में इसे फिर से प्रारंभ किया गया।

झारखंड स्थित मां छिन्नमस्तिका मंदिर काफी विख्यात है। देवी की प्रतिमा में उनके एक हाथ में तलवार और दूसरे में उनका ही कटा हुआ सिर है। रांची से लगभग 70 किलोमीटर की दूरी पर मां छिन्नमस्तिका का यह मंदिर रजरप्पा के भैरवी-भेड़ा और दामोदर नदी के संगम पर स्थित है। नवरात्रि के दौरान मंदिर परिसर में श्रद्धालुओं की सबसे ज्यादा भीड़ उमड़ती है। इस मंदिर में बकरे की बलि की काफी पुरानी परंपरा रही है।

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