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मोबाइल की तरह अंगुलियों के निशान से महफूज होगी बंदूक

इन चारों दोस्तों के मुताबिक, बंदूक में लगने वाला यह सेफ्टी बायोमेट्रिक ग्रिप उसी इंसान से चलेगा जिसकी बंदूक होगी।

Author Published on: November 20, 2019 4:38 AM
चारों दोस्तों के मुताबिक, बंदूक में लगने वाला यह सेफ्टी बायोमेट्रिक ग्रिप उसी इंसान से चलेगा जिसकी बंदूक होगी।

दिल्ली में एक दुकान पर लूटपाट करने आए लुटेरों को जब दुकान के मालिक ने ही अपनी लाइसेंसी बंदूक से डराने की कोशिश की तो गुंडों ने उसी बंदूक से दुकान मालिक की हत्या कर दी। खबर फैली तो दिल्ली के उत्तम नगर में रहने वाले चार दोस्तों को विचलित कर गई। अगले दिन ही उन्होंने इस पर सोचना शुरू कर दिया और बंदूक को दूसरों से सुरक्षित रखने का तरीका इजाद किया। इन चारों दोस्तों के मुताबिक, बंदूक में लगने वाला यह सेफ्टी बायोमेट्रिक ग्रिप उसी इंसान से चलेगा जिसकी बंदूक होगी। क्योंकि यह बंदूक उसकी अंगुलियों के निशान को पहचान कर ही शूट करने की इजाजत देगा।

कई बार ऐसा होता है कि बंदूक साफ करते वक्त गोली चल जाती है और किसी की मौत हो जाती है। ऐसा भी होता है कि किसी की कीमती बंदूक चोरी हो जाती है और दूसरा उपयोग करता है। लेकिन इस तकनीक के बाद ऐसा नहीं होगा क्योंकि यह एक ऐसा ग्रिप है जो कि फिंगरप्रिंट से खुलेगा। बंदूक से होने वाली आत्महत्या पर भी रोक लगेगी।

परियोजना पर काम करने वाले सिद्धार्थ ने 12वीं कक्षा 2016 में पास कर रोबोटिक्स के विषय में ज्ञान हासिल करना शुरू कर लिया था। इन्हें बचपन से ही नई चीजें बनाने का शौक था। इनकी रुचि आधुनिक तकनीकों में भी थी। सिद्धार्थ राष्ट्रीय स्तर के ताईक्वांडो खिलाड़ी भी रह चुके हैं। सिद्धार्थ ने सोचा कि जिस तरह हम अपने मोबाइल फोन को अपने फिंगर प्रिंट की सहायता से खोलते हैं या अनलॉक करते हैं क्यों ना उसी तरह बंदूक भी अनलॉक हो। तब इनसे विवेक, जावेद और सुमन मिले और चारों दोस्तों की मदद से यह प्रोजेक्ट आगे बढ़ा।

सुमन और जावेद दिल्ली के हैं जबकि विवेक, बिहार के रहने वाले हैं। सिद्दार्थ ने 12वीं के बाद रोबोटिक्स ज्वाइन किया था। सुमन व जावेद पॉलीटेक्निक कर चुके हैं। जावेद की पढ़ाई कुछ कारणों से बीच में ही छूट गई थी। विवेक तकनीकी काम तो नहीं जानते लेकिन उन्होंने 12वीं के बाद एक इवेंट मैनेजमेंट कंपनी में काम किया है। उन्होंने इस प्रोजेक्ट को चर्चा में लाने में काफी मदद की। सिद्धार्थ बताते हैं कि अगले दिन ही हम लोग बंदूक से जुड़े अपराध के आंकड़े जुटाने बैठ गए। पता चला कि गृह मंत्रालय के मुताबिक, भारत में 3369444 बंदूक लाइसेंस धारक हैं, जिसमें सबसे ज्यादा उत्तर प्रदेश में 1277914 हैं। और यह दिनों-दिन बढ़ रहा है जबकि बंदूक को लेकर एहतियात घट रही है।

सिद्धार्थ बताते हैं कि बायोमेट्रिक सेफ्टी ग्रिप बंदूक चलाने वाले की अंगुलियों के निशान को पहचान कर ही ट्रिगर को चलाने के लिए खोलेगा। यह निशान उसी व्यक्ति का पहचानेगा जिसकी बंदूक का लाइसेंस होगा। इसके लिए बंदूक के हत्थे पर कुछ सामान्य बदलाव करने होंगे जिसके बाद यह पूरी तरह तैयार हो जाएगा। इस बंदूक में जीपीएस भी लगा होगा जिससे बंदूक कहीं भी हो अगर उसे कोई छूएगा या चलाने की कोशिश करेगा तो लाइसेंस धारक के पास सूचना पहुंचेगी।

जावेद और सुमन बताते हैं कि अगर कोई बंदूक को न चलाकर तोड़ने की कोशिश करेगा या उसे नुकसान पहुंचाएगा तो यह खुद ब खुद लॉक हो जाएगी। सिद्धार्थ कहते हैं कि पेटेंट कराने के बाद अब भारत सरकार की ओर से राष्ट्रीय सुरक्षा गार्ड (एनएसजी) की बोर्ड बैठक में इसका परीक्षण होगा। इसे बनाने में दो साल और कुल खर्च 7.50 लाख के करीब आया है। कई लोगों से आर्थिक मदद ली गई जिसके बाद इसमें छह तरह के प्रोटोटाइप तैयार किए गए थे।

गजेंद्र सिंह

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