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घरेलू सहायकाएंः सशक्तिकरण बनाम संघर्ष

किसी के लिए घरेलू सहायिका होना सशक्तिकरण है तो किसी के लिए मजबूरी। इस बार बात ऐसी ही काम वाली औरतों से यानी घरेलू सहायिकाओं से जो दूसरों का पेट भरने के साथ-साथ अपने परिवार का भी लालन-पालन कर रही हैं।

Author Updated: February 27, 2020 12:34 AM
नेहा, सरोज और अनीमा

मीना

दूसरों के घरों में झाड़ू, पोछा करके उनके घरों को चमकाती हैं, स्वादिष्ट भोजन बनाकर उनके रिश्तों में मिठास घोलती हैं, पर जब बात उनके अपने रिश्तों की, अपने काम की और अपने निजत्व की आती है, तब वह बेबस नजर आती हैं। घरेलू सहायिकाएं पूरे दिन दूसरों के घरों में काम करके दूसरों की जिंदगी को आबाद बनाती हैं लेकिन खुद भीड़ में भी अकेली नजर आती हैं। ये व्यवस्था है जो एक औरत को अपने घर की रसोई से निकालकर दूसरे घर की रसोई की ओर धकेलती है। किसी के लिए घरेलू सहायिका होना सशक्तिकरण है तो किसी के लिए मजबूरी। इस बार बात ऐसी ही काम वाली औरतों से यानी घरेलू सहायिकाओं से जो दूसरों का पेट भरने के साथ-साथ अपने परिवार का भी लालन-पालन कर रही हैं।

वो लड़की जिसने बाप के घर में कभी खाना बनाकर तक नहीं खाया और आज उसकी किस्मत है कि दूसरों के घरों में जाकर बर्तन धो रही है। दस साल हो गए काम करते-करते, अब मन भर गया है। देही (शरीर) भी नहीं चलती है। हाथ, पैर और सिर में दर्द, घर की चिंता इतनी होती है कि मन और शरीर दोनों दुखी रहते हैं। दिल्ली के एक अपार्टमेंट में काम करने वाली घरेलू सहायिका अनिमा भावुक होते हुए कहती हैं कि घर की चिंता करते-करते कल पूरे दिन टेंशन में काम किया। चक्कर आते रहे लेकिन काम तो करना ही है। तबीयत कितनी ही खराब हो सोसायटी में जाते ही पूरा काम करवा लेते हैं लोग, ये भी नहीं बोलते कि तुम्हारी तबीयत ठीक नहीं है तो थोड़ा काम कर लो। कितनी ही बीमारी हो छुट्टी नहीं करती क्योंकि पैसा कट जाता है। घर और बाहर दोनों जगहों पर अनिमा अकेले ही जूझ रही हैं।

घरेलू सहायिका अनिमा अपने काम के अनुभव और संघर्ष को साझा करते हुए कहती हैं कि बहुत बार काम पर जाने का मन नहीं करता लेकिन जब घर की हालत देखती हूं तो जाना पड़ता है। अनिमा कहती हैं कि अगर काम नहीं करूंगी तो खाऊंगी क्या। घर में तीन बच्चे, किराए का घर और पति मजदूर है। सब खर्च एक की कमाई से नहीं निकलेगा। वह बताती हैं कि जब घरों में काम करना शुरू किया था, तब शर्म लगती थी लेकिन अब शर्म छूट गई है। अब किस्मत में यही लिखा है तो करना ही पड़ेगा। वे कहती हैं कि अब इस काम में बुराई देखकर भी क्या कर लेंगे, आधी जिंदगी निकल गई यही काम करते-करते।

वह अपने काम को लेकर कहती हैं कि बहुत बार जब सोसायटी के घरों में कप या प्लेट गलती से टूट जाते हैं तो और डांट पड़ती है, तब गुस्सा भी आता है क्योंकि जो भी काम बिगड़ता है वो मैं जानबूझकर तो बिगाड़ती नहीं हूं। इससे पहले वो लोग मुझे डांटे मेरे पहले ही आंसू निकल आते हैं। अनिमा कहती हैं कि सोसायटी वाली मैडमों को केवल काम से मतलब है। हमें हारी है, बीमारी है, इससे उन्हें कोई मतलब नहीं। वह भावुक होते हुए कहती हैं कि चाहे पति की चिंता हो, बच्चों की हो, घर में क्या है और क्या नहीं है, इस सबके बारे में मुझे ही सुनना पड़ता है। मेरे पास कोई भावनात्मक सहारा नहीं है। चाहे कितनी ही चिंता हों सब खुद ही झेलनी पड़ती है। घर और बाहर मेरे मन की कोई सुनना वाला नहीं है। सुबह उठकर घर में इतना खाना बनाकर जाती हूं कि कि बच्चों को बाद में बनाना न पड़े। वो भूखे न रहें।

