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जनसत्ता रविवारी : दम तोड़ता बचपन

बच्चों के गुम होने के संदर्भ में राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग की एक रिपोर्ट बेहद डरावनी और सभ्य समाज के लिए शर्मनाक है। इसमें कहा गया है कि भारत में हर साल दर्ज होने वाली पैंतालीस हजार से ज्यादा बच्चों की गुमशुदगी की रिपोर्ट में से तकरीबन ग्यारह हजार बच्चों का कोई नामोनिशान तक नहीं मिल पाता है। इनमें से आधे जबरन देह व्यापार में धकेल दिए जाते हैं, बहुतों से बंधुआ मजदूरी कराई जाती है या फिर उन्हें भीख मांगने पर मजबूर किया जाता है।

Author नई दिल्ली | June 12, 2016 2:28 AM
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भारत में हर साल औसतन नब्बे हजार बच्चे खोने की रिपोर्ट थानों तक पहुंचती है। इनमें से तीस हजार से ज्यादा का पता नहीं लग पाता है। यह आंकड़ा है भारत सरकार के राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो का। पिछले साल संसद में पेश एक आंकड़े के मुताबिक सिर्फ 2011 से 2014 के बीच सवा तीन लाख बच्चे लापता हो गए। जब भी इतने बड़े पैमाने पर बच्चों के गुम होने के तथ्य आते हैं तो सरकारी तंत्र रटे-रटाए औपचारिक स्पष्टीकरण जारी करने और समाधान के लिए नए उपाय करने की बातों से आगे कुछ नहीं कर पाता। संयुक्त राष्ट की एक रिपोर्ट का दावा है कि भारत में हर साल तकरीबन 24,500 बच्चे गुम हो जाते हैं। भारत में सबसे ज्यादा बच्चे महाराष्ट्र में लापता होते हैं।

यहां 2011-14 के बीच 50,947 बच्चों के नदारद हो जाने की खबर पुलिस थानों तक पहुंची। मध्यप्रदेश से 24,836, दिल्ली से 19,948 और आंध्र प्रदेश से 18,540 बच्चों के अचानक लापता होने की सूचना दी गई। विडंबना है कि गुम हुए बच्चों में लड़कियों की संख्या सबसे ज्यादा होती है। 2011 में गुम हुए कुल 90,654 बच्चों में से 53,683 लड़कियां थीं। 2012 में कुल गुमशुदा 65,038 में से 39,336 और 2013 में गुमशुदा 1,35,262 में से 68,869 बच्चियां थी।

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2014 में 36,704 बच्चे गायब हुए-जिनमें 17,944 बच्चियां थीं। यह बात भी सरकारी दस्तावेजों में दर्ज है कि भारत में करीब नौ सौ संगठित गिरोह हैं, जिनके सदस्यों की संख्या पांच हजार के आसपास है जो बच्चे चुराने के काम में नियोजित रूप से सक्रिय हैं। लापता बच्चों से संबंधित आंकड़ों की एक हकीकत यह भी है कि राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो सिर्फ अपहरण किए गए बच्चों की गिनती बताता है। ज्यादातर मामलों में पुलिस प्राथमिकी दर्ज करने से इनकार कर देती है या टालमटोल करती है। विभिन्न सरकारी महकमों, स्वयंसेवी संस्थाओं और आम लोगों द्वारा गुमशुदा बच्चों की सूचना, उनके मिलने की संभावना और अन्य सहयोग के लिए एक वेबसाइट काम कर रही है।

यहां पर गुम हुए बच्चों को तलाशने में लगे संगठनों को एकीकृत सूचना मिल जाती है। यह वेबसाइट है तो बेहद उपयोगी और बहुआयामी, लेकिन इसकी दिक्कत है कि यह केवल अंग्रेजी में उपलब्ध है। फिर जिन घरों से बच्चे गुमने की सबसे ज्यादा सूचना आती है वे परिवार इतने पढे-लिखे नहीं होते कि वेबसाइट पर जा सकें। हालांकि, बच्चों के खोने की बाबत मदद के लिए 098309-20103 नंबर पर फोन भी किया जा सकता है। यह विडंबना है कि इतनी अत्याध्ुानिक तकनीक से लैस इस वेबसाइट पर पुलिस वाले जाते ही नहीं है और उनका जोर रहता है कि बच्चों के गुमने की कम से कम रपट थाने में दर्ज हो।
बच्चों के गुम होने के संदर्भ में राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग की एक रिपोर्ट बेहद डरावनी और सभ्य समाज के लिए शर्मनाक है।

