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फुनई ने कहा अलविदा तो याद आई पुरानी बात, फोन आया कि वीसीआर चोरी हो गया

दिल्ली विश्वविद्यालय के आइपी कॉलेज से अर्थशास्त्र की सेवानिवृत्त एसोसिएट प्रोफेसर व्रतति पांडे बताती हैं कि नब्बे के दशक में हमारा सपना था कि घर में वीसीआर हो।

Author नई दिल्ली | July 24, 2016 3:32 AM
आज के दिनों में रोजाना केपटाउन में स्काइप के जरिए अपनी नातिन मिष्ठी से बात करने वालीं व्रतति पांडे कहती हैं कि हमने बीसवीं सदी में छोटा ब्लैक एंड वाइट टीवी से लेकर आज टच स्क्रीन लैपटॉप तक भी खरीदा है।

क्या आपके पास वीसीआर है? खान मार्केट में मेहरा इलेक्ट्रिकल्स के मैनेजर संजीव कुमार झा से जब यह सवाल पूछा तो उन्होंने कहा कि यह तो बीती बात है, अब हम वीसीआर कहां रखते हैं। पिछली यादों में जाते हुए वे बताते हैं कि 1995 के पहले तो यह अति लोकप्रिय था। संजीव की तरह बहुत से लोग वीसीआर को पहले ही अंतिम श्रद्धांजलि दे चुके थे। लेकिन जापान की कंपनी फुनई ने कहा है कि इस महीने वह आखिरी वीसीआर का निर्माण करेगी। फुनई ने 1983 में वीडियो कैसेट रिकॉर्डर (वीसीआर) बनाना शुरू किया था। नब्बे के दशक तक कंपनी साल में डेढ़ करोड़ वीसीआर बेचती थी। पिछले साल तक कंपनी ने साढ़े सात लाख वीसीआर बेचे थे। यानी बड़े औद्योगिक स्तर पर वीसीआर इस महीने से अलविदा कहेगा।

दिल्ली विश्वविद्यालय के आइपी कॉलेज से अर्थशास्त्र की सेवानिवृत्त एसोसिएट प्रोफेसर व्रतति पांडे बताती हैं कि नब्बे के दशक में हमारा सपना था कि घर में वीसीआर हो। तब हमारी आय इतनी नहीं थी कि जो चाहा वो बाजार से ले आए। हमने हर महीने बचत से पैसे जोड़े और वीसीआर लाए और साथ में ‘गाइड’ का कैसेट भी लाए। लेकिन हम वीसीआर का सुख तीन महीने ही ले पाए। इंदौर में रिश्तेदार की शादी में गए और दिल्ली से फोन आया कि घर में चोरी हो गई और चोर वीसीआर ले गए। आज के दिनों में रोजाना केपटाउन में स्काइप के जरिए अपनी नातिन मिष्ठी से बात करने वालीं व्रतति पांडे कहती हैं कि हमने बीसवीं सदी में छोटा ब्लैक एंड वाइट टीवी से लेकर आज टच स्क्रीन लैपटॉप तक भी खरीदा है। लेकिन वो वीसीआर में पति के साथ पसंदीदा फिल्म ‘गाइड’ देखने का सुख अभी तक याद है। याद है आइपी कॉलेज के स्टाफ क्वार्टर से वीसीआर चोरी होना और दिल टूटना।

वहीं दिल्ली में अपनी दुकान के लिए इलेक्ट्रॉनिक सामानों की खरीदारी करने आए नागेश्वर सिंह बताते हैं कि 1985 से 86 तक हमने ‘नेशनल’ के वीसीआर खूब बेचे थे। सिंह पटना सिटी में ‘इलेक्ट्रॉनिक्स केयर’ की दुकान चलाते हैं। सिंह बताते हैं कि 80 के दशक में हालत यह थी कि पटना में वीसीआर की ‘स्मगलिंग’ करनी होती थी। कंपनी के एजंट कमीशन लेकर हमें बेचते थे। हां 1990 में यह हमें आसानी से ओपेन मार्केट में मिलने लगा। फिलिप्स, टेल्कॉन, सोनी के वीसीआर लोकप्रिय थे। लेकिन कंप्यूटर और सीडी आते ही यह बाजार से उतनी ही तेजी से गायब भी हो गया।

हालांकि फुनई कंपनी की आखिरी वीसीआर बनाने की खबर भी चौंकाने वाली थी। क्योंकि बहुत से लोग इसे पहले ही मरा हुआ मान चुके थे। 80 के दशक में वीसीआर ने आम घरों में मनोरंजन की दुनिया ही बदल थी। पसंदीदा फिल्म देखने के अलावा निजी क्षणों की वीडियो रिकॉर्डिंग के लिए यह वरदान साबित हुआ था। नब्बे के दशक में शादी का वीडियो, बच्चे के पहले जन्मदिन का वीडियो अपने कैमरे से रिकॉर्ड कर लोग वीसीआर पर देखते थे। वहीं आज अपने पोते-पोतियों का पहला चलना-उठना अपने कैमरा फोन में कैद कर वाट्स ऐप कर देते हैं। तब लगा ही नहीं था कि ‘क्रांतिकारी वीसीआर’ 40 की उम्र में दम तोड़ देगा। वीसीआर की यादों के बारे में बहुत से लोगों ने कहा कि यह हमारे लिए अपने साथी के साथ रोमांटिक फिल्में देखने का एकमात्र साधन था।

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