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जनसत्ता विशेष: खेती घटी, पौड़ी से पलायन

देश और प्रदेश को विभिन्न क्षेत्रों में सबसे ज्यादा शख्सियत देने वाला उत्तराखंड के गढ़वाल मंडल का मुख्यालय पौड़ी आज विकास के लिए तरस रहा है। पौड़ी जिले की लगभग 29.36 फीसद आबादी गरीबी रेखा से नीचे जी रही है, जो राज्य में सबसे अधिक है। जबकि टिहरी गढ़वाल जिले का न्यूनतम 10.15 फीसद है।

तस्वीर का इस्तेमाल प्रतीकात्मक तौर पर (Source: Express Archives/Pertima Rawat)

देश और प्रदेश को विभिन्न क्षेत्रों में सबसे ज्यादा शख्सियत देने वाला उत्तराखंड के गढ़वाल मंडल का मुख्यालय पौड़ी आज विकास के लिए तरस रहा है। पौड़ी जिले की लगभग 29.36 फीसद आबादी गरीबी रेखा से नीचे जी रही है, जो राज्य में सबसे अधिक है। जबकि टिहरी गढ़वाल जिले का न्यूनतम 10.15 फीसद है। उत्तराखंड पलायन आयोग के आंकड़ों के मुताबिक पौड़ी में बागवानी फसलों के तहत उपयोग में लाए जाने वाले क्षेत्रफल 2015-16 की तुलना में 2016-17 में काफी कम पाया गया। इससे जिले में फलों की पैदावार काफी घटी है। आंकड़े दर्शाते हैं कि पौड़ी जिले के ग्रामीण क्षेत्रों में चिंताजनक पलायन हुआ है। 2017-18 में 12 ग्राम पंचायतों में से 1025 ग्राम पंचायतों से पलायन हुआ है। 52 फीसद पलायन मुख्य रूप से आजीविकापरक रोजगार की कमी के कारण हुआ है। जिले में पलायन करने वालों की उम्र मुख्यत: 26 से 35 साल है। 34 फीसद लोगों ने राज्य से बाहर पलायन किया है जो की अल्मोड़ा जिले के बाद सबसे ज्यादा है।

आयोग की ओर से किए गए सर्वेक्षण के मुताबिक 2011 के बाद जिले में 186 गांव गैरआबाद हुए हैं जो कि 2011 के बाद गैरआबाद गांवों का 25 फीसद है। दूसरी ओर, पौड़ी जिले में 112 गांव ऐसे हैं जिनकी जनसंख्या 2011 के बाद 50 फीसद से अधिक कम हुई है। पूरे राज्य में 565 गांव पूरी तरह खाली हुए हैं। 2001 से 2011 के बीच पौड़ी जिले के खिर्सू, दुगड्डा और थलीसैंण विकासखडोंं की आबादी में बढ़ोतरी हुई है जबकि अन्य 12 विकास खंडों की आबादी घटी है।

साल 2012-13 में पौड़ी जिले की 20 हजार हेक्टेयर से अधिक भूमि पर फलों का उत्पादन होता था जो 2016-17 में घटकर चार हजार हेक्टेयर रह गया है। दस सालों में सेब का उत्पादन क्षेत्र 1100 हेक्टेयर से घटकर 212 हेक्टेयर रह गया है। इसी तरह धान का 2013-14 में बोया गया क्षेत्रफल 13,923 हेक्टेयर था, जो 2015-16 में घटकर 12,517 हेक्टेयर रह गया है। गेहूं बोने का क्षेत्रफल 2013-14 में 22,431 हेक्टेयर से 2015-16 में घटकर 16,779 हेक्टेयर रह गया है। मंडुआ की फसल उत्तराखंड में सबसे ज्यादा लोकप्रिय है। परंतु पौड़ी जिले में मंडुआ की खेती में गिरावट आई है। मंडुआ 2013-14 में 19,798 हेक्टेयर भूमि पर बोया जाता था, जो 2015-16 में घटकर 19,421 हेक्टेयर रह गया है। दालों की फसल 2013-14 में 13,923 हेक्टेयर में बोई जाती थी, जो 2015-16 में घटकर 12,517 हेक्टेयर रह गई है।

पौड़ी जिले में केवल नौ नर्सरी हैं, जबकि विकासखंड कलजीखाल, पाबों, थलीसैंण, बीरोंखाल, लारीखाल, पोखड़ा और यमकेश्वर में कोई फल की नर्सरी नहीं है। विकासखंड थलीसैंण और खिर्सू में किसान सब्जियों की पैदावार बढ़ाने की कोशिश कर रहे हैं। परंतु बड़ी मंडियों तक माल कम होने की वजह से नहीं पहुंच पा रहा है, जिससे किसानों को पहाड़ों के स्थानीय बाजारों में ही औने-पौने दाम पर अपनी उपज को बेचना पड़ रहा है। इन दोनों विकासखंडों में यह देखने में आया है कि यहां के मूल निवासी कृषक अपनी कृषि भूमियों को नेपाली मूल के किसानों को किराए पर दे रहे हैं। पौड़ी जिले में गायों की संख्या 2003 में 3,61,563 से घटकर 2015-16 में 3,00,081 रह गई है जबकि भैंसों की संख्या 2003 में 70,115 से घटकर 2015-16 में 40,533 रह गई है।