इसमें कहा गया है कि भारत में हर साल दर्ज होने वाली पैंतालीस हजार से ज्यादा बच्चों की गुमशुदगी की रिपोर्ट में से तकरीबन ग्यारह हजार बच्चों का कोई नामोनिशान तक नहीं मिल पाता है। इनमें से आधे जबरन देह व्यापार में धकेल दिए जाते हैं, बहुतों से बंधुआ मजदूरी कराई जाती है या फिर उन्हें भीख मांगने पर मजबूर किया जाता है। कोई डेढ़ लाख बच्चे उनके मां-बाप द्वारा ही बंधुआ मजदूरी के लिए बेचे जाते हैं। यह भी चौंकाने वाला तथ्य है कि दो लाख बच्चे तस्करी कर विदेश भेजे जाते हैं जहां उनसे जानवरों की तरह काम लिया जाता है। मानवाधिकर आयोग और यूनिसेफ की एक रिपोर्ट की मानें तो गुम हुए बच्चों में से बीस फीसद बच्चे विरोध और प्रतिरोध के कारण मार दिए जाते हैं। कुछ बच्चे अंग तस्करों के हाथों भी फंसते हैं। यह एक दुखद लेकिन चौंकाने वाला तथ्य है कि भारत में हर दसवां बच्चा यौन शोषण का शिकार हो रहा है। यही नहीं सुप्रीम कोर्ट भी चेता चुका है कि हमारा देश बाल वेश्यावृत्ति के मामले में एशिया की सबसे बड़ी मंडी के रूप में उभर रहा है।

भारत में अक्सर गरीब, पिछडे और अकालग्रस्त इलाकों में लड़कियों को उनके पालकों को बड़े-बड़े सपने दिखा कर शहरों में लाया जाता है और उन्हें देह व्यापार में ढकेल दिया जाता है। गरीब देशों में आर्थिक स्थिति में बहुत भिन्नता है, इसलिए दूरदराज के किसी कस्बे में बिना किसी हुनर के भी ऊंची मजदूरी पर रोजगार दिलाने के रंगीन सपने कभी-कभी परिवार वालों को आसानी से लुभा जाते हैं। कई बार शादी के झांसे में भी लड़कियों को फंसाया जाता है। दिल्ली विश्वविद्यालय में स्कूल आफ सोशल वर्क से जुड़े डॉ केके मुखोपाध्याय ने अपने एक शोध में पाया कि बाल वेश्यावृत्ति का असल कारण विकास से जुड़ा हुआ है और इसे अलग से आर्थिक या सामाजिक समस्या नहीं माना जा सकता। इस शोध में यह भी बात स्पष्ट हुई है कि छोटी उम्र में ही वेश्यावृत्ति के लिए बेची-खरीदी गई बच्चियों में से दो-तिहाई अनुसूचित, अनुसूचित जनजाति या बेहद पिछड़ी जातियों से आती हैं। केंद्रीय समाज कल्याण बोर्ड ने कुछ साल पहले एक सर्वेक्षण कराया था, जिसमें बताया गया था कि देश में लगभग एक लाख सेक्स वर्कर, जिनमें से पंद्रह प्रतिशत पंद्रह साल से कम उम्र की हैं। हालांकि गैर सरकारी संगठनों का दावा है कि ये आंकड़े हकीकत से काफी कम हैं। गैरसरकारी संस्थाओं का दावा है कि देह व्यापार के नरक में छटपटाने रही कमउम्र बच्चियों की संख्या लाखों में है।

तीन साल पहले दिल्ली पुलिस ने राजधानी से लापता बच्च्यिों की तलाश में एक ऐसे गिरोह को पकड़ा था जो बहुत छोटी बच्चियों को उठाता था, फिर उन्हें राजस्थान की पारंपरिक वेश्यावृत्ति के लिए बदनाम एक जाति को बेचा जाता था। अलवर जिले के दो गांवों में पुलिस के छापे से पता चला कि कम उम्र की बच्चियों का अपहरण किया जाता है। फिर उन्हें इन गांवों में ले जा कर ‘बलि के बकरे’ की तरह खिलाया-पिलाया जाता है। गाय-भैंस से ज्यादा दूध लेने के लिए लगाए जाने वाले हार्मोन के इंजेक्शन आॅक्सीटासीन दे कर छह-सात साल की उम्र की इन लड़कियों को कुछ ही दिनों में 14-15 साल की तरह किशोर बना दिया जाता और फिर उन्हें यौन संबध बनाने के लिए मजबूर किया जाता था। ऐसा नहीं है कि दिल्ली पुलिस के उस खुलासे के बाद यह घिनौना धंधा रुक गया। अभी अलवर, मेरठ, आगरा, मंदसौर सहित कई जिलों के कई गांव इस पैशाचिक कृत्य के लिए जाने जाते हैं। पुलिस छापे मारती है, बच्चियों को महिला सुधार गृह भेज दिया जाता है। फिर दलाल लोग ही बच्चियों के परिजन बन कर उन्हें महिला सुधार गृह से छुड़ाते हैं और सुदूर किसी मंडी में फिर उन्हें बेच देते हैं।

बच्चियों की खरीद-फरोख्त करने वाले दलाल भी मानते हैंकि नाबालिग बच्ची को धंधे वालोें तक पहुंचाने के लिए उन्हें ज्यादा दाम मिलता है। तभी दिल्ली और कई बड़े शहरों में हर साल कई छोटी बच्चियां गुम हो जाती हैं और पुलिस कभी उनका पता नहीं लगा पाती है। इस बात को ले कर सरकार कुछ खास गंभीर नहीं है कि भारत, बांग्लादेश, नेपाल जैसे पड़ोसी देशों की गरीब बच्चियों की तिजारत का अंतरराष्ट्रीय बाजार बन गया है। भले ही मुफलिसी को बाल वेश्यावृृत्ति के लिए प्रमुख कारण माना जाए, लेकिन इसके और भी कई कारण हैं जो समाज में मौजूद विकृ त मन और मस्तिष्क के साक्षी हैं।

