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रामजन्मभूमि विवाद पर पहली याचिका दाखिल

सुन्नी वक्फ बोर्ड ने पहले ही साफ कर दिया था कि अयोध्या पर उसे सुप्रीम कोर्ट का फैसला स्वीकार है।

Author Updated: December 3, 2019 5:36 AM
याचिका में कहा गया कि माननीय अदालत ने अपने फैसले में मस्जिद ढहाए जाने को दोषपूर्ण कृत्य करार दिया था।

अयोध्या रामजन्मभूमि विवाद मामले में सुप्रीम कोर्ट में पहली पुनर्विचार याचिका दाखिल की गई है। जमीयत-उलेमा-ए-हिंद सुप्रीम कोर्ट पहुंच गया है और इसके बाद आॅल इंडिया मुसलिम पर्सनल लॉ बोर्ड अदालत में जाने की तैयारी में हैं। पुनर्विचार याचिका में जमीयत ने वही तर्क रखे हैं, जिन्हें अदालत ने अतीत में खारिज कर दिया है। मुसलिम पर्सनल लॉ बोर्ड भी कोई नई बात नहीं कर रहा। वह नौ दिसंबर के पहले अदालत जाएगा। कानून विद मान रहे हैं कि किसी की भी पुनर्विचार याचिका के अदालत में टिकने की संभावना कम ही है। दूसरी ओर, मुसलिम पक्षकारों का बड़ा एक हिस्सा सुप्रीम कोर्ट के फैसले को मानने का पहले ही ऐलान कर चुका है। ऐसे में सवाल है कि इस मामले को खींचने में जुटे धड़े का असल उद्देश्य क्या है?

जमीयत की पुनर्विचार याचिका: पुनर्विचार याचिका दाखिल करने के बाद जमीयत के प्रमुख मौलाना अरशद मदनी का बयान आया कि सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले को बरकरार रखा तो हम उसका पालन करेंगे। जमीयत-उलेमा-ए-हिंद की ओर से पक्षकार एम सिद्दीकी के कानूनी वारिस और उत्तर प्रदेश जमीयत-उलेमा-ए-हिंद के अध्यक्ष मौलाना सैयद अशहाद रशीदी ने 217 पन्नों की याचिका में मांग की कि संविधान पीठ के आदेश पर नौ नवंबर तक अंतरिम रोक लगाई जाए, जिसमें कोर्ट ने विवादित जमीन को राम मंदिर के पक्ष राय दी थी और केंद्र को ट्रस्ट गठित करने का निर्देश दिया था।

याचिका में कहा गया कि सुप्रीम कोर्ट ने 1934, 1949 और 1992 में मुसलिम समुदाय के साथ हुई ना-इंसाफी को गैरकानूनी करार दिया, लेकिन उसे नजरअंदाज भी कर दिया। पूर्ण न्याय तभी होता जब मस्जिद का पुनर्निर्माण होगा। उनका तर्क है कि सुप्रीम कोर्ट ने मान लिया कि 1528 से 1856 तक वहां नमाज न पढ़ने के साक्ष्य सही है। याचिका में कहा गया कि माननीय अदालत ने अपने फैसले में मस्जिद ढहाए जाने को दोषपूर्ण कृत्य करार दिया था। इसके बावजूद फैसला पूरी तरह से हिंदू पक्षकारों की ओर गया है।

मुसलिम पर्सनल लॉ बोर्ड: इस मामले में आॅल इंडिया मुसलिम पर्सनल लॉ बोर्ड भी अदालत जाएगा। बोर्ड इस मामले में पक्षकार नहीं था, फिर भी वो देश के मुसलमानों की तरफ से ऐसा करने जा रहा है। बोर्ड के वकील जफरयाब जिलानी के मुताबिक, इसे नौ दिसंबर से पहले किसी भी दिन दाखिल किया जा सकता है। मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड का कहना है कि उसे बाबरी मस्जिद के बदले दूसरी जगह पांच एकड़ जमीन मंजूर नहीं है। मुसलमान पक्ष मस्जिद की जमीन के लिए कोर्ट नहीं गए थे। उन्हें वही जमीन चाहिए जहां बाबरी मस्जिद बनी थी। विश्व हिंदू परिषद और भाजपा के कुछ नेताओं ने मुसलिम पर्सनल लॉ बोर्ड के फैसले पर सवाल उठाया है और इसे राजनीति से प्रेरित और माहौल खराब करने की कोशिश बताया है।

सुन्नी वक्फ बोर्ड व अन्य: सुन्नी वक्फ बोर्ड ने पहले ही साफ कर दिया था कि अयोध्या पर उसे सुप्रीम कोर्ट का फैसला स्वीकार है। 26 नवंबर को लखनऊ में हुई बैठक में बहुमत से इस निर्णय पर मुहर लगा दी जा चुकी है। दूसरे मुसलिम पक्षकारों ने भी सुप्रीम कोर्ट के फैसले को मान लिया है। ऐसे में सवाल उठता है कि दो धड़े क्यों विरोध में हैं और इससे क्या हासिल होगा?

मुसलिम बुद्धिजीवी : अभिनेता नसीरूद्दीन शाह और शबाना आजमी समेत देश भर की 100 जानी-मानी मुसलिम शख्सियतें अयोध्या पर आए सुप्रीम कोर्ट फैसले के खिलाफ पुनर्विचार याचिका का विरोध कर चुकी हैं। इन शख्सियतों ने कहा है कि रामजन्मभूमि-बाबरी मस्जिद मामले के कुछ पक्षकारों का याचिका दायर करने का फैसला विवाद को जिंदा रखेगा और मुसलिम कौम को नुकसान पहुंचाएगा। इसमें इस्लामी विद्वान, सामाजिक कार्यकर्ता, वकील, पत्रकार, कारोबारी, शायर, अभिनेता, फिल्मकार, थिएटर कलाकार, संगीतकार और छात्र शामिल हैं। इनके बयान में कहा गया है, ‘हम इस तथ्य पर भारतीय मुसलिम समुदाय, संवैधानिक विशेषज्ञों और धर्मनिरपेक्ष संगठनों की नाखुशी को साझा करते हैं कि देश की सर्वोच्च अदालत ने अपना निर्णय करने के लिए कानून के ऊपर आस्था को रखा है।’ बयान पर दस्तखत करने वालों में शाह, आजमी, फिल्म लेखक अंजुम राजबली, पत्रकार जावेद आनंद समेत अन्य शामिल हैं।

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