वहीं, बकरियों की संख्या 2003 में 1,15,547 से बढ़कर 2015-16 में 1,78,404 हुई और मुर्गी पालन में 70,125 से बढ़कर 2015-16 में 83,556 हो गई है। इस तरह पौड़ी जिले में गाय और भैंस के दूध उत्पादन में लगातार गिरावट आ रही है। 2011 की जनगणना के अनुसार पौड़ी जिले की कुल आबादी 6 लाख 86 हजार 527 है। जिसका 83.59 फीसद ग्रामीण क्षेत्रों में तथा 16.41 फीसद शहरी क्षेत्रों में निवास करता है। पिछली चार जनगणना के अनुसार इस जिले की आबादी में लगातार गिरावट आ रही है। 2011 की जनगणना में भी 1.51 फीसद की गिरावट आई है। देखने में आया है कि नगर क्षेत्रों की आबादी बीते एक दशक में 25.40 फीसद बढ़ी है, जबकि ग्रामीण आबादी में 5.37 फीसद की कमी हुई है।

इस तरह इस जनपद के गांव खाली हो रहे हैं। 15 विकास खंडों में से 12 विकास खंडों के तहत पिछले एक दशक में आबादी घटी है। उत्तराखंड में देहरादून, उधमसिंहनगर, हरिद्वार, नैनीताल जिलों के बाद पौड़ी जिला आबादी के हिसाब से पांचवें स्थान पर आता है। यह जिला राज्य में जीडीपी में केवल 4.23 फीसद का योगदान करता है। पौड़ी के ग्रामीण क्षेत्रों में मासिक प्रति व्यक्तिउपभोक्ता व्यय (एमपीसीई) 1,294.87 रुपए है जबकि नगरीय क्षेत्र में 2,145.62 रुपए है जो राज्य और राष्ट्रीय औसत से कम है।

उत्तराखंड ग्रामीण विकास एवं पलायन आयोग के उपाध्यक्ष डॉक्टर शरद सिंह नेगी ने मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत को पौड़ी जिले की रिपोर्ट सौंपते हुए इस जिले के सभी 15 विकास खंडों में पलायन के कारण, उनके प्रभाव और नियंत्रण के उपाय बताते हुए कहा कि पिछली चार जनगणना के आंकड़ों के मुताबिक इस जिले की आबादी में लगातार गिरावट आ रही है। आयोग ने गांव की अर्थव्यवस्था पर विकास में बढ़ोतरी के लिए कृषि और गैरकृषि आय में बढ़ावा देने तथा गांव केंद्रित योजनाएं बनाने, मूलभूत सुविधाएं मुहैया कराने, कौशल विकास की योजनाएं चलाने, ग्रोथ सेंटरों की स्थापना करने, पशुपालन और सूक्ष्म और लघु उद्योगों को बढ़ावा देने, नए पर्यटन क्षेत्रों का विकास और पुराने पर्यटन क्षेत्रों का प्रचार-प्रसार करने के सुझाव दिए हैं।

पौड़ी जिले ने देश को दिग्गज नेता, विचारक हेमवती नंदन बहुगुणा, राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल, थल सेनाध्यक्ष जनरल बिपिन रावत, खुफिया संस्था रॉ के प्रमुख अनिल धस्माना, हिमालयन अस्पताल जौलीग्रांट के संस्थापक स्वामी राम, पूर्व केंद्रीय मंत्री और पूर्व मुख्यमंत्री भुवन चंद्र खंडूडी, पूर्व मुख्यमंत्री डॉ रमेश पोखरियाल निशंक, पूर्व मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा, उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ, उत्तराखंड के मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत, जाने माने अंतरराष्ट्रीय पर्यावरणविद् डॉ. आरसी शर्मा, जाने माने फाइन आर्ट कलाकार डॉ. सुनीत घिल्डियाल, अंतरराष्ट्रीय पक्षी विज्ञानी डॉ. दिनेश चंद्र भट्ट जैसी महान हस्तियां दी हैं। बीते चार साल में पौड़ी जिले का रौबदाब तो बढ़ा है परंतु रौनक घटी है।

उत्तराखंड के राजनीतिक विश्लेषक डॉ अवनीत कुमार घिल्डियाल का कहना है कि उत्तराखंड ग्रामीण विकास एवं पलायन आयोग की रिपोर्ट सरकार की पहाड़ के प्रति उदासीनता की पोल खोलती है। पहाड़ के विकास की योजनाएं कागजों में ही लागू हो रही हैं। पौड़ी जिले के मंडल मुख्यालय में रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य, कृषि, पशुपालन के क्षेत्र में बड़े स्तर पर कमी आई है। जब मंडल मुख्यालय पौड़ी का यह हाल है, तो राज्य के अन्य जिलों की हालत का अंदाजा आसानी से लगाया जा सकता है।

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