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दिल्ली मेरी दिल्ली- कहीं होशियारी तो कहीं दिखा खेल

दिल्ली पुलिस भले ही अब सुशील पहलवान से जुड़े मामले की तह तक जाने की कोशिश कर रही हो, लेकिन गिरफ्तारी से पहले सुशील को कहीं न कहीं बचने का भी खूब मौका मिला। दिल्ली पुलिस के लिए उस फजीहत से उबरना अभी थोड़ा मुश्किल लग रहा है।

Edited By Sanjay Dubey नई दिल्ली | Updated: May 31, 2021 5:41 AM
दिल्ली मेरी दिल्ली।

उलटा पड़ा दांव
चौबे गए छब्बे बनने, दुबे बनकर लौटे! यह कहावत दिल्ली विश्वविद्यालय के विवेकानंद कॉलेज की प्राचार्य पर कमोबेश सटीक बैठती है। हुआ यूं कि अपने आला अधिकारियों को संतुष्ट करने के लिए प्राचार्य महोदया ने 12 तदर्थ शिक्षकों की सेवा बर्खास्तगी कर तो दी लेकिन इसका विरोध इस कदर हुआ की प्राचार्य को ही महंगा पड़ गया। उन्हीं का सेवा विस्तार रुक गया और प्राचार्य पद पर 5 साल से कार्यरत महोदय की सेवा विस्तार वाली फाइल प्रशासन ने लौटा दी। प्राचार्य पद पर दोबारा नियुक्ति से मना कर दिया गया। उन्हीं का बतौर प्राचार्य सेवा विस्तार रुक गया। स्थायी प्राचार्य बनने की जगह हो वह कार्यवाहक प्राचार्य भी नहीं रहीं। किसी ने ठीक ही कहा-उल्टा पड़ गया दांव।

खुराक की फिक्र
कोरोना की दूसरी लहर के प्रकोप से सहमे लोगों को अब टीके की महत्ता समझ आने लगी है। जहां पहले लोग टीका लगाने से बच रहे थे। वहीं अब जुगत लगा रहे हैं कि उनका नंबर जल्दी आ जाए, लाइन न लगानी पड़े और पंजीकरण के झंझट से मुक्ति मिले। कुछ लोग जो पहली एक खुराक लगा चुके हैं वो दूसरी खुराक लगाने के लिए झूठ तक बोलने से बाज नहीं आ रहे हैं। बेदिल को पता चला कि अस्पतालों और अन्य टीकाकरण केंद्रों पर लोग निर्धारित समय से पहले अपनी दूसरी खुराक लगवाने को व्याकुल हैं। वे अपना मोबाइल नंबर तक बदल रहे हैं ताकि पहली खुराक की जानकारी न मिल सके। हालांकि मामले की जानकारी प्रशासन को भी हो गई है तो उसने भी इनसे निपटने के लिए ब्योरा खंगालना शुरू कर दिया है। ऐसे लोगों को चेतावनी भी जारी की गई है।

कोरोना का सितम
आम इंसान कोरोना की वजह से इसलिए परेशान है क्योंकि बीमारी ने सारा काम धंधा चौपट कर रखा है। वहीं नेतागण इसलिए क्योंकि उनकी नेतागिरी नहीं चमक पा रही। जी हां! अब बिना कोई पार्टी का पद लिए जनता के बीच जाने पर रौब भी तो नहीं गंठेगा न, इसलिए काफी चिंतित हैं। संघर्ष कर रही दिल्ली की एक पार्टी दो साल से प्रदेश कार्यकारिणी का न तो फेरबदल कर पाई और न नए सिरे से गठन। नए अध्यक्ष के बाद उम्मीद की किरण जगी थी लेकिन महामारी ने सब किए कराए पर ‘बीमारी’ फेर दिया। सब नेता घर में कैद हैं। माना जा रहा है कि इस साल और कार्यकारिणी का गठन नहीं होगा। इस कारण नेताओं के बीच मातम पसरा है। कई नेता उम्मीद लगाए बैठे थे कि उन्हें पदभार मिल सकता है। लेकिन मंसूबे कामयाब होते नहीं दिख रहे।

छपास प्रेम
छपास रोग यानी अखबारों में छपने से कोई भी नेता अछूता नहीं। नेताओं के छपास रोग गजब के होते हैं। वे कभी भी, किसी भी मौके को हाथ से जाने देना नहीं चाहते हैं जिसमे उन्हें प्रचार प्रसार दिख रहा हो। बीते दिनों नगर निगम के एक बड़े पदाधिकारी ने तो मलेरिया, डेंगू, चिकनगुनिया पर खुद से ही छिड़काव शुरू कर दिया। यह अलग बात है कि वे सिर्फ मशीन को आगे से पकड़े हुए फोटो खिंचा रहे थे। जबकि भारी-भरकम मशीन निगम के कर्मचारी पीछे से उठाए हुए थे। लेकिन नेताजी इसी में खुश थे कि आखिर जनता उन्हें छिड़काव करते देख आगे मौका जरूर देगी।

खाकी की फजीहत
दिल्ली पुलिस भले ही अब सुशील पहलवान से जुड़े मामले की तह तक जाने की कोशिश कर रही हो, लेकिन गिरफ्तारी से पहले सुशील को कहीं न कहीं बचने का भी खूब मौका मिला। दिल्ली पुलिस के लिए उस फजीहत से उबरना अभी थोड़ा मुश्किल लग रहा है। दिल्ली में हर किसी के चाचा-ताऊ किसी न किसी बड़े पद पर हैं, ऐसा लोग रौब गांठते हुए कहते हैं। ऐसे में इतने बड़े अंतरराष्ट्रीय स्तर के पहलवान का अंदरखाने तक परिचय ही यह आशंका साबित कर रहा था कि मामला अपने आप ठंडा हो जाएगा। लेकिन जैसे ही एक घायल पहलवान की मौत हुई मामला बिगड़ गया और सुशील के फरार होने की करतूत ने पुलिस की और किरकिरी कर दी। अब पुलिस हाथ पैर मारकर मामले में गंभीरता दिखा रही है।
-बेदिल

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