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चंबल: घड़ियाल तो बच गए लेकिन रेत की चोरी से जान पर बन आई

कुछ ट्रैक्टर चालक पकड़े जाने के डर से और कुछ अपनी हेकड़ी और दहशत फैलाने की मानसिकता से ब्रेक लगाने को तैयार नहीं होेते।

Author मुरैना | September 27, 2017 6:22 AM
पुलिसकर्मियों ने वसूली से रोकने पर आईपीएस पर ही हमला बोल दिया। (फाइल फोटो)

आदर्श गुप्ता

चंबल के घड़ियालों को बचाने की सरकार की कवायद ने यहां के इंसानों की जिंदगी को खतरे में डाल दिया है। इंसानों को मारने का यह सिलसिला उन ट्रैक्टर ट्रालियों ने शुरू किया है जो चंबल नदी से चोरी से रेत लाकर शहर में बेचने के अरबों रुपए के कारोबार में लगी हैं। कुछ ट्रैक्टर चालक पकड़े जाने के डर से और कुछ अपनी हेकड़ी और दहशत फैलाने की मानसिकता से ब्रेक लगाने को तैयार नहीं होेते। नतीजतन रोजाना एक या दो लोग इन ट्रैक्टरों से कुचल कर मर रहे हैं।  1974 में अमेरिका के प्रसिद्ध प्राणी विज्ञानी डॉ.रॉबर्ट बस्टर्ड ने केंद्र सरकार को घड़ियालों पर अपनी एक रिपोर्ट सौंपी। इसमें बताया गया था कि केवल चंबल और गंगा नदी में पाए जाने वाले घड़ियालों की प्रजाति लगभग लुप्त होने को है। तब दोनों नदियों में सिर्फ 60 या 70 घड़ियाल होने की बात उन्होंंने लिखी थी। इस पर 1978 में केंद्र और मध्य प्रदेश सरकार ने मिलकर घड़ियालों को बचाने के लिऐ घड़ियाल अभयारण्य की स्थापना की। इसका पहला केन्द्र देवरी में बना। खोजबीन में पता चला कि मादा घड़ियाल रेत में गड्ढा खोद जो अंडे देती थी वे रेत की खुदाई में नष्ट हो जाते थे।

दरअसल, भवन निर्माण में चबंल की रेत की भारी मांग के कारण पूरे चंबल क्षेत्र में हजारों ट्रक रेत रोज खोदी और बची जाती थी। खुद मध्य प्रदेश सरकार खनिज निगम के माध्यम से चंबल की रेत खदान नीलाम करती थी। रेत में अंडों को सुरक्षित रखने के लिए सरकार ने 423 किलोमीटर लंबी चंबल नदी के दोनों किनारे के एक किलोमीटर क्षेत्र को चंबल अभयारण्य के लिए न केवल सुरक्षित घोषित कर दिया बल्कि यहां से रेत की खुदाई पूरी तरह प्रतिबंधित कर दी। चंबल किनारे बसे सैकड़ों गांवों के ज्यादातर लोगों की जीविका का साधन चंबल की रेत थी। लोगों ने बैंकों से कर्ज लेकर ट्रैक्टर ट्रालियां खरीद रखी थीं। इसके अलावा ट्रकों से यह रेत दिल्ली यूपी तक जाती थी। कुल मिलाकर चंबल की रेत बेचना हजार करोड़ रुपए से ऊपर का एक बेहद संगठित करोबार था। सरकार की रोक ने अचानक इस पूरे कारोबार को बंद कर दिया।रेत की बिक्री पर रोक के कारण बेचने और खरीदने वालों में एक गठजोड़ बना जिसने चोरी से रेत बेचने के कारोबार को बढ़ाया। रेत की ट्रॉली प्रतिबंध से पहले 500 रुपए में आसानी से मिल जाती थी। वह आज 2000 रुपए की है। सरकार ने भी इसमें राजनीति खेली। रेत को वन संपदा बताकर उसकी चोरी रोकने का काम वन विभाग को सौंप दिया जिसके पास इतने विशाल संगठित कारोबार को रोकने को कोई संसाधन नहीं थे।

सबसे पहले 1992 में समाजवादी से भाजपाई बने स्थानीय नेता पूर्व विधायक गजराज सिंह सिकरवार ने आने वाली मुसीबत को पहचाना। उन्होंने चंबल अभयारण्य को लेकर चेतावनी दी। उनका कहना था कि चंबल किनारे बसे गांवों के किसानों की जो जमीन अधिग्रहीत की जा रही हैं उससे मिले पैसे लोग कुछ दिन में खा पी जाएंगे और फिर रेत को लेकर झगड़ा करेंगे। उनकी यह बात आज अक्षरश: सही साबित हो रही है। पर्यावरण से जुड़ी संस्थाओं ने ग्वालियर हाईकोर्ट और राष्ट्रीय हरित पंचाट में याचिकाएं लगाईं। चिंतित न्यायालयों ने पुलिस एसएएफ और यहां तक कि बीएसएफ तक को चंबल किनारे तैनात किया लेकिन चोरी नहीं रुकी। न्यायालयों के ज्यादा दबाव पर कार्रवाई करने निकले सरकारी अमले पर लोग हमलावर होने लगे हैं। सुबह 4 बजे से 10 बजे तक रोजाना सैकड़ों रेत भरी ट्रैक्टर ट्रॉलियां दनदनाती हुईं निकलती हैं। इन्हें कोई रोकता है तो ड्राइवर ट्रॉली सड़क पर खाली कर भाग जाता है। इससे हादसे होते हैं। ज्यादातर ड्राइवर नाबालिग होते हैं ताकि दुर्घटना करने या रेत चोरी में पकड़े जाने पर उन पर मुकदमा जुवेनाइल कानूनों में दर्ज हो।

रेत चोरी के दर्ज मामले
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