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मिड डे मील स्कीम में बंगाल देशभर में अव्वल, बिहार दूसरे स्थान पर

पिछले वित्तीय वर्ष यानी 2018-19 में 1,08,77,644 छात्र-छात्राओं को स्कूल जाने के क्रम में दोपहर के भोजन का लाभ मिला।

शिक्षा के साथ भोजन मुहैया कराने के जिस मकसद से मध्याह्न भोजन योजना शुरू की गई थी।

मध्य एवं निम्न परिवार के बच्चों का शिक्षा के प्रति झुकाव हो और वे समय से पहले स्कूल न छोड़े इसी बात को ध्यान में रखते हुए देशभर के सरकारी स्कूलों में मध्याह्न भोजन (दोपहर के भोजन) की व्यवस्था शुरू की गई। इस योजना के चालू होने के बाद से निश्चित तौर पर सरकारी स्कूलों में छात्र-छात्राओं की संख्या बढ़ा। स्कूलों में बच्चों की बढ़ोतरी के साथ ही मध्याह्न भोजन के साथ तरह-तरह के घोटाले, कम गुणवत्ता वाले भोजन और कई तरह के विवाद भी खड़े हुए। इन सबके बावजूद सरकारी स्कूलों में दोपहर का भोजन परोसने में पश्चिम बंगाल देशभर में सबसे आगे है। राज्य में एक करोड़ से अधिक छात्र-छात्राओं को दोपहर का भोजन दिया जाता है, जो देश के अन्य राज्यों की तुलना में सबसे ज्यादा है।

पिछले वित्तीय वर्ष यानी 2018-19 में 1,08,77,644 छात्र-छात्राओं को स्कूल जाने के क्रम में दोपहर के भोजन का लाभ मिला, जो देशभर में पहले पायदान पर रहा। इस कड़ी में 1,07,04,604 के साथ बिहार दूसरे और 1,05,58,209 की संख्या के साथ उत्तराखंड तीसरे स्थान पर रहा। जबकि अरुणाचल प्रदेश में सबसे कम एक लाख 30 हजार 148 छात्र-छात्राओं तक ही दोपहर का भोजन पहुंच पाया।
शिक्षा के साथ भोजन मुहैया कराने के जिस मकसद से यह योजना शुरू की गई थी, उसमें बीते वित्तीय वर्ष (2018-19) में बंगाल ने देश के अन्य राज्यों को पछाड़ दिया।

मालूम हो कि राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम 2013 के प्रावधान के तहत छह से 14 साल के बच्चों (आठवीं कक्षा तक) को दोपहर का भोजन दिया जाता है। संतोष की बात यह है कि इस योजना में बंगाल का प्रदर्शन साल-दर-साल बेहतर हो रहा है। हालांकि इस दौरान कभी घोटाला, कभी कम गुणवत्ता और कभी भोजन चोरी की घटना सामने आती रही, लेकिन राज्य के प्राथमिक शिक्षा विभाग ने तत्परता दिखाते हुए तत्काल विवाद का निपटारा किया, जिसका प्रतिफल यह है कि पिछले वित्तीय वर्ष के दौरान दोपहर का भोजन परोसने में बंगाल को पहला स्थान मिला।

आंकड़े पर गौर करें तो जब से दोपहर के भोजन की योजना शुरू हुई है तब से सूबे में इस योजना के तहत भ्रष्टाचार के नौ मामले सामने आए, जिसमें सबसे ज्यादा तीन मामले 2017 में सामने आए हैं। 2018 की घटना के बाद सूबे की मुख्यमंत्री व तृणमूल कांग्रेस प्रमुख ममता बनर्जी खुद सक्रिय हुईं और दोषी लोगों को चेतावनी देते हुए फटकार भी लगाई। उसके बाद से 2019 की समाप्ति तक मध्याह्न भोजन में धांधली की कहीं कोई मामला सामने नहीं आया। 2018 में कम गुणवत्ता वाले भोजन परोसने पर नाराजगी जताते हुए न केवल खुद मुख्यमंत्री हरकत में आई थीं, बल्कि यह निर्देश भी जारी किया कि मौसम के मुताबिक मध्याह्न भोजन की सूची राज्य सरकार तैयार करेगी।

शंकर जालान, कोलकाता

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