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झारखंड: जन्‍म लेने के बाद बच्‍चे को दरवाजे से नहीं, दीवार में छेद कर निकाला जाता है बाहर

सरकारी अस्पतालों में प्रसव कराने की सुविधा होने के बाद भी इस समुदाय की महिलाएं हॉस्पिटल का रुख नहीं करती हैं। बार-बार कहने के बाद भी महिलाएं प्रसव के लिए हॉस्पिटल नहीं पहुंचती।

तस्वीर का इस्तेमाल केवल प्रतीकात्मक रूप से किया गया है। (फोटो सोर्स- वीडियो स्क्रीन शॉट youtube.com/watch?v=RlKbjAFwH98)

झारखंड के गिरिडीह जिले में एक समुदाय में बहुत पुरानी परंपराएं मानने का अजीब मामला सामने आया है। जिले में लगभग विलुप्त हो चुका समुदाय अभी भी अपनी पुरानी परंपराओं के मुताबिक जिंदगी गुजारने पर आमदा है। दैनिक जागरण की रिपोर्ट के मुताबिक बिरहोर टंडा जनजाति में आज भी कोई शिशु जन्म लेता है तो उसे घर से बाहर मुख्य दरवाजे से नहीं निकाला जाता है, बल्कि घर के किसी कोने में छेद कर शिशु को बाहर निकाला जाता है। जिले के सरिया में रह रहा यह समुदाय अब विलुप्त होने की कगार पर जा पहुंचा। इनकी संख्या भी घटकर ढाई दर्जन तक पहुंच गई है।

जानकारी के मुताबिक सरकारी अस्पतालों में प्रसव कराने की सुविधा होने के बाद भी इस समुदाय की महिलाएं हॉस्पिटल का रुख नहीं करती हैं। बार-बार कहने के बाद भी महिलाएं प्रसव के लिए हॉस्पिटल नहीं पहुंचती। आंकड़ों के मुताबिक पिछले दस सालों में प्रसव हॉस्पिटल होने के बाद भी एक भी बिरहोर महिला का प्रसव हॉस्पिटल में नहीं कराया जा सका है।

मामले में सदर हॉस्पिटल के उपाधीक्षक डॉक्टर बीएन झा ने बताया कि परंपरा के नाम इस समुदाय के लोग महिलाओं को हॉस्पिटल लाने में कतराते हैं। इससे कई बार बच्चा और जच्चा दोनों की जान पर बन आती है। बीएन झा ने बताया, ‘विलुप्त हो रही जनजाती में आज भी शिशु के जन्म के समय अजीब तरह की परंपरा निभाई जाती है। इस समुदाय में महिलाओं का घरों में प्रसव कराया जाता है। इसके बाद शिशु को घर के दरवाजे से निकालने के बजाए दीवार का एक कोना तोड़कर उसे बाहर निकाला जाता है।’

इसके अलावा परंपरा के अनुसार शिशु को नहलाने के बाद उसे जंगल में ले जाकर भूत की पूजा कराई जाती है। पूजा के बाद भोजन भी वहीं बनाया जाता है। जो खाना बच जाता है उसे वहीं जमीन में दबा दिया जाता है।

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