वे बताती हैं कि सोसायटी के घरों में खाने की अच्छी चीजें बेकार हो जाएंगी पर कभी पूछेंगी नहीं खा लो या बच्चों को ले जाओ। तो वहीं, दूसरे घर में खिला पिलाकर जूता भी मार देती हैं। अनिमा कहती हैं कि ये तो मजबूरी में करना पड़ता है क्योंकि कहीं कारखाने वगैरह में काम करती तो पूरे दिन वहां काम करना पड़ता और बच्चे दिनभर भूखे रहते। वह कहती हैं कि भगवान किसी को इतना दुख न दे कि किसी के घर में जाकर काम करना पड़े।

गाजियाबाद में नेहा आठ साल से दूसरों के घरों में काम करती हैं। घर में तीन बच्चे हैं और पति कारखाने में काम करते हैं। पति का काम हमेशा नहीं चलता। ठेके पर काम करते हैं। कभी 200 का काम तो कभी 300 का और कभी कुछ भी नहीं है। जो भी है, वह नेहा की ही कमाई है। उनका परिवार किराए के घर में रहता है। नेहा कहती हैं कि मैं पढ़ी लिखी नहीं हूं, जो कभी ये सोचती कि यहां कम आमदनी है या यहां काम नहीं कर रही, कहीं और देखती हूं। मैं अपने बच्चों का पेट भरती हूं। नेहा बताती हैं कि जब मुझसे काम पर कोई गलती हो जाती है तो मैं चुपचाप सुन लेती हूं। किसी की डांट को अपने दिमाग में बहुत समय तक नहीं रखती। क्योंकि जो काम बिगड़ जाता है वो वापस ठीक तो नहीं हो पाता।

नेहा गर्व भरे स्वर में कहती है कि मैं भगवान की शुक्रगुजार हूं कि मेरे पास कुछ तो काम है करने के लिए। घर की इतनी चिंता होती है कि मैं तो वैसे ही मर जाती, लेकिन काम पर आने से थोड़ा अपना दुख बांट लेती हूं और अपने काम के पैसों से घर भी चला लेती हूं। वो कहती हैं कि जब इतना काम करती हूं तो घर में कोई इज्जत नहीं मिलती अगर नहीं कमा रही होती तो और इज्जत नहीं मिलती। सोसायटी में मुझे अपने घर जैसा लगता है। अगर घर से चाय नहीं पी पाई तो वहां जाकर बनाकर पी लेती हूं। जब मैं घर से परेशान होकर जाती हूं तो सोसायटी की मैडम बात कर लेती हैं। थोड़ा मन को सुकून मिलता है। वह कहती हैं कि जब थक जाती हूं तो मन करता है कि काम छोड़ दूं लेकिन बच्चों को देखकर फिर करना पड़ता है, क्योंकि पति का काम भी बहुत नहीं चलता। वह कहती हैं कि बचपन से संघर्ष किया और कर भी रही हूं। रुआंसे से मन से नेहा कहती हैं कि न बचपन में सुख मिला, न जवानी में और अब तो बुढ़ापा आ रहा है। पता नहीं आगे कभी सुख मिलेगा या नहीं। नेहा कहती हैं कि जहां तक मेरे हाथ पैरे चलेंगे मैं अपने बच्चों कोई दुख नहीं होने दूंगी।

बीस साल से घरेलू सहायिका का काम करने वाली सरोज बताती हैं कि दिल्ली के मयूर विहार फेज तीन में काम करती हैं। चार बच्चे हैं, जो नौकरी करते हैं। दो बच्चों की शादी हो गई। सारे दिन में काम करने के आठ हजार कमा लेती हैं। पचास साल की सरोज पूरे दिन काम करती हैं। वे कहती हैं कि पूरे दिन काम न करूं तो घर कैसे चलाऊंगी। बच्चे किसी के नहीं देखते खुद को खुद ही देखना पड़ता है। इसलिए कमाना पड़ता है। साक्षात्कार के बीच में ही सरोज बोल पड़ीं कि अब मुझे कहीं और खाना बनाने जाना है, इसलिए बहुत देर बात नहीं कर पाऊंगी। वे बताती हैं कि अब बेटियों की शादी करनी है तो उनके लिए भी सोचना है। ये काम वाली औरतें अपने स्तर पर संघर्ष कर रही हैं और जारी भी है।

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