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आरसीपी सिंह पर 1996 में पड़ी नीतीश कुमार की नजर, एक जगह और जाति के निकले, पहले सरकार और फिर जदयू में बढ़ता गया कद

नीतीश कुमार जब रेलमंत्री बने थे, तब सिंह उनके विशेष सचिव बने, नवंबर 2005 में जब नीतीश कुमार सीएम बने, तो आरसीपी सिंह उन्हीं के साथ बिहार पहुंच गए।

Author Edited By कीर्तिवर्धन मिश्र पटना | Updated: October 31, 2020 12:54 PM
Bihar Election 2020, RCP Singhजदयू से दो बार राज्यसभा सांसद आरसीपी सिंह।

बिहार चुनाव के दौरान ही मुंगेर घटना पर चौतरफा घिरी एनडीए की परेशानी कम होने का नाम नहीं ले रही। भाजपा के साथ इस गठबंधन की मुख्य पार्टी जदयू भी अब तक मामले में चुप ही रही है। माना जा रहा है कि इसकी एक वजह सीएम नीतीश कुमार के करीबी साथी राम चंद्र प्रसाद सिंह हैं। मुंगेर घटना के बाद बड़ी संख्या में विपक्षी नेताओं ने राज्यसभा सांसद आरसीपी सिंह के विरोध में प्रदर्शन किया। बताया जाता है कि इसकी वजह उनकी बेटी लिपी सिंह हैं, जो कि घटना के वक्त मुंगेर की एसपी थीं। चुनाव आयोग ने लिपी सिंह को तो हटा दिया, पर हाल ही में आरसीपी सिंह को बेगूसराय दौरे पर गुस्साए लोगों के विरोध का सामना करना पड़ा था।

आरसीपी सिंह के जदयू में कद का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि मुंगेर घटना पर भारी विरोध के बावजूद न तो सीएम नीतीश कुमार और न ही भाजपा इस मुद्दे पर कोई भी बयान दे पाई है। आरसीपी सिंह की पार्टी में यह पहुंच सिर्फ हालिया सालों की मेहनत की बदौलत नहीं, बल्कि 20 सालों से ज्यादा समय तक नीतीश कुमार के साथ काम करने के बाद बनी है।

उत्तर प्रदेश कैडर के आईएएस अफसर रहे आरसीपी सिंह पहली बार नीतीश कुमार के संपर्क में तब आए थे, जब उन्हें 1996 में तत्कालीन केंद्रीय मंत्री बेनी प्रसाद वर्मा के निजी सेक्रेटरी के तौर पर पोस्टिंग मिली थी। बताया जाता है कि नीतीश कुमार और आरसीपी सिंह के बीच दोस्ती दोनों के नालंदा से होने और जाति में कुर्मी होने की वजह से ज्यादा बेहतर हुई। इसके अलावा नीतीश आरसीपी सिंह के नौकरशाह की भूमिका से भी काफी प्रभावित हुए थे।

इसके बाद से ही नीतीश कुमार ने आरसीपी सिंह को साथ लिया। जब नीतीश रेलमंत्री बने, तब सिंह उनके विशेष सचिव बने। बाद में सिंह कई अन्य पोर्टफोलियो में नीतीश के साथ बने रहे। नवंबर 2005 में जब नीतीश कुमार बिहार के सीएम बने, तो आरसीपी सिंह उन्हीं के साथ बिहार पहुंच गए। उन्हें मुख्य तौर पर पोस्टिंग में भूमिका निभाने के मकसद से साथ लाया गया था और नीतीश कुमार के प्रमुख सचिव के तौर पर जल्द ही आरसीपी सिंह की पहचान नीतीश की आवाज के तौर पर ही होने लगी। इसके बाद जल्द ही आरसीपी सिंह की जदयू में भी पैठ बढ़ने लगी।

2010 में सिंह ने स्वैच्छिक रिटायरमेंट ले लिया था और उन्हें राज्यसभा के लिए नामित कर दिया गया। 2016 में पार्टी ने उन्हें फिर राज्यसभा भेजा। सूत्रों का कहना है कि नीतीश कुमार ने जब मोदी कैबिनेट में पार्टी नेता न शामिल करने का फैसला किया था, तो इसके पीछे भी आरसीपी सिंह एक वजह थे। दरअसल, भाजपा ने जदयू को एक कैबिनेट पद का प्रस्ताव दिया था, पर नीतीश कुमार अपने दो साथियों- आरसीपी सिंह और राजीव रंजन उर्फ ललन सिंह के लिए कैबिनेट मंत्री के पद चाहते थे।

माना जाता है कि नीतीश कुमार काफी भाग्यशाली रहे हैं कि उनके दोनों साथी- आरसीपी सिंह और ललन सिंह साथ ही काम करते रहे हैं। हालांकि, एक मौका ऐसा भी आ चुका है, जब आरसीपी सिंह को पार्टी में अपनी पकड़ छूटती महसूस हुई। यह वह समय था, जब प्रशांत किशोर जदयू में ऊंचाई पर पहुंच चुके थे। बताया जाता है कि सिंह को चुनावी योजनाएं बनाने वाले प्रशांत किशोर का पार्टी नेताओं से अलग-अलग मिलना बिल्कुल पसंद नहीं था, क्योंकि इससे पावर का दूसरा केंद्र बनना शुरू हो गया था। हालांकि, नीतीश की समझबूझ से आखिरकार आरसीपी सिंह पार्टी का हिस्सा बने रहे, जबकि प्रशांत किशोर ने उनका साथ छोड़ दिया।

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