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दिल्ली मेरी दिल्ली: नेताओं की उत्कंठा

दिल्ली नगर निगम के बीते चुनाव में भाजपा ने एक नया प्रयोग शुरू किया। प्रयोग यह था कि किसी भी मौजूदा पार्षद या उनके सगे संबंधियों को टिकट नहीं दिया गया।

Author May 20, 2019 6:07 AM
प्रतीकात्मक तस्वीर।

-बेदिल

लोकसभा चुनाव में परिणाम चाहे जिस पार्टी के पक्ष में हो पर नगर निगम के पुराने नेताओं की बांछे खिलते दिख रही हैं। दरअसल दिल्ली नगर निगम के बीते चुनाव में भाजपा ने एक नया प्रयोग शुरू किया। प्रयोग यह था कि किसी भी मौजूदा पार्षद या उनके सगे संबंधियों को टिकट नहीं दिया गया। इससे पार्टी के नेताओं में भारी असंतोष पैदा हुआ और कहा तो यहां तक गया था कि निगम भाजपा के हाथ से निकल गई। पर पार्टी आलाकमान का यह फार्मूला सटीक निकला और तीनों निगम में पार्टी सत्तासीन हो गई।

अब वे पुराने पार्षद जिनका राजनीतिक करिअर निगम के ऊपर नहीं उठा उन्हें उम्मीद है कि दिल्ली विधानसभा चुनाव में उन्हें टिकट मिल सकता है। इसलिए वे लोकसभा चुनाव के बाद परिणाम की परवाह किए बिना खुश दिख रहे हैं। बेदिल को इसी तरह के एक पार्षद से जब मुलाकात हुई तो उनका कहना था कि 25 साल निगम में रहने के बाद अगर उन्हें पार्टी इस बार विधायक के टिकट के लायक भी नहीं मानें तो फिर हमारा नहीं बल्कि पार्टी का दुर्भाग्य है।

नाखून कटाकर शहीद
वैसे तो राजनीतिक दलों की जरूरत भी रहती है कि चुनाव प्रबंधन का काम पार्टी के वरिष्ठजन संभालें और यह परंपरा भी बनी हुई है कि एक इलाके में मतदान खत्म होने के बाद उस इलाके के नेता और प्रमुख कार्यकर्ता दूसरे जगह पर पार्टी उम्मीदवारों के लिए काम करने जाते हैं। दिल्ली का मतदान 12 मई को खत्म हुआ तो दिल्ली भाजपा के नेता बड़ी तादात में पड़ोसी राज्यों में चुनाव प्रचार करने पहुंच गए। उन स्थानों पर रविवार को मतदान हो रहा है। संयोग से दिल्ली के पड़ोस के उत्तर प्रदेश के इलाकों में पहले ही मतदान हो गए और हरियाणा में मतदान दिल्ली के साथ हुए। पंजाब में भाजपा 13 में से महज तीन सीटों पर चुनाव लड़ रही है। चंडीगढ़ की लोकसभा सीट पर अभिनेत्री किरण खेर दोबारा चुनाव लड़ रही हैं। ऐसे में दिल्ली के ज्यादातर नेता हफ्ते भर से चंडीगढ़ में जमे हुए हैं और कुछ दिल्ली की गर्मी से बचने के लिए हिमाचल प्रदेश घूम रहे हैं। कहा जा रहा है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भले ही अपने बूते भाजपा को सत्ता हासिल करवा लेंगे। इसे भाजपा की भी जीत मानी जाएगी। यह भी सही है कि कुछ लोग तो पार्टी की योजना से दूसरे राज्यों में चुनाव प्रचार करने गए, लेकिन भाजपा के कई नेता जबरन नाखून कटाकर शहीद बनने का नाटक करने की योजना के कारण दूसरे राज्यों में सक्रिय रहे।

‘आप’ के लिए खतरा
मुख्यमंत्री और आम आदमी पार्टी (आप) के प्रमुख अरविंद केजरीवाल ने दिल्ली की लोकसभा सीटों के नतीजे आने से पहले ही अल्पसंख्यक मतों का कांग्रेस के पक्ष में ध्रूवीकरण की बात कह कर चुनाव परिणामों के बारे में अपना ताजा अनुमान बता दिया है। दिल्ली में करीब 15 फीसद अल्पसंख्यक मतदाता हैं और जैसा केजरीवाल कह रहे हैं, उस हिसाब से ये सारे मत कांग्रेस को मिले तो ‘आप’ के लिए जीत की संभावना वे कम मानते हैं। 2014 के लोकसभा और 2015 के विधानसभा चुनावों में अल्पसंख्यकों ने ‘आप’ को वोट दिया था। अगर इस चुनाव में दिल्ली के अल्पसंख्यक मतदाताओं ने कांग्रेस को वोट किया है तो ‘आप’ के लिए खतरे की बात ज्यादा बड़ी है।

मौत पर सियासत
बीते दिनों मोती नगर में छेड़छाड़ का विरोध करने पर हुई पिता की हत्या मामले में मौत पर जमकर सियासत हो रही है। वारदात के बाद से हर गुट हर दल वहां पहुंच रहा है, लेकिन कोई यह नहीं बता रहा कि पीड़ित परिवार को कैसे मोहल्ला न छोड़ने को राजी किया जाए। उन्हें सामाजिक सुरक्षा का यकीन दिलाने की किसी को फिक्र नहीं। कहना न होगा कि इस मामले में पुलिस अपना काम कर चुकी है। चारो आरोपी गिरफ्तार हैं। अब कानून अपना काम करेगा, लेकिन समाज के तथाकथित अगुवा कहे जाने वाले राजनीतिक दलों के नेताओं, समाजिक सरोकार के लिए काम करने वाले गैर सरकारी संगठनों के कार्यकर्ताओं में से किसी ने इस बात की पहल नहीं कि ऐसी वारदात फिर से न हो। पीड़ित परिजनों का भय दूर हो। उनका इलाका छोड़ने के इरादे बदल जाएं आदि। यहां यह बात दीगर है कि पीड़ित परिजन मीडिया के सामने इलाका छोड़ कहीं और चले जाने की संभावना जता चुके हैं। किसी ने ठीक ही कहा- चुनावी दौर था, सब चर्चा में बने रहने के लिए पीड़ित परिवार के साथ खड़े रहे। समय बीत गया, अब काहे की फिक्र।

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