एक तो एड्स के भूत ने यौनाचारियों को भयभीत कर रखा है,इसलिए वे कम उम्र बच्चियों की मांग ज्यादा करते हैं। फिर कुछ नीम हकीमों ने भी फैला रखा है कि यौन-संक्रमण रोग ठीक करने के लिए किशोर बच्चियों से यौन संबंध बनाना कारगर उपाय है। इसके अलावा देश में कई सौ लोग इन मासूमों का इस्तेमाल पोर्न वीडियो और फिल्में बनाने में कर रहे हैं। अरब देशों में भारत की गरीब मुस्लिम लड़कियों को बाकायदा निकाह करा कर सप्लाई किया जाता है। हैदराबाद तो इसकी सर्वसुलभ मंडी है। ताइवान, थाईलैंड जैसे देह-व्यापार के कुख्यात अड्डों की सप्लाई-लाइन भी भारत से जुड़ गई है। यह बात समय-समय पर सामने आती रहती है कि गोवा, पुष्कर जैसे अंतरराष्ट्रीय पर्यटकों के आकर्षण केंद्र बाल वेश्यावृत्ति के नए ठिकाने बन रहे हैं।
कहने को तो सरकारी रिकार्ड में कई बड़े-बड़े दावे और नारे हैं- जैसे कि 1974 में संसद ने बच्चों के संदर्भ में एक राष्ट्रीय नीति पर मुहर लगाई थी ,जिसमें बच्चों को देश की अमूल्य धरोहर घोषित किया गया था। भारतीय दंड संहिता की धारा 372 में नाबालिक बच्चों की खरीद-फरोख्त करने पर दस साल तक सजा का प्रावधान है।

असल में इस धारा में अपराध को सिद्ध करना बेहद कठिन है, क्योंकि अभी हमारा समाज बाल-वेश्यावृत्ति जैसे कलंक से निकली किसी भी बच्ची के पुनर्वास के लिए सहजता से राजी नहीं है। एक बार जबरिया ही सही इस फिसलन में जाने के बाद खुद परिवार वाले बच्ची को अपनाने को तैयार नहीं होते, ऐसे में भुक्तभोगी से किसी के खिलाफ गवाही की उम्मीद नहीं की जा सकती है। दुनिया के 174 देशों, जिसमें भारत भी शामिल है, के संयुक्त राष्ट्र बाल अधिकार समझौते की धारा 34 में स्पष्ट उल्लेख है कि बच्चों को सभी प्रकार के यौन उत्पीड़न से निरापद रखने की जिम्मेदारी सरकार पर है। कहने की जरूरत नहीं है कि यह बात किताबों से आगे नहीं बढ़ पा रही है।

कहने को तो देश का संविधान बिना किसी भेदभाव के बच्चों की देखभाल, विकास और अब तो शिक्षा की भी गारंटी देता है, लेकिन इसे नारे से आगे बढ़ाने के लिए न तो इच्छाशक्ति है और न ही धन, जबकि गरीबी, बेरोजगारी, पलायन, सामाजिक कुरीतियों, रूढ़िवादी लोगों के लिए बच्चियों को देह व्यापार के धंधे में ढकेलने के लिए उनका आर्थिक और आपराधिक तंत्र बेहद ताकतवर है। कहने को कई आयोग बने हुए हैं, लेकिन वे विभिन्न सियासती दलों के लोगों को पद-सुविधा देने से आगे काम नहीं कर पा रहे हैं।

आज बच्चियों को केवल जीवित रखना ही नहीं, बल्कि उन्हें इस तरह की त्रासदियों से बचाना भी जरूरी है और इसके लिए सरकार की सक्रियता, समाज की जागरूकता और पारंपरिक लोक की सोच में बदलाव जरूरी है।

बात अप्रैल 2015 की है। गुमशुदा बच्चों के मामले में ढिलाई बरतने पर सुप्रीम कोर्ट ने न केवल केंद्र सरकार को फटकार लगाई थी, बल्कि महिला एवं बाल कल्याण मंत्रालय के सचिव पर पचास हजार रुपए का जुर्मार्ना लगाते हुए उन्हें तलब भी किया था। सामाजिक न्याय खंडपीठ इस बात से बेहद नाराज था कि कानून बनने के पंद्रह साल बीत गए लेकिन केंद्र सरकार कानून का पालन नहीं कर रही है। बच्चे गायब हो रहे हैं और सरकार चिट्टी भेजने में लगी है। सुप्रीम कोर्ट ने सरकार द्वारा बाल अधिकार संरक्षण आयोग के अध्यक्ष और सदस्य की नियुक्ति न करने पर भी नाखुशी जताई थी। इसके अलावा राज्यों में सलाहकार बोर्डों का गठन न किए जाने पर चिंता जताई थी